जल और जंगल
विश्व जल संरक्षण दिवस को समर्पित।
(कविता)
आरंभ में
हमारी सभ्यता
पली और बढ़ी थी
नदियों के कछार पर
फिर वह धीरे-धीरे
अपना विकास
जंगलों में खोजने लगी
जंगल और जमीन
प्राणियों के बने
जीवन के आधार
और वह मानव
तथाकथित सभ्यता के
नंगी दौड़ में
नदि और जंगल को
मटियामेट कर दिया
पहले नदियों की
अविकल धाराओं को बांधा
और शनै:शनै:
जंगल को वह
नेस्तनाबूद करता चला गया
वह मानव
आज कंक्रीट के
जंगलों में बसते-बसते
अपने विनाश का कारण
खुद बनते जा रहा है
जीवन के लिए
जंगल और जल जरूरी है
इससे भागना
तेरी कौन सी मजबूरी है
रहेगा सुरक्षित
आज और कल
गर बचे रहेगें
ये जल और जंगल
--:भारतका एक ब्राह्मण.
संजय कुमार मिश्र 'अणु'
वलिदाद अरवल (बिहार)
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