कई बार मनाई हमनें शहर में होली।
मैं सेनेटाइजर और मास्क शहर छोड़ जाऊँगा,
इस बार की होली, मैं अपने गांव जाकर मनाऊंगा।
बेलगाड़ी के बेल से मिलूंगा,
साथियों संग रंग खेलूंगा,
कल्लू चाचा के खेत जाकर,
ताजे ताजे महुआ बीनूंगा।
दादी के साथ साड़ी के पल्लू में छिप जाऊँगा,
इस बार होली मैं अपने गांव जाकर मनाऊंगा।
कैसे होगें घर और प्यारे घरवाले,
शहर से लौटे मेरे भाइयों के पैरों के जख्मीं छाले।
वो रिश्ते जो अपनों के दिल में बस जाते,
जहाँ रात को भी दरवाजे खुले रखे जाते।
उन दिलों के समुंदर में छोटी सी कस्ती इश्क की चलऊँगा।
इस बार होली मैं अपने गांव जाकर मनाऊंगा।
खूब देखी शहर, नगर की गमगीन दुनियां,
कैसी होगी गुल्लू चाची की नमकीन मुनियां।
जिस मुहल्ले में टिल्लू दादा की झोपड़ी थी,
उस मुहाल की सुधर गई होगीं पगडंडी, गलियां।
प्यारी मां को रंग से रंगी साड़ी भेंट कर आउंगा ।
इस बार की होली, मैं अपने गांव जाकर मनाऊंगा।
माताओं , बहिनों के आंसू क्या कहते होगें, सिमटे, सिमटे,
जिनके शहीद बेटे आये थे तिरंगे में लिपटे ।
सबसे पहिले मैं उनके परिजनों को गले.लगाउंगा।
कई बार मनायी हमनें शहर में होली ,
मैं सेनेटाईजर और मास्क शहर छोड़ जाऊँगा,
इस बार की होली, मैं अपने गांव जाकर मनाऊंगा।
इस बार की होली, मैं अपने गांव जाकर मनाऊंगा।
राजेश लखेरा, जबलपुर।
दिव्य रश्मि केवल समाचार पोर्टल ही नहीं समाज का दर्पण है |www.divyarashmi.com
0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com