कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण में क्यों लगी रहती
है?
क्या नाथुराम गोडसे देशभक्त थे ..¿¿ हिन्दु महासभा गोडसे का शहीद दिवस
क्यों मनाती है..?
गांधी ने पाकिस्तान क्यों बनाया..??
क्या गांधी गलत थे..??
इन सारे सवालो के जवाब इस लेख में मौजुद
है..
कृपया इस लेख को पुरा पढ़े..
19 मई 1910 को मुम्बई – पुणे के बीच ‘ बारामती ‘ में संस्कारित राष्ट्रवादी हिन्दु परिवार में जन्में वीर
नाथूराम गोडसे एक ऐसा नाम है जिसके सुनते ही लोगों के मन-मस्तिष्क मेँ एक ही विचार
आता है कि गांधी का हत्यारा । इतिहास मेँ भी गोडसे जैसे परम राष्ट्रभक्त बलिदानी
का इतिहास एक ही पंक्ति मेँ समाप्त हो जाता है । गांधी का सम्मान करने वाले गोडसे
को गांधी का वध आखिर क्योँ करना पडा,इसके पीछे क्या कारण रहे, इन कारणोँ की कभी भी
व्याख्या नही की जाती । नाथूराम गोडसे एक विचारक, समाज
सुधारक, पत्रकार एवं सच्चा राष्ट्रभक्त था और गांधी का
सम्मान करने वालोँ मेँ भी अग्रीम पंक्ति मेँ था । किन्तु सत्ता परिवर्तन के पश्चात
गांधीवाद मेँ जो परिवर्तन देखने को मिला, उससे नाथूराम ही
नहीँ करीब-करीब सम्पूर्ण राष्ट्रवादी युवा वर्ग आहत था । गांधी इस देश के विभाजन
के पक्ष मेँ नहीँ थे ।उनके लिए ऐसे देश की कल्पना भी असम्भव थी, जो किसी एक धर्म के अनुयायियोँ का बसेरा हो । उन्होँने
प्रतिज्ञयापूर्णघोषणा की थी कि भारत का विभाजन उनकी लाश पर होगा । परन्तु न तो वे
विभाजन रोक सके, न नरसंहार का वह घिनौना ताण्डव, जिसने न जाने कितनोँ की अस्मत लूट ली, कितनोँ को
बेघर किया और कितने सदा – सदा के लिए अपनोँ से बिछड गये । खण्डित
भारत का निर्माण गांधी की लाश पर नहीँ, अपितु 25 लाख हिन्दू,सिक्खोँ और मुसलमानोँ की लाशोँ तथा
असंख्य माताओँ और बहनोँ के शीलहरण पर हुआ । किसी भी महापुरुष के जीवन मेँ उसके
सिद्धांतोँ और
आदर्शो की मौत ही वास्तविक मौत होती है । जब
लाखोँ माताओँ, बहनोँ के
शीलहरण तथा रक्तपात और विश्व की सबसे बडी त्रासदी द्विराष्ट्रवाद के आधार पर
पाकिस्तान का निर्माण हुआ । उस समय गांधी के लिए हिन्दुस्थान की जनता मेँ जबर्दस्त
आक्रोश फैल चुका था । प्रायः प्रत्येक की जुबान पर एक ही बात
थी कि गांधी मुसलमानोँ के सामने घुटने
चुके है । रही – सही कसर
पाकिस्तान को 55 करोड रुपये देने के लिए गांधी के अनशन ने
पूरी कर दी । उस समय सारा देश गांधी का घोर विरोध कर रहा था और
परमात्मा से उनकी मृत्यु की कामना कर रहा
था । जहाँ एक और गांधीजी पाकिस्तान को 55 करोड पया देने के लिए हठ कर अनशन पर बैठ गये थे, वही
दूसरी और पाकिस्तानी सेना हिन्दू निर्वासितोँ को अनेक प्रकार की प्रताडना से शोषण
कर रही थी, हिन्दुओँ का जगह-जगह कत्लेआम कर रही थी, माँ और बहनोँ की अस्मतेँ लूटी जा रही थी, बच्चोँ को
जीवित भूमि मेँ दबाया जा रहा था । जिस समय भारतीय सेना उस जगह पहुँचती, उसे मिलती जगह – जगह अस्मत लुटा चुकी माँ-बहनेँ,
