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सोमवार व्रतं कार्यं श्रावणे वै यथाविधिः। शक्तेनोपोषणं कार्यमथवा निशिभोजनम्।।

श्रावण-सोमवार-व्रत

सोमवार व्रतं कार्यं श्रावणे वै यथाविधिः। शक्तेनोपोषणं कार्यमथवा निशिभोजनम्।।

श्री कमलेश पुण्यार्क 'गुरूजी' 

शिव का पवित्र श्रावण मास चल रहा है। सोमवार को विशेष कर शिव का दिन माना गया है। इसमें प्रायः शिवभक्त अपने ज्ञान और श्रद्धा के अनुसार व्रतोपवास,उपासनादि कर्म करते हैं। उपासना तो उपासना है ही। उपवास का अर्थ (प्रचलित अर्थ में,न कि मूल अर्थ में) नित्य की भांति भोजन न करना ही समझा जाता है। इसमें भी अपनी-अपनी समझ के अनुसार लोग किया करते हैं,जो कि उपवास के मूलार्थ से कोसों दूर की बात होती है। इसी संदर्भ में उक्त श्लोक कहता है कि श्रावण महीने में यथाविधि व्रत( पूजन,अर्चन,उपासनादि संकल्प)करना चाहिए। यदि सम्भव है यानी करने में शक्त(शारीरिक-मानसिक रुप से सक्षम) हैं ,तो उपोषण(बिना ठोस आहार के,अथवा जल,दुग्धादि लेकर) करे। और यदि सक्षम न हों तो दिन भर उपोषण करके,रात्रि में एक बार सात्विक अन्नादि ग्रहण करें। कुछ लोग इसे विपरीत भी करते हैं यानी दिन में ही अन्नादि ग्रहण कर लेते हैं और रात्रि में कुछ नहीं, या दूध वगैरह ले लेते हैं। कुछ लोग सीधे फलाहार पर रहते हैं। मूल उद्देश्य है शिवोपासना। यथोपलब्ध सामग्री पूर्वक शिवार्चन। यथा सम्भव शिव पञ्चाक्षरादि विविध मन्त्रों का जप, ध्यानादि कर्म करते हुए अहोरात्र(एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के बीच का काल) व्यतीत करना ही उपवास का असली कर्म होना चाहिए। अस्तु।
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