किसान यानी “अन्नदाता” के लिए उत्पादन का स्रोत क्या है?
अश्विनी कुमार तिवारी
उत्पादन के स्रोतों पर किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि सरकार का अधिकार होना चाहिए। ऐसा हम नहीं कहते भाई, ये एक कम्युनिस्ट सिद्धांत है। अब ये बताइये कि किसान यानी “अन्नदाता” के लिए उत्पादन का स्रोत क्या है? उसकी जमीन? तो कम्युनिस्ट शासन में किसानों की जमीनें हड़प ली जाती हैं। नहीं, ये कोई मजाक नहीं, ऐसा कई देशों में हो चुका है। ताजा उदाहरण हमारे पड़ोस की राजशाही कम्युनिस्ट व्यवस्था वाले चीन में दिख जायेंगे। किसानों को उनकी जमीनों से बेदखल करके फैक्ट्री में मजदूर बनाकर झोंका जा चुका है। जमीन की उनकी लालसा कैसी है, ये आप नेपाल से भी पूछ सकते हैं।
खैर तो बात थी किसानों की दुर्दशा की, और वो भी चीन में। तो मिशनरी परिवार में जन्मी, अमेरिकी लेखिका, पर्ल एस बक ने 1930 के दशक तक का अपना वक्त चीन में बिताया था। वो दौर पुरानी राजशाही के ख़त्म होने और कम्युनिस्ट राजशाही के लिए आन्दोलन के शुरू होने का दौर था। उसी दौर पर वहां के किसानों पर उन्होंने एक किताब लिखी “द गुड अर्थ”। ये एक किसान परिवार की कहानी सुनाती है। इसका मुख्य किरदार वांग लुंग नाम का एक इमानदार किसान और उसकी उतनी ही भली सी पत्नी ओ लान की कहानी है।
आन्दोलन शुरू होने वाला है यानी “किरांती आने वाली है” और दोनों लोग भी इससे प्रभावित होते हैं। आत्मसम्मान, पीड़ा, जैसी कई चीज़ें इस किसान परिवार के बारे में पढ़ते पढ़ते महसूस हो जाती हैं। कभी लालच, कभी लालसा, कभी कई चीज़ें एक साथ मिलकर किसी व्यक्ति को कैसे प्रेरित करती हैं, ये भी इस कहानी से पता चलता है। आपको भारतीय माहौल से समानता इसमें भी दिख जायेगी कि कैसे जब ओ लान की पहली संतान पुत्र होता है तो वांग लुंग खुश हो रहा होता है। बड़ों के कहने पर वांग लुंग को मजबूरन उधार देते देखने में भी यही नजर आता है।
आगे कहानी में ओ लान को एक के बाद एक दो बेटियां होती हैं तो वो जन्म लेते ही दूसरी बेटी को मार डालती है, क्योंकि तबतक अकाल आ चुका था और सबके भोजन की व्यवस्था संभव नहीं थी। ये भी जाना पहचाना लगेगा। कहानी जब और आगे बीतती है तो वांग लुंग चोरी के पैसे से जमीनें खरीदता है। अमीर होता है और एक रखैल भी रख लेता है। बाद में खेती का काम पसंद ना होने के कारण उसके बेटों में झगड़ा भी होने लगता है। कहानी चीन के किसानों की है मगर भारत से बहुत ज्यादा अलग नहीं लगेगी। कहानी का अंत आप खुद ही पढ़कर देखें तो बेहतर होगा।
ये किताब जब आई तो 1931 में बेस्ट सेलर थी, 1932 में इसे पुल्तिज़र मिला था। बाद में साहित्य में योगदान के लिए पर्ल एस बक को नॉबेल भी मिला था। इसपर एक फिल्म भी बनी है चाहे तो उसे भी देख सकते हैं। बाकी “ये पुस्तक हिन्दी में भी आती है क्या?” पूछने की सोच रहे हों, तो कृपया सवाल जाने दें।