टूटी पडी चुडियाँ, चप्पले और बच्चोँ के दबे
होने की आवाजेँ । ऐसे मेँ जब गांधी से अपनी जिद छोडने और अनशन तोडने का अनुरोध
किया जाता तो गांधी का केवल एक ही जबाब होता – “चाहे मेरी
जान ही क्योँ न चली जाए, लेकिन मैँ न
तो अपने कदम पीछे करुँगा और न ही अनशन
समाप्त करुगा ।” आखिर मेँ
नाथूराम गोडसे का मन जब
पाकिस्तानी अत्याचारोँ से ज्यादा ही
व्यथित हो उठा तो मजबूरन उन्हेँ हथियार उठाना पडा । नाथूराम गोडसे ने इससे पहले
कभी हथियार को हाथ नही लगाया था । 30 जनवरी 1948 को गोडसे ने जब गांधी पर गोली चलायी तो
गांधी गिर गये । उनके इर्द-गिर्द उपस्थित लोगोँ ने गांधी को बाहोँ मेँ ले लिया ।
कुछ लोग नाथूराम गोडसे के पास पहुँचे । गोडसे
ने उन्हेँ प्रेमपूर्वक अपना हथियार सौप दिया और अपने हाथ खडे कर दिये । गोडसे ने
कोई प्रतिरोध नहीँ किया । गांधी वध के पश्चात उस समय समूची भीड मेँ एक ही स्थिर मस्तिष्क
वाला व्यक्ति था, नाथूराम
गोडसे । गिरफ्तार होने के बाद गोडसे ने डाँक्टर से शांत मस्तिष्क होने का
सर्टिफिकेट मांगा, जो उन्हेँ मिला भी । नाथूराम गोडसे ने
न्यायालय के सम्मुख अपना पक्ष रखते हुए गांधी का वध करने के 150 कारण बताये थे। उन्होँने जज से आज्ञा प्राप्त कर ली थी कि वह अपने बयानोँ
को पढकर सुनाना चाहते है । अतः उन्होँने वो 150 बयान माइक पर
पढकर सुनाए । लेकिन नेहरु सरकार ने (डरसे) गोडसे के गांधी वध के कारणोँ पर रोक लगा
दी जिससे वे बयान भारत की जनता के समक्ष न पहुँच पाये । गोडसे के उन क्रमबद्ध
बयानोँ मेँ से कुछ बयान आपके समक्ष प्रस्तुत
कर रहा जिससे आप जान सके कि गोडसे के
बयानोँ पर नेहरु ने रोक क्योँ लगाई ?
तथा गांधी वध उचित था या अनुचित ? गोडसे के अनुसार - दक्षिण अफ्रिका मेँ
गांधीजी ने भारतियोँ के हितोँ की रक्षा के लिए बहुत अच्छे काम किये थे । लेकिन जब
वे भारत लौटे तो उनकी मानसिकता व्यक्तिवादी हो चुकी थी । वे सही और गलत के स्वयंभू
निर्णायक बन बैठे थे । यदि देश को उनका नेतृत्व चाहिये था तो उनकी अनमनीयता को
स्वीकार करना भी उनकी बाध्यता थी । ऐसा न होने पर गांधी कांग्रेस की नीतियोँ से
हटकर स्वयं अकेले खडे हो जाते थे । वे हर किसी निर्णय के खुद ही निर्णायक थे ।
सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष पद
पर रहते हुए गांधी की नीति पर नहीँ चलेँ । फिर भी वे इतने लोकप्रिय हुए की गांधीजी
की इच्छा के विपरीत पट्टाभी सीतारमैया के विरोध मेँ प्रबल बहुमत से चुने गये । गांधी
को दुःख हुआ, उन्होँने कहा
की सुभाष की जीत गांधी की हार है । जिस समय तक सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस की
गद्दी से नहीँ उतारा गया तब तक गांधी का क्रोध शांत नहीँ हुआ । मुस्लिम लीग देश की
शान्ति को भंग कर रही थी और हिन्दुओँ पर अत्याचार कर रही थी । कांग्रेस इन
