
आज का हास्य
आज रविवार को मेरे अजीज मित्र ने फरमाया,
श्रीमान्, दावत पर अकेले ना आना, साथ अपने, कविता को भी ले आना।
मैनें कहा.भाई आपकी दावत फिर
कभी खाई जायेगी, फिलहाल कविता
मेरे साथ आज ना आ पायेगी।
मित्र ने कहा, महानुभाव, मेरे आशियाने, आओ या ना आओ, लेकिन,
अपनी सहगामिनी को साथ ना लाने का कारण जरूर बताओ।
मेनें कहा वह रात तो रोज साथ रहती है,
लेकिन सुबह कभी जवान, कभी बूढ़े वारियर्स के साथ भागती,
कभी सिंधु बार्डर पर किसान के अरमान ढूढती है।
गांवों में जाकर देखती है किस मंका में पड़े आंसुओं के ताले,
गर खुले हैं तो कैसे हैं मजदूरों के पैरों के छाले।
उसने आजकल गजल और मोबाइल से भी दोस्ती कर ली,
फिर भी मेरे ख्वाबों में बजती है सदा मेरी प्यारी कविता की मुरली।
आज साहिब सुबह डाक्टर के पास जा रही है,
रातभर कल फुटपाथ पर किसी भिखारी के साथ ठिठुरती रही,
भोर भोर बोली कलमदान आज मुझे ठंडी लग रही है।
मैनें कहा गर खांसी बुखार आये तो कोरोना टेस्ट करा लेना,
मेरी अजीज, फिर समय मिले तो मित्र की दावत की जानिब नजर कर लेना।
फिलहाल उसने आपके घर आने, ना में सर हिलाया है,
उसने किसी के गम, जख्म रात में ही ढूढ लिये हैं,
माफ करें, कविता को साथ लाने मैनें कोई नया बहाना नहीं बनाया है।
माफ करें, कविता को साथ लाने मैनें कोई नया बहाना नहीं बनाया है।
राजेश लखेरा,जबलपुर, म.प्र.।
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