✍🏻आनन्द कुमार
चीन में कुछ लोग Falun Gong पंथ को मानते हैं। यह बुद्धिज़्म का ही एक शांतिप्रिय सबसेट है। फालुन गोंग को फॉलो करने वाले लोग शाकाहारी, नॉन स्मोकर और नॉन ऐल्कॉहॉलिक होते हैं। प्रतिदिन योग व प्राणायाम भी करते हैं। संक्षेप में बोलें तो चीन में सबसे स्वस्थ व सेहतमंद लोग यही हैं।
अब चीन की समाजवादी सत्ता ठहरी नितांत पूंजीवादी व आदमखोर। उन्हें पता लगा कि वैश्विक काला बाजार में फालुन गोंग लोगों के ऑर्गन्स की बहुत डिमांड है और चीन का लोकल माफ़िया यह ऑर्गन सप्लाई करता है वो भी स्टेट को उसका कट दिए बिना।
इतनी बड़े धंधें के अवसर को भला एक समाजवादी सत्ता कैसे हाथ से जाने देती। चीनी सरकार ने कानून बना दिया कि फालुन गोंग धर्म इललीगल है क्योंकि ये लोग समाजवाद के ख़िलाफ़ हैं और चीन की सत्ता को हथियाना चाहते हैं। कानून बनते ही सभी फालुन गोंग फॉलोवर्स जेल के अंदर बंद! अब चीनी सरकार जेल से मस्त इनके ऑर्गन्स का धंधा चलाती है और कोई कुछ नहीं कहता। विग के लिए बाल से लेकर, किडनी तक सब बिकता है, और विश्व का कोई सेक्युलर कुछ नहीं कहता।
भारत देश के शांतिप्रिय बड़े खुश हैं कि चलो भारत पर चीन का ही कब्जा हो जाए, उन्हें बताता चलूं कि चीन जिंदा उइगुर मुस्लिम्स के बाल नोच कर 5 लाख वाली विग्स बनाता है। उनके सिर पर दवाई लगाकर फिर से बाल उगाए जाते हैं व फिर से जड़ सहित उखड़े जाते हैं, क्योंकि जड़ सहित बालों की डिमांड ज्यादा है। इस काम के लिए भी बाकायदा एक लॉ है और अलग से एक डेडिकेटेड कंसेंट्रशन कैम्प है।
समाजवादी चीन के लिए मनुष्य गाजर, मूली, आलू, चिकन या पोर्क से ज्यादा कुछ नहीं। उनके लिए इंसान भी एक प्रोडक्ट है। हेल्थी लाइफस्टाइल वहाँ के लोगों के लिए अभिशाप है। धूम्रपान करने वाले शराबी-कबाबी आदमी को तो वहाँ की सरकार भी कुछ नहीं कहती।
नाज़ी-नाज़ी का राग अलापने वाले लोग सब भूल जाएंगे यदि चीन की हकीकत उन्हें पता लग जाए। तो ये जो लेफ्टिस्ट/कांग्रेसी जो आजकल चीन की बहुत साइड ले रहें हैं, एक बार जाओ और कुछ दिन वहाँ रहकर आओ।
(अधिक जानकारी के लिए यूट्यूब पर जाकर 'Harvested Alive' सर्च करें)।
✍🏻साभार
कुछ दिनों पहले किसी ने याद दिलाया था कि भौकाल का भी अपना महत्व है। ये कोरोना को लेकर दो देशों की तुलना थी, जिसमें दोनों का काम तो एक ही जैसा था मगर एक देश ऐसा था जहाँ के लोग अपनी कामयाबी का जोर शोर से ढिंढोरा पीटते थे। दूसरे देश के लोग जरा कम बोलने वाले थे और उतना शोर नहीं मचाते थे। इसका नतीजा ये भी था कि एक देश के लोग अक्सर कंपनियों में सीईओ या ऐसे उंचे पदों पर दिखते मगर जो कम बोलने वाले थे उनका दबदबा उतना नहीं दिखता था। ऐसा भारत के साथ भी होता है। आज जिस देश को इसराइल के नाम से जाना जाता है उसके बनने में भारत का बड़ा योगदान है।
