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समानता के मौलिक अधिकारों के नाम पर तिल तिल कर मारी जा रही है देश की प्रतिभा समानता परिषद ।

समानता के मौलिक अधिकारों के नाम पर तिल तिल कर मारी जा रही है देश की प्रतिभा समानता परिषद ।

         पंडित रावेन्द्र तिवारी ,  अध्यक्ष , समानता परिषद 
आरक्षण विरोधी आंदोलन की सामाजिक संगठन समानता परिषद ने  आरक्षण प्रणाली तथा दलित एक्ट पर चिंता ब्यक्त करते हुए कहा कि भारत के संविधान निर्माताओं ने  आरक्षण प्रणाली को संवैधानिक मान्यता देकर देश के प्रतिभा को तिल तिल कर मरने के लिए छोड़ दिया है ।
 पंडित रावेन्द्र तिवारी ने  आरक्षण तथा दलित एक्ट से मुक्ति के लिए विगत कई वर्षों से निरंतर संघर्ष करते हुए देश के 15 से ज्यादा राज्यों में आन्दोलन को खड़ा करने में  अहम भूमिका निभाते हुए  इसे  जन  आन्दोलन से जोड़ दिया है जो बर्तमान में सबसे ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है ।
पंडित तिवारी ने कहा कि  कांग्रेस पार्टी के द्वारा जो ब्रिटिश शासन की नीति फूट डालो राज करो अपनाई गई वह देश के लिए अभिशाप साबित हो रहा है कांग्रेस पार्टी के द्वारा जहाँ  आरक्षण प्रणाली को लागू करके  हिन्दू को हिन्दू से बाँट दिया तो वही दलित एक्ट बना कर  वर्ग संघर्ष को बढ़ावा देने का भी काम किया है ।
कांग्रेस के इस कुटिल चाल के कारण आज  देश की पूरी सियासत  इन्हीं दोनों मुद्दों पर  आधारित है  जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण है भाजपा  क्यों कि हम सभी जानते हैं कि भाजपा का गठन  एक देश एक विधान के उद्देश्य के साथ हुआ था किन्तु आज की स्थिति में  आरक्षण तथा दलित एक्ट मे सबसे ज्यादा संसोधन करने का  रिकॉर्ड भाजपा के खाते में जाता है जो यह सिद्ध करता हैं कि  देश का कोई भी सियासी दल  देश के प्रतिभा की चिंता नहीं करता है बल्कि  इन्हीं मुद्दों को गरम करके सत्ता  तक पहुँचने का साधन बना लिया गया है ।
तिवारी ने कहा कि समानता परिषद  भारत के समस्त  राजनीतिक दलों से निवेदन करता है कि  निजी स्वार्थों के लिए देश के प्रतिभा को आरक्षण की बलिवेदी पर न चढ़ाए न ही किसी निर्दोष को विना किसी जाँच के जेल में डाला जाए देश के हर नागरिक को समानता का मौलिक अधिकार प्राप्त हो  इसके लिए यह  आवश्यक है आरक्षण की जगह संरक्षण की ब्यवस्था को लागू किया जाए कोई भी जरूरत मंद किसी भी जाति धर्म का हो सरकार उसे हर संभव मदद उपलब्ध कराए किन्तु  प्रतिशत की छूट देकर प्रतिभा की हत्या की ब्यवस्था को बंद किया जाए 
 यदि  ऐसा नहीं किया गया तो पढ़ी लिखी युवा पीढ़ी  अपराध के मार्ग पर जा सकती है जो न ही समाज के लिए  उचित होगा और न ही देश के लिए  ।
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