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कौए ने खुजलाई पाँखें

कौए ने खुजलाई पाँखें

हिंदी और मैथिली के सशक्त हस्ताक्षर, यायावरी जीवन के राहुल सांकृत्यायन,अक्खड़ साहित्यकार निराला और जन जन तक अपना संवाद पहुंचाने वाले जनकवि बाबा नागार्जुन मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र मूल रूप से पौरोहित्य कर्म के ख्यात पंडित थे। आरंभिक शिक्षा प्राचीन पद्धति से संस्कृत में हुई किंतु स्वाध्याय पद्धति से इन्होंने विद्वता प्राप्त की ।राहुल सांकृत्यायन के संयुक्त निकाय के मूल ग्रंथ को पढ़ने की अपनी इच्छा को पाथेय बनाकर इन्होंने लंका के लिए प्रस्थान किया और पालि की डोर पकड़ कर मठ के भिक्खुओ को संस्कृत पढ़ाने लगे। पुनः वहां उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा भी ली। 6 से अधिक उपन्यास संग्रह दो खंडकाव्य,दो मैथिलीय कविता संग्रह, एक मैथिली उपन्यास एवं धर्मलोक शतकम नाम के संस्कृत काव्य और फिर संस्कृत के कुछ अनुदित कृतियों के रचयिता बाबा नागार्जुन को 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया पर अकादमी को इससे संतोष नहीं हुआ और फिर उसने 1994 में साहित्य अकादमी फेलो के रूप में नामांकित कर इनको सम्मानित किया।
कृतित्व का संसार इनका बहुत विस्तारित है ।इसमें भारतीय काव्य परंपरा की जीवंत रूप में उपस्थिति देखी जा सकती है ।इनके काव्य में कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजई कवियों के रचना -संसार के ज्ञान अवगाहन ,बौद्ध और मार्क्सवाद जैसे बहुजन उन्मुख दर्शन के व्यवहारिक अनुगमन तथा उससे भी आगे समय और परिवेश की समस्याओं ,चिंताओं और संघर्षों से प्रत्यक्ष जुड़ाव था ।लोक संस्कृति एवं लोक हृदय की गहरी संवेदना ने इन्हें यायावरी जीवन में मैथिली हिंदी संस्कृत और पालि के अतिरिक्त प्राकृत ,बांग्ला ,सिंघली, तिब्बती आदि अनेकानेक भाषाओं का ज्ञान भी प्राप्त कराया जिसके आधार पर यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि भारतीय मिट्टी से बने भारतीय मिट्टी में उपजे बाबा नागार्जुन आधुनिकतम कवि हैं जहां संघर्ष में अधिक आस्था जनता से गहरा लगाव और एक न्यायपूर्ण समाज का सपना एक साथ नर्तन करते हैं। इनकी कविताओं में एक प्रमुख शैली स्वगत से मुक्त बातचीत की है ।भाषा पर बाबा का गजब का अधिकार था और इसीलिए शब्दों के साथ इनका खेल इनकी रचनाओं में देखते ही बनता है। कविताओं में कबीर से लेकर धूमिल तक की पूरी हिंदी काव्य परंपरा का एक जीवंत दर्शन होता है। लोकप्रियता के आधार पर छंदों का सधा हुआ चमत्कार इनकी कविताओं का ओज है ।कविताएं बिल्कुल जमीन से सटकर लिखी गई हैं और समय के अनुकूल उनके धार पर सान दिया गया है ।उनकी अभिव्यक्ति की तिर्यकता और शब्दों के बेहद ठेठ सीधा प्रयोग इनके साहित्य को यानी वाग्मिता को विलक्षण बनाते हैं ।
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआं उठा आंगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर-घर की आंखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।
बाबा नागार्जुन को उनकी जयंती पर वियोगी साहित्य परिषद की ओर से अभिनंदन
डां सच्चिदानंद प्रेमी
सभापति, मगही प्रचारनी सभा, वियोगी साहित्य परिषद,गया।
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