अत्याचारोँ को रोकने के लिए कुछ भी नहीँ करना चाहती थी, क्योकि
वह मुसलमानोँ को खुश रखना चाहती थी । गांधी जिस बात को अनुकूल नहीँ पाते।थे उसे
दबा देते थे । इसलिए मुझे यह सुनकर आश्चर्य होता है की आजादी गांधी ने प्राप्त की
। मेरा विचार है की मुसलमानोँ के आगे झुकना आजादी के लिए लडाई नहीँ थी । गांधी व
उसके साथी सुभाष को नष्ट करना चाहते थे । श्री नाथूराम गोडसे व अन्य राष्ट्रवादी
युवा गांधी की हठधर्मिता और मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति से क्षुब्ध थे, हिन्दुस्थान की जनता के दिलोँ मेँ गांधी के झूठे अहिँसावाद और नेतृत्व के
प्रति घृणा पैदा हो चुकी थी । उस समय गांधी के चरित्र पर भी अंगुली उठ रही थी
जिसके चलते वरिष्ठ नेता जे. बी. कृपलानी और वल्लभ भाई पटेल आदि नेताओँ ने उनसे
दूरी बना ली यहा तक की कई लोगोँ ने उनका आश्रम छोड दिया था । इस बात को तो मैँ सदा
से बिना छिपाए कहता रहा हूँ कि मैँ गांधी के सिद्धांतोँ के विरोधी सिद्धांतोँ का
प्रचार कर रहा हूँ । यह मेरा पूर्ण विश्वास रहा है कि अहिँसा का अत्याधिक प्रचार
हिन्दू जाति को अत्यन्त निर्बल बना देगा और अंत मेँ यह जाति ऐसी भी नहीँ रहेगी कि
वह दूसरी जातियोँ से, विशेषकर मुसलमानोँ के अत्याचारोँ का
प्रतिरोध कर सके । हम लोग गांधी की अहिँसा के विरोधी ही नहीँ थे, प्रत्युत इस बात के अधिक विरोधी थे कि गांधी अपने कार्यो और विचारोँ मेँ
मुस्लिमोँ का अनुचित पक्ष लेते थे और उनके सिद्धांतोँ व कार्यो से हिन्दू जाति की
अधिकाधिक हानि हो रही थी । मालाबार, नोआख्याली, पंजाब, बंगाल, सीमाप्रांत मेँ
हिन्दुओँ
पर अत्याधिक अत्याचार हुयेँ । जिसको मोपला
विद्रोह के नाम से जाना जाता है । उसमेँ हिन्दुओँ की संपत्ति, धन व जीवन पर सबसे बडा हमला हुआ । हिन्दुओँ
को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया, स्त्रियोँ के अपमान हुये । गांधी
अपनी नीतियोँ के कारण इसके उत्तरदायी थे, मौन रहे । प्रत्युत
यह कहना शुरु कर दिया कि मालाबार मेँ हिन्दुओँ को मुसलमान नहीँ बनाया गया ।यद्यपि
उनके मुस्लिम मित्रोँ ने यह स्वीकार किया कि सैकडोँ घटनाऐँ हुई है । और उल्टे मोपला
मुसलमानोँ के लिए फंड शुरु कर दिया । कांग्रेस ने गांधी को सम्मान देने के लिए
चरखे वाले ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज बनाया ।प्रत्येक अधिवेशन मेँ प्रचुर मात्रा मेँ
ये ध्वज लगाये जाते थे । इस ध्वज के साथ कांग्रेस का अति घनिष्ट सम्बन्ध था
।नोआख्याली के 1946 के दंगोँ के बाद वह ध्वज गांधी की कुटिया
पर भी लहरा रहा था, परन्तु जब एक मुसलमान को ध्वज के लहराने
पर आपत्ति हुई तो गांधी ने तत्काल उसे उतरवा दिया । इस प्रकार लाखोँ -करोडोँ
देशवासियोँ की इस ध्वज के प्रति श्रद्धा को गांधी ने अपमानित किया । केवल इसलिए की
ध्वज को उतारने से एक मुसलमान खुश होता था । कश्मीर के विषय मेँ गांधी हमेशा यह
