Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

बच्चों के हाथ मे स्मार्टफोन दे रहे है तो.वह क्या सर्च करते है?

बच्चों के हाथ मे स्मार्टफोन दे रहे है तो.वह क्या सर्च करते है?
संकलन  राधामोहन मिश्र माधव
लेखक श्री नवीन कुमार पाठक 
आज जब हम बच्चों के हाथ मे स्मार्टफोन दे रहे है तो.वह क्या सर्च करते है,क्या देखते है यह क्या हम नियंत्रण कर पाते है या कितने लोग कर पा रहे है। वयस्क से बूढ़े तक स्मार्टफोन का कैसा उपयोग करते है इसका तो कोई सर्वे नही मिला ,पर व्हाट्सएप, फेसबुक,ट्विटर, इंस्टाग्राम, टिन्डर के अलावा भी एडल्ट साईट की तरफ भी कुछ ही प्रतिशत का ध्यान जाता ही होगा। भारत मे चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर रोक है पर चाइल्ड एव्युज तो घर,समाज सब जगह होता.है। अच्छी किताबें कम बिकती और पढी जाती है,पर चटखदार ज्यादा। 1952 में सैंसर बोर्ड बना ,पर 1921 से तबतक की फिल्मों में कुछ अंतरग दृश्य होते थे ,ललिता पवार,सीता देवी,देविका रानी,रूबी मेयर्स यानि सुलोचना आदि ऐसे दृश्य में थी ।फिर ग्लोबलाइजेशन से 1975-1980 के दशक मे खोसला कमिटी की रिपोर्ट पर सिनेमा में छूट मिली और आज उसका परिणाम सामने है। जब फिल्में सेंसर होने के बाद भी बहुधा परिवार के साथ टी.वी/सिनेमाघरों में नही देखी जा सकती तो बिना सेंसर के बेव सीरिज की बात अलग है। अब विकास का कुछ हानि होता ही.है। फिर आज की पीढी बहुत आगे निकल चुकी है और न्यायालय भी कभी कभी साथ देता है। जब हम खुद को नियंत्रित नही कर सकते तो दूसरों को नियंत्रित करने की बात क्यों। छोटे छोटे कस्बों,गाँवों तक स्मार्टफोन से विकृतियाँ आ चुकी है जिसको हमने प्रगति समझा था,वह संस्कृति की अवनति है। तो जिसको जो देखना हो या न देखना होगा,वे ऐसा करेगें। आप इनपर सेंसरशिप की बात कह सकते है पर फिल्मों पर सेंसरशिप का असर देख रहे है।
दिव्य रश्मि केवल समाचार पोर्टल ही नहीं समाज का दर्पण है |www.divyarashmi.com

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