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होली आयो रे कन्हाई

होली आयो रे कन्हाई

होली भारतवर्ष का एक प्राचीन विशिष्ट सांस्कृतिक आध्यात्मिक पर्व है ।जैमिनी की पूर्व मीमांसा सूत्र 400 से 200 वर्ष ईषा पूर्व में इसका वर्णन मिलता है। उनके अनुसार सभी आर्यों द्वारा संपादित किया जाने वाला पर्व यह होलाका के नाम से विख्यात था ।
होला कर्म विशेषः सौभाग्याय स्त्रिणाम् प्रातरनुष्ठीयते। तत्र होलाके राका देवता ॥
( होलाका एक कर्म विशेष है जो स्त्रियों के सौभाग्य के लिए किया जाता है , इसके देवता राका यानी पूर्णचंद्र हैं ।)
-काठक ग्रृह्य( व्याख्या- देवदत्त)
विभिन्न ॠषियों ने अपने-अपने ढंग से इसका वर्णन किया है -यथा,
वात्सायन के अनुसार यह 20 खेलो में एक कामोद्दीपक क्रिया है जिसमें लोग गोश्रृंग( गाय के सींग) से एक दूसरे पर सुगंधित रंग डालते थे ,गालों पर अबीर गुलाल मला करते थे ।
लिंग पुराण के अनुसार यह फाल्गुनी का पर्व ऐश्वर्य दायक है जो बाल क्रीड़ाओं से युक्त है ।
वराह पुराण के अनुसार हिरण्यकश्यप ने विष्णु भक्त अपने पुत्र प्रह्लाद को बार-बार भक्ति छोड़ने के लिए कहने पर भी भक्ति नहीं छोड़ने के कारण अपनी बहन होलिका को प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि समाधि लेने का आदेश दिया था ।होलिका के पास एक मायावी चादर थी जिस पर अग्नि का प्रभाव नहीं होता था। उस चादर को ओढ़ कर होलिका अग्नि में प्रवेश कर गई ।तेज हवा के कारण वह सादर प्रह्लाद पर आ गई। होलिका जलकर भस्म हो गई एवं प्रह्लाद राम नाम लेता हुआ ज्यों का त्यों बाहर आ गए। यह होलिका दहन आज भी इसी प्रतीक के रूप में मनाया जाता है तथा इसमें हवा की परीक्षा उसी तरह आज भी लोग करते हैं ।
वैदिक मतानुसार यह समय यव ग्रहण यज्ञ का होता है जिसे नवान्न व्यष्टि कहा जाता है ।नव संवत्सर एवं बसंत के आगमन एवं नवान्न प्राप्ति की खुशी में जौ की बालियों की आहुति देकर लोग अग्निहोत्र आरंभ करते हैं ।
होली के दिन ही प्रथम मनु का जन्म हुआ था, इसलिए इसे मन्वादि तिथि भी कहते हैं ।
प्राचीन काल में जब मुगलों का शासन था तब भी मुगल बादशाहों के यहां होली मनाई जाती रही थी ।शाहजहां के जमाने में होली जमकर हुआ करती थी ।इसे आब ए- पाशी( रंगों की बौछार) कहते थे ।उस समय भी यह एक मुख्य त्योहार के रूप में मनाया जाता था ।यह त्यौहार मुगल के अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफर तक मनाया जाता रहा है ।उन्हीं के मंत्री निश्चित रूप से उन्हें अबीर लगाया करते थे एवं चांदी की पिचकारी से होली में केसर का रंग की बौछार करते थे ।
महाकवि बाणभट्ट ने अपनी कादंबरी में राजा तारापीड़ के होली खेलने का अनूठा वर्णन किया है ।काव्यमीमांसा मंक राजशेखर ने इसे मदनोत्सव कहकर झूला झूलने और झुलाने का उल्लेख किया है। इससे काम उद्दीपन होता है ।
भारत में होली विभिन्न स्थानों पर अपने-अपने ढंग की होती है ।ब्रज की होली आकर्षण का केन्द्र है ।बरसाने की लठमार होली प्रसिद्ध है ।इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएं रंग से भिंगी लाठी या वस्त्र के कोड़े,जिसे रंग में भिंगाया जाता है उन्हें मारती हैं ।यह होली मथुरा एवं वृंदावन में परिवा से लेकर पूर्णिमा के बाद आनेवाले मंगलवार तक यानी 15 दिनों से अधिक तक चलती है। हरियाणा में भाभियाँ देवरों को काफी सताती है ,देवर भी आनंद वर्धन में कमी नहीं आने देते । मणिपुर के याओसांग नगर के पास वाली नदी के किनारे एक झोपड़ी बनाई जाती है जहां मदनोत्सव मनाया जाता
है ।इस झोपड़ी को योगसांग कहा जाता है । बिहार, अविभाजित बिहार में होली हुड़दंग एवं लोकगीतों का पर्व है ।खुशी से झूमते हुए लोग समवेत रूप में गाते बजाते नदी ,तालाब या जलस्रोत तक लेटते पोटते लुफ्त उठाते जाते हैं ।अपराह्न में भी होली रंग-अवीर की होती है ।संप्रति कुर्ता- फाड़ होली प्रसिद्ध
थी ।भारतेंदु हरिश्चंद्र एवं अन्य कवियों के गीत में होली के गीत प्रचुरता से एवं प्रधानता से मिलते हैं ।
होली में पूर्व वैमनस्य को भूलकर नया प्रेम का संचार होता है ।अगर होली के बाद कोई नया अनुभव या आभास नहीं हुआ तो यह पर्व मनाना बेकार है । डॉ सच्चिदानंद प्रेमी
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