कहते रहे की सत्ता शेख
अब्दुल्ला को सौप दी जाये, केवल इसलिए की कश्मीर मेँ मुस्लिम है ।
इसलिए गांधीजी का मत था कि महाराजा हरिसिँह को संन्यास लेकर काशी चले जाना चाहिए,
परन्तु हैदराबाद के विषय मेँ गांधी की नीति भिन्न थी । यद्यपि वहाँ
हिन्दूओँ की जनसंख्या अधिक थी, परन्तु गांधी ने कभी नहीँ कहा
की निजाम फकीरी लेकर मक्का चला जायेँ । जब खिलापत आंदोलन असफल हो गया तो मुसलमानोँ
को बहुत
निराशा हुई और अपना क्रोध हिन्दुओँ पर
उतारा । गांधी ने गुप्त रुप से अफगानिस्तान के अमीर को भारत पर आक्रमण करने का
निमन्त्रण दिया, जो गांधी के
लेख के इस अंश से सिद्ध हो जाता है – ” मैँ नही समझता कि
जैसे खबर फैली है, अली भाईयोँ को क्योँ जेल मेँ डाला जायेगा
और मैँ क्योँ आजाद
रहूँगा ? उन्होँने ऐसा कोई कार्य नही किया है जो मैँ न करु । यदि
उन्होँने अमीर अफगानिस्तान को आक्रमण के लिए संदेश भेजा है, तो
मैँ भी उनके पास संदेश भेज दूँगा कि जब वो भारत आयेँगे तो जहाँ तक मेरा बस चलेगा
एक भी भारतवासी उनको हिन्द से निकालने मेँ सरकार की सहायता नहीँ करेगा ।”
मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए गांधी ने एक
मुसलमान के द्वारा भूषण कवि के विरुद्ध पत्र लिखने पर उनकी अमर रचना शिवबवनी पर रोक
लगवा दी, जबकि गांधी ने कभी
भी भूषण का काव्य या शिवाजी की जीवनी नहीँ पढी । शिवबवनी 52 छंदोँ
का एक संग्रह है जिसमेँ शिवाजी महाराज की प्रशंसा की गयी है । इसके एक छंद मेँ कहा
गया है कि अगर शिवाजी न होते तो सारा देश मुसलमान हो जाता । गांधी को ज्ञात हुआ कि
मुसलमान वन्दे मातरम् पसंद नही करते तो जहाँ तक सम्भव हो सका गांधीने उसे बंद
करा दिया । राष्ट्रभाषा के विषय पर जिस
तरह से गांधी ने मुसलमानोँ का अनुचित पक्ष लिया उससे उनकी मुस्लिम समर्थक नीति का
भ्रष्ट रुप प्रगट होता था । किसी भी दृष्टि से देखा जाए तो यह स्पष्ट है कि इस देश
की राष्ट्रभाषा बनने का अधिकार हिन्दी को है । गांधी ने अपने राजनीतिक कैरियर की
शुरुआत मेँ हिन्दी को बहुत प्रोत्साहन दिया । लेकिन जैसे ही उन्हेँ पता चला कि
मुसलमान इसे पसन्द नही करते, तो वे उन्हेँ खुश करने के लिए हिन्दुस्तानी का प्रचार करने लगे । बादशाह
राम, बेगम सीता और मौलवी वशिष्ठ जैसे नामोँ का प्रयोग होने
लगा । मुसलमानोँ को खुश करने के लिए हिन्दुस्तानी (हिन्दी और उर्दु का वर्ण संकर
रुप) स्कूलोँ मेँ पढाई जाने लगी । इसी अवधारणा से मुस्लिम तुष्टिकरण का जन्म हुआ
जिसके मूल से ही पाकिस्तान का निर्माण हुआ
है । गांधी का हिन्दू मुस्लिम एकता का सिद्धांत तो उसी समय नष्ट हो गया जिस समय
पाकिस्तान बना । प्रारम्भ से ही मुस्लिम लीग का मत था कि भारत एक देश नही है । हिन्दू
तो गांधी के परामर्श पर चलते रहे किन्तु मुसलमानोँ ने गांधी की तरफ ध्यान नही दिया
और अपने व्यवहार से वे सदा हिन्दुओँ का अपमान तथा अहित करते रहे । अंत मेँ देश का