भारतीय घुड़सवार सैनिकों की मैसूर, हैदराबाद, और जोधपुर के घुड़सवारों की टुकड़ियों ने 1918 में हाइफा पर विजय का परचम फहराया था। उस दौर में ये आखरी इस्लामिक खलीफा माने जाने वाले ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा था। उनसे अगर ये इलाका छुड़ाया नहीं गया होता तो इसराइल कभी बनता ही नहीं। इस युद्ध में शौर्य के लिए कैप्टेन अमन सिंह बहादुर और दफादार जोर सिंह को इंडियन आर्डर ऑफ़ मेरिट, कैप्टेन अनूप सिंह और सेकंड लेफ्टिनेंट सगत सिंह को मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया था। इस युद्ध में मेजर दलपत सिंह को भी उनकी वीरता के लिए मिलिट्री क्रॉस मिला था।
इस एक युद्ध के लिए भारतीय सेना अभी भी 23 सितम्बर को हाइफा दिवस मनाती है। सिर्फ इस एक युद्ध में ही नहीं बल्कि शायद जितनी बार भारतीय सैनिक युद्धों में उतरे हैं, करीब-करीब हर बार दुनियां के नक़्शे पर एक नया देश उभरकर सामने आ गया है। अफ़सोस कि इनके बारे में याद दिलाने के बदले हम बताते क्या हैं? भारत तो गांधी का देश है जी! ये तो बुद्ध की भूमि है जी! इसका नतीजा ये होता है कि जिन्हें भारतीय सेना के युद्ध में उतरने से आतंकित होना चाहिए, वो बेचारे मासूम ये मान लेते हैं कि इन्हें थप्पड़ मार दो तो ये तो दूसरा गाल आगे कर देंगे! जाहिर है ऐसे में बेचारे दुस्साहस कर भी बैठते हैं।
बीते दो चार दिनों में भारत-चीन विवाद के साथ ही कई चीज़ें बदल गयी हैं। फ्रांस ने सीधे-सीधे सैन्य समर्थन देने की ही बात कर दी है। ऐसा माना जाता है कि इससे पहले विदेशी जमीन पर लड़ने के लिए वो मक्का पर कब्जे के वक्त उतरे थे। हालाँकि अधिकारिक स्रोत इसकी पुष्टि नहीं करते लेकिन माना जाता है कि नवम्बर 1979 में जब अल कह्ताबी ने मक्का पर कब्ज़ा जमा लिया था तो फ़्रांस की सैन्य मदद से ही उसे छुड़ाया गया था। फ़्रांस के ऐसा करने के साथ ही यूएनएचआरसी में भारत ने चीन को एक देश मानने की नीति में बदलाव दिखाते हुए सीधे-सीधे हांगकांग सिक्यूरिटी लॉ की बात करके उसे अलग देश मान लिया है।
भारत को कराची पर हुए किसी आतंकी हमले का दोषी बताने की चीनी कोशिश को यूएनएससी में अमेरिका और जर्मनी ने रोक दिया है। टिक-टॉक और दूसरे एप्प पर भारत के प्रतिबन्ध को जहाँ एक तरफ यूएस ने जायज बताया वहीँ दूसरी तरफ उन्होंने खुद भी चीनी कम्युनिस्टों की कठपुतली होने की वजह से हुवाई कंपनी पर प्रतिबन्ध लागू कर दिए हैं। यूके ने एक कदम और आगे जाकर हांगकांग के लोगों को अपने यहाँ पांच साल शरण देने (जिसके बाद वो नागरिकता ले सकते हैं), की बात की है। यूके के इस कदम से बौखलाकर चीन के विदेश मंत्रालय ने यूके को नतीजे भुगतने की धमकियाँ देना भी शुरू कर दिया है।
