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गृह गौलिक (कविता)

गृह गौलिक (कविता)

विश्व गौरैया दिवस को समर्पित रचना।
मेरे घर के
दीवार में बने
निर्माण काल के
छोटे-छोटे ओ छेद
जिसमें राजमिस्त्री सब
भाड़ा बांधने के लिए
बांस डालकर छोड़ देते
बाद में लोग
बांस निकाल लेते
और वह जगह 
वैसे हीं रह जाता
जो गृह गौलिकों का
स्थाई निवास बन जाता
मैं देखता चला आ रहा हूं
एक लंबे समय से
उसमें
कभी कठफोड़वा,कभी मैना
कभी गिलहरी,कभी गौरैया
नैनिहालों के साथ
उसमें रहते हुए
मुझे मजा आता था
कभी कौतूहल भी होता
और मैं जाकर 
उसमें झांका करता
कभी दाना डाल आता
तो कभी 
डरकर भाग भी जाता
जब गौरैया करने लगती शोर
समझकर मुझे अपना बच्चा चोर
          ---:भारतका एक ब्राह्मण.
            संजय कुमार मिश्र 'अणु'
           वलिदाद अरवल (बिहार)
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