दो टुकडोँ मेँ विभाजन हो गया और भारत का एक तिहाई हिस्सा विदेशियोँ की भूमि बन गया
। तो 32 वर्षो से गांधी
मुसलमानोँ के पक्ष मेँ कार्य कर रहे थे और अंत मेँ उन्होँने जो पाकिस्तान को 55
करोड़ रुपये लाने के लिए धूरर्ततापूर्ण अनशन करने का निश्चय किया,
इन बातोँ ने मुझे गांधी वध करने का निर्णय लेने के लिए विवश कर दिया
। 30 जनवरी 1948 को बिडला भवन की
प्रार्थना सभा मेँ देश की रक्षा के लिए मैने गांधी को गोली मार दी । वास्तव मेँ
मेरे जीवन का उसी समय अन्त हो गया था जब मैने
गांधी वध का निर्णय लिया था । गांधी और
मेरे जीवन के सिद्धांत एक है, हम दोनोँ ही इस देश के लिए जीये,गांधी ने उन सिद्धांतोँ
पर चलकर अपने जीवन का रास्ता बनाया और मैने अपनी मौत का । गांधी वध के पश्चात मैँ
समाधि मेँ हूँ और अनासक्त जीवन बिता रहा हूँ । मैँ मानता हूँ कि गांधी एक सोच है,
एक संत है, एक मान्यता है और उन्होँने देश के
लिए बहुत कष्ट उठाए । जिसके कारण मैँ उनकी सेवा के प्रति एवं उनके प्रति नतमस्तक
हूँ, लेकिन इस देश के सेवक को भी जनता को धोखा देकर मातृभूमि
के
विभाजन का अधिकार नही था । किसी का वध
करना हमारे धर्म मेँ पाप है, मै जानता हूँ कि इतिहास मेँ मुझे अपराधी समझा जायेगा लेकिन हिन्दुस्थान को
संगठित करने के लिए गांधी वध आवश्यक था । मैँ
किसी प्रकार की दया नही चाहता हूँ । मैँ
यह भी नही चाहता कि मेरी ओर से कोई और दया की याचना करेँ । यदि देशभक्ति पाप है तो
मैँ स्वीकार करता हूँ कि यह पाप मैने किया है ।यदि पुण्य है तो उससे अत्पन्न पुण्य
पर मेरा नम्र अधिकार है । मुझे विश्वास है कि मनुष्योँ के द्वारा स्थापित न्यायालय
के ऊपर कोई न्यायालय हो तो उसमेँ मेरे काम को अपराध नही माना जायेगा । मैने देश और
जाति की भलाई के लिए यह काम किया ! मैने उस व्यक्ति पर गोली चलाई जिसकी नीतियोँ के
कारण हिन्दुओँ पर घोर संकट आये और हिन्दू नष्ट हुए । मेरा विश्वास अडिग है कि मेरा
कार्य ‘ नीति की दृष्टि ‘
से पूर्णतया उचित है । मुझे इस बात मेँ लेशमात्र भी सन्देह नही की
भविष्य मेँ किसी समय सच्चे इतिहासकार इतिहास लिखेँगे तो वे मेरे कार्य को उचित
आंकेगे । मोहनदास गांधी की हत्या करने के कारण नाथूराम गोडसे जी एवँ उनके मित्र
नारायण आपटेजी को फाँसी की सजा सुनाई गई थी । न्यायालय मेँ जब गोडसे को फाँसी की
सजा सुनाई गई तो पुरुषोँ के बाजू फडक रहे थे, और स्त्रियोँ
की आँखोँ मेँ आँसू थे । नाथूराम गोडसे व नारायण आपटे को 15 नवम्बर
1949 को अम्बाला (हरियाणा) मेँ फासी दी गई । फाँसी दिये जाने
से कुछ ही समय पहले नाथूराम गोडसे ने अपने भाई दत्तात्रेय को हिदायत देते हुए कहा
था, कि” मेरी अस्थियाँ पवित्र सिन्धू
नदी मेँ ही उस समय प्रवाहित करना जब सिन्धू नदी एक स्वतन्त्र नदी के रुप मेँ भारत
के झंडे तले बहने लगे, भले ही इसमेँ कितने भी वर्ष लग जायेँ,