परंपरागत रूप से चीन का करीबी माने जाने वाले रूस ने एस-400 मिसाइल डिफेन्स सिस्टम की आपूर्ति समय से पहले ही कर देने की बात की है। इसपर चीन की आपत्तियों को भी रूस ने दरकिनार कर दिया है। यानी शीत युद्ध के दौर से कहीं आगे निकलकर भारत अब फ्रंट फुट पर खेल रहा है। सिर्फ भारत के कंधे पर रखकर बन्दूक चलाने की कोई मंशा भी नहीं दिखती क्योंकि कई पश्चिमी देश अपने प्रतिबंधों और शरणार्थी प्रस्तावों के साथ खुद ही आगे आ गए हैं। अब इसे प्रधानमंत्री के लगातार के विदेश दौरों (जिनसे टुकड़ाखोरों को बड़ी समस्या थी), का नतीजा माना जाए या ना माना जाए ये एक अलग बहस का मुद्दा हो सकता है।
इन सबके बीच यूएस ने नेशनल डिफेन्स औथोराईजेशन एक्ट पास कर दिया है। इससे अब वो गाउम द्वीप पर भारतीय, ऑस्ट्रेलियाई और जापानी पायलटों को प्रशिक्षण दे सकेंगे। ये द्वीप ऐसी जगह है जहाँ से चीन नजदीक होता है। थोड़े दिन पहले जो ऑस्ट्रेलिया के प्रधान भारतीय प्रधान को “शाकाहारी” समोसे खिलाने की बात करते ट्विटर पर नजर आये थे, वो सैन्य क्षेत्र में निवेश को 40 प्रतिशत बढ़ा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के साथ चीन के व्यापारिक रिश्तों में हाल में आई खटास कुछ अख़बारों के कोनों में दिखी थी। वो सीधा माल नहीं खरीद रहे होंगे तो जाहिर है वहां भारतीय निर्यातकों के लिए एक नया बाजार भी अपनेआप तैयार हो गया है।
इस सारी उठापटक के बीच प्रधानमंत्री का लेह-लद्दाख पहुँच जाना सेना के लिए कैसा होगा इस बारे में कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है। जाहिर सी बात है जहाँ एक ओर इधर की सेना का मनोबल बढ़ रहा है, वहीँ दूसरी ओर चीन का मारे गए सैनिकों की गिनती ना बताना काफी कुछ कहता है। अगर नुकसान कम हुआ होता तो सिर्फ एक सेना नायक रैंक के मारे जाने को स्वीकारकर वो नहीं छोड़ते। आराम से कहते कि हमारे तो इतने ही मरे, या एक भी नहीं मारा गया? ट्रेनिंग के लिए मार्शल आर्ट्स के प्रशिक्षकों को भेजा जाना भी काफी कुछ बताता है। पुराने दौर में “दिल्ली दूर, बीजिंग पास” कहने वाले तथाकथित नेता पता नहीं किस बिल में हैं। ऐसे मामलों पर उनकी टिप्पणी रोचक होती।
बाकी ये जो #बांके अपनी मूछों के नए स्टाइल के साथ सुबह से लेह-लद्दाख में होने की खबर के साथ टीवी पर नजर आ रहे हैं, उनसे ओनिडा टीवी के पुराने प्रचार जैसा “नेबर्स एनवी, ओनर्स प्राइड” वाली फीलिंग तो आ रही है। “जलने वाले चाहे जल जल मरेंगे” को पंचम सुर में गाइए, मुस्कुराइए, धुआं उठता देखना मजेदार तो है ही!
