स्वांतस्थमीश्वरम्।
"स्व अंतस्थम् ईश्वरम् "।अक्सर लोग प्रश्न करते हैं ईश्वर कहाँ है किसी ने देखा है क्या?बड़ी सरल भाव में तुलसी बाबा ने इसे समझाने का प्रयास किया है श्लोक की इस अर्द्धाली में।उन्होंने तो एक तरह से इसे एकदम चैलेंज कर दिया है "सिद्धाः"कहकर।मतलब ईश्वर अन्यत्र कहीं है ही नहीं।वह तो सदैव आपके ही अंतस् में निवास करता है।चलो मान लिया ,क्योंकि तुलसी बाबा कह रहे हैं इसलिये।तुलसी बाबा ऐसे थोड़े न कह रहे हैं ,उन्होंने इसकी अनुभूति की है ,इसके अनुरूप आचरण किया है और अपनी इन अनुभूतियों को आत्मसात भी किया है।तभी तो जनकल्याणार्थ इसे उद्घाटित किया वर्ना ऐसे थोड़े ही कह देते।हम आप भी ऐसा कर सकते हैं।हम भी तो इसी कलियुग में जी रहे हैं जिसमें तुलसी बाबा ने अवतरित होकर इसकी अनुभूति की है।वे थोड़े ही सत्युग द्वापर या त्रेता में आये थे।हाँ एक बात जरूर है कि उन्होंने अपने पूर्ववर्ती नाना साहित्यों का गहन अध्ययन किया था और उसे आत्मसात कर तदनुरूप अपने आपको गति देने का कार्य किया ।इस विषय में स्वयम् उनकी स्वीकारोक्ति भी है "नाना पुराण निगमागम सम्मतं यत् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोपि"।तो जब कलिकाल के प्रभाव को नकारते हुये रामबोला तुलसी ने अपने भीतर विराजमान ईश्वर तत्व का साक्षात्कार कर लिया फिर हम क्यों नहीं कर पाते?आईये इस अंतर को परखने की कोशिश करता हूँ।तुलसी ने इसका जवाब भी इसी श्लोक की दूसरी अर्द्धाली में दिया "श्रद्धा विश्वास रूपिणौ"कहकर।गोस्वामी ने न केवल अपने पूर्ववर्ती साहित्यकारों को पढ़ा अपितु उसपर गहन चिंतन मनन और उसका अवगाहन कर तदनुसार आचरण भी किया तभी तो यह संभव हो पाया "तुलसीदास चंदन घिसै तिलक करै रघुवीर"।उन्होंने अपनी साधना के अंदर सिर्फ दो बातों को विशेष महत्व दिया "श्रद्वा और विश्वास"।यही कारण है कि आज तुलसी अपने जीवन के हर कदम पर सफल दिखते हैं।उनकी अगाध श्रद्धा और उनका अटल विश्वास ही है जिसने रोम रोम में राम की अनुभूति की और उन्होंने इसी श्रद्धा और विश्वास को "भवानी शंकर"मान इसके आगे अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।आज के बदलते परिवेश में हम इसकी जबर्दस्त कमी महसूस करते हैं।काम करने चलते हैं जरूर लेकिन न तो उसके प्रति हमारी श्रद्धा होती है और न ही अपनी कार्यक्षमता पर विश्वास।ऐसी स्थिति में सफलता की कल्पना भी व्यर्थ सिद्ध होगी ही।जब सारे ऋषि महर्षि इस बात पर एकमत हैं,सारे धर्मग्रंथ, धर्मगुरु इसे मुक्तकंठ से स्वीकार करते हैं,सबके सब चिंतक ,विचारक भी यह कहते हैं कि "एकं सद् विप्रा बहुधा वदंति"तो फिर हमें इसको स्वीकार करने में परेशानी क्यों?व्यर्थ के इधर उधर भटकने की बजाय आत्म चैतन्यता की ओर उन्मुख हम क्यों नहीं होना चाहते?जबकि महामना ने इसे भी स्पष्ट स्वीकारोक्ति प्रदान की है इसी श्लोक में यह कहकर कि "याभ्याम् विना न पश्यंति"।बिना इसके आप उसे देख नहीं पायेंगे।तात्पर्य यह कि बिना श्रद्धा और विश्वास के समेकित हुये आप अपने अंतः स्थित उस परम तत्व ईश्वर को देख नहीं पायेंगे।बिना देखे अनुभूत भी नहीं हो पायगा वह।जब तक उसकी अनुभूति नहीं होगी आप अपने जीवन को सफल भी नहीं बना पायेंगे।इस विषय को स्पष्ट करते हुये अन्य साहित्यकार ने भी लिखा "कस्तूरी कुंडली बसै मृग ढूंढै वन मांहि, ऐसे घटि घटि राम हैं दुनिया देखै नाहिं।"अस्तु।
"भवानी शंकरौ वंदे"।
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