कितनी ही पीढियाँ जन्म लेँ, लेकिन तब तक मेरी
अस्थियाँ विसर्जित न करना ।” श्रीनाथूराम गोडसे ने तो
न्यायालय से भी अपनी अन्तिम इच्छा मेँ सिर्फ यही माँगा था – ” हिन्दुस्थान की सभी नदियाँ अपवित्र हो चुकी है, अतः
मेरी अस्थियोँ को पवित्र सिन्धू नदी मेँ प्रवाहित कराया जाए ।” वीर नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे ने वन्दे मातरम् का उद्घोष करते हुये
फाँसी के फंदे को अखण्ड भारत का स्वप्न देखते हुये चुमा और देश के लिए आत्म बलिदान
दे दिया । नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे के अन्तिम संस्कार के बाद उनकी अंतिम
इच्छा को पूर्ण करना तो दूर उनकी राख भी उनके परिवार वालोँ को नहीँ सौँपी गई थी । जेल
अधिकारियोँ ने अस्थियोँ और राख से भरा मटका रेलवे पुल के ऊपर से घग्गर मेँ फेँक
दिया था । दोपहर बाद मेँ उन्ही जेल कर्मचारियोँ मेँ से किसी ने बाजार मेँ जाकर यह
बात एक दुकानदार को बताई, उस दुकानदार ने तत्काल यह सूचना
स्थानीय हिन्दू महासभा कार्यकर्ता इन्द्रसेन शर्मा तक पहुँचाई । इन्द्रसेन उस समय ‘
द ट्रिब्यून ‘ के कर्मचारी भी थे । इन्द्रसेन
तत्काल अपने दो मित्रोँ को साथ लेकर दुकानदार द्वारा बताये गये स्थान पर पहुँचेँ ।
उन दिनोँ घग्गर नदी मेँ उस स्थान पर बहुत ही कम पानी था । उन्होँने वह मटका वहाँ
से सुरक्षित निकालकर प्रोफेसर ओमप्रकाश कोहल को सौप दिया, जिन्होँने
आगे उसे डाँ. एल वी परांजये को नाशिक मेँ ले जाकर सुपुर्द किया । उसके पश्चात वह
अस्थिकलश 1965 मेँ नाथूराम गोडसे के छोटे भाई गोपाल गोडसे तक
पहुँचाया गया, जब वे जेल से रिहा हुए । वर्तमान मेँ यह अस्थिकलश
पूना मेँ उनके निवास पर उनकी अंतिम इच्छा पूरी होने की प्रतिक्षा मेँ रखा हुआ है ।
15 नवम्बर 1950 से अभी तक प्रत्येक 15
नवम्बर को महात्मा गोडसे का ” शहीद दिवस ”
मनाया जाता है । सबसे पहले नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे के चित्रोँ
को अखण्ड भारत के चित्र के साथ रखकर फूलमाला पहनाई जाती है ।उसके पश्चात जितने
वर्ष उनके आत्मबलिदान को हुए है उतने दीपक जलाये जाते है और आरती होती है । अन्त
मेँ उपस्थित सभी लोग यह प्रतिज्ञा लेते है कि वे महात्मा गोडसेजी के ” अखण्ड हिन्दुस्थान ” के स्वप्न को पूरा करने के लिये
काम करते रहेँगे । हमे पूर्ण विश्वास है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश एक दिन टुकडे-
टुकडे होकर बिखर जायेगे और अन्ततः उनका भारत मेँ विलय होगा और तब गोडसेजी का
अस्थिविर्सजन किया जायेगा । हमेँ स्मरण रखना होगा कि यहूदियोँ को अपना राष्ट्र
पाने के लिये 1600 वर्ष लगे, प्रत्येक
वर्ष वे प्रतिज्ञा लेते थे कि अगले वर्ष यरुशलम हमारा होगा । इसी प्रकार हमेँ भी
प्रत्येक 15 नवम्बर को अखण्ड भारत बनाने की प्रतिज्ञा लेनी
चाहिये 🚩 जय हिन्दुत्व 🚩
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