✍🏻आनन्द कुमार
जय भारत
१९४७ में जब भारत स्वाधीन हुआ तो उसका आकार चीन के दो गुना से अधिक था। कुछ लोगों ने माउंटबेटन तथा उनकी पत्नी की खुशामद कर देश का विभाजन कराया तथा बिना किसी बहुमत के सत्ता हथिया ली। उसके तुरंत बाद पाकिस्तान को भारत पर आक्रमण में सहायता के लिए ५५ करोड़ रुपए दिये तथा आधा से अधिक कश्मीर उसे दे दिया। फिर चीन १९४९ में जैसे ही स्वाधीन हुआ, उसे १३ लाख वर्ग किलोमीटर का तिब्बत बेच दिया। तिब्बत पर अधिकार करने में चीन को ५ वर्ष लगे जबकि इसके लिए भी तत्कालीन सत्ताधीश चीनी सेना को रसद पहुंचा रहे थे। इसके बाद आधा लद्दाख भी १९५९ तक चीन को सौंप दिया जहाँ चीनी आक्रमण में २० अक्तूबर को चुशूल के पास भारतीय सैनिकों की एक टुकड़ी मारी गई। अगले वर्ष १९६० से २० अक्तूबर को हर जिले में पुलिस शहीद दिवस मनाया जा रहा है। पर वे सैनिक केन्द्रीय रिजर्व पुलिस के थे, सेना के नहीँ, अतः उनकी हत्या को भारत पर आक्रमण नहीँ माना। तीन वर्ष बाद जब अरुणाचल तथा लद्दाख में पुनः आक्रमण हुआ तो कहा कि चीन ने धोखा दे दिया। १९४९ से ही भारत को धोखा दे कर कौन भारतीय भूमि चीन को देता जा रहा था। १९५० में भारतीय सेना चीन की तीन गुनी थी, भारत की आय दो गुनी थी। धीरे धीरे समाजवाद के नाम पर चीन भक्ति में भारत की शक्ति तथा सम्पत्ति चीन की तुलना में घटती गयी तथा आज चीन का आकार भारत के तीन गुना से अधिक है। उसकी आय भारत से तीन गुनी है। सेना तथा हर प्रकार के हथियार में वह रूस अमेरिका की बराबरी कर रहा है। भारत ने चीन से तुलना छोड़ कर केवल पाकिस्तान से प्रतिद्वंद्विता आरम्भ की। उसमेँ भी भारतीय सेना हर युद्ध में जीती। पर भारत हर बार हारा। १९६५ तथा १९७१ में सभी जीती भूमि वापस की, पर पाकिस्तान के अधिकार की भूमि वापस नहीँ ली। पाकिस्तान के ९३००० युद्धबन्दी छोड़ दिया पर भारत के हजारों बन्दी पाकिस्तान की जेलों में अत्याचार सह कर मर गये। एक को भी छोड़ने के लिए इन्दिरा गाँधी ने कभी नहीँ कहा।
इसके विपरीत २०१९ में भारतीय वायुसेना के पायलट अभिनन्दन को पाकिस्तान २४ घण्टे के भीतर छोड़ने को बाध्य हुआ, बिना किसी पाकिस्तानी युद्ध बन्दी के बदले।
आज माननीय मोदी जी के नेतृत्व में भारत आत्म विश्वास से भरा हुआ है। शासन में सदा कुछ लोग भ्रष्ट होते हैं, कुछ कमी रहती है। पर भारत की जनता को विश्वास है कि कोरोना, पाकिस्तान, चीन तथा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से समझौता करने वाले सभी भारतीय शत्रुओं से भारत एक साथ विजयी होगा, क्योंकि दृढ़ नेतृत्व है। तुलना में भारत की शक्ति भले ही कम लगे पर मोदी जी के सङ्कल्प से निश्चय विजय होगी। लद्दाख की एक ही यात्रा से चीन पाकिस्तान दोनों चिन्तित हैं तथा उनके भारतीय एजेंट नकली लद्दाखियों का वीडियो बना कर भारत में डर पैदा कर रहे हैं। मोदी जी हठात् १३००० फीट की ऊंचाई पर जिस विश्वास सहित चल रहे हैं, वह युवक के लिए भी बहुत कठिन है। फोटो में उनकी छाया से लगता है कि सिंह निर्भय होकर वन में चल रहा है। ऐसी ही परिस्थिति भगवान् राम के पास थी जब उन्होंने रावण को उसके अपराध का दण्ड देने का निश्चय किया था
विजेतव्या लंका चरण-तरणीयो जलनिधिः,
विपक्षः पौलस्त्यो रण-भुवि सहायाश्च कपयः।
तथाप्येको रामः सकल-मवधीद्राक्षसकुलम्,
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे॥
लंका जीतनी थी, पैर से चलकर सागर पार करना था, पुलस्त्य ऋषि के पुत्र (रावण) से शत्रुता थी, रणांगण में (केवल) वानर लोग सहायक थे; फिर भी अकेले रामचंद्रजी ने राक्षसों का सारा कुल खत्म कर दिया । महान लोगों को काम में सिद्धि सत्त्व से (आत्मबल से) मिलती है, न कि साधनों से ।
✍🏻अरुण उपाध्याय
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