सत्ता के स्वार्थी शासक जनभागीदारी के बिना कानून बनाकर परिवार और समाज का बटवारा करते हैं-छबील सिंह शिशौदिया
व्यवस्था परिवर्तन अभियान के राष्ट्रीय संयोजक विख्यात सामाजिक एक्टिविस्ट छबील सिंह शिशौदिया ने कहा है कि सत्ता के स्वार्थ में वोट के शासक जनभागीदारी के बिना कानून बनाकर परिवार व समाज का बटवारा करना तथा समाज को अस्तित्वहीन करना चाहते हैं I आज शासन के प्रचलन का यहीं असली स्वरूप बन गया है।
भारतीय लोकतंत्र के असली मालिक आम जनों को संबोधित अपने उद्गार में उन्होंने लिखा है कि परिवार समाज व देश के शुभचिंतक महोदय कांग्रेस के समय में जन्मी पोषित भाजपा व मोदी जी से जनता व समाज की अपेक्षित आशा करना एक स्वपन देखने जैसा है। राज्य व्यवस्था द्वारा जनता का शोषण उत्पीड़न करने की नीति में कांग्रेस व भाजपा में कोई बड़ा अंतर नही है। जनता(वोटर) का दायित्व है, कि वह स्वयं इस षड़यंत्र को समझे।
व्यवस्था परिवर्तन अभियान को देश के विभिन्न भागों में निरंतर अलख जगाने वाले छबील सिंह शिशौदिया किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं I अस्सी साल के उम्र पार करने के बाद भी ये निरंतर अनहद अथक प्रयास करके व्यवस्था परिवर्तन अभियान के बेताज बादशाह की तरह देश में स्थापित हैं I उम्दरार होने के बावजूद भी इनकी सारी उर्जा सिस्टम को दुरुस्त करने के लिए लगी हुई है I आज इनके साथ इनके हमउम्र के लोगों के अलावे देश के उर्जावान युवा इनके साथ जुड़कर व्यवस्था परिवर्तन अभियान को गति प्रदान कर रहे हैं I
व्यवस्था परिवर्तन अभियान के राष्ट्रीय संयोजक छबील सिंह शिशौदिया काफी मजबूती के साथ कहते हैं कि ग्राम स्वराज हीं गाँधी जी का लक्ष्य था I गाँधी जी की स्वतंत्रता का मतलब गांव में ग्रामवासियों का राज था न कि सरकार का शासन I इन्होने कहा है कि महात्मा गांधी जी का लक्ष्य था, ग्राम स्वराज गांव में ग्रामवासियों का राज होगा। लेकिन सत्ता के स्वार्थी शासको ने लक्ष्य के नाम पर गाँधी जी का फोटो, लोकसभा ,विधानसभा निजी कार्यालय व सार्वजनिक कार्यालयों में फ़ोटो लगाकर बन्द कर दिया गया है तथा देश के संविधान को संसद की कैद में बंद कर दिया गया है। देश के गिने चुने शासक, शासन की शक्ति के अहंकार में 125 करोड़ देशवासियों की अनसुनी करके तथा दो बार सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी दिये जाने के बाद संसद व सरकार अपराधी, बलात्कारी व भ्रष्टाचारी सांसद व विधायको की सहमति में ऐसे बिल व कानून बनाते चली आ रही है की जनता सरकार की प्राधिनता में शोषण व उत्पीड़न सहन करने के लिए बाध्य है।
देश के 6 लाख ग्रामसभा को स्वराज्य का संवैधानिक अधिकार (शिक्षा, चिकित्सा , सुरक्षा, न्याय तथा विकास कार्य ग्रामसभा के नियंत्रण में) सुनिश्चित नही किया जाना गाँधी जी को दी जाने वाली श्रंद्धाजलि व सहानुभूति के नाम पर सरकारे केवल नाटक करती है जबकि देश के वोटर की नियुक्ति पर लोकतंत्र की सरकार बनती है।
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