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विविध कालों में कत्थक का सफर एवं ठुमरी का मिलन

विविध कालों में कत्थक का सफर एवं ठुमरी का मिलन

लेखिका- डॉ अंजना झा
नटराज शिव ने जीवन की हर अनुभूति को नृत्य में अभिव्यक्त किया है । आनंद , संहार , रौद्र , प्रेम सभी की अभिव्यक्ति उन्होंने ताण्डव नृत्य से दी । राधा-कृष्ण ने भी रास-नृत्य की सरस भूमि पर श्रृंगार तथा दर्शन का रहस्य उद्घाटित किया । ताण्डव तथा लास्य के रूप में नृत्य वस्तुतः शिव तथा पार्वती के अर्द्ध नारीश्वर स्वरूप का प्रतीक है । नृत्य स्त्री तथा पुरूष के जीवन का राग है, जो चरम सत्य है इस जीवन का , सृजन के गतिमान होने का।

कथक नृत्य के बारे में कहा जाता है कि इसका संबंध मंदिरों से है। वैसे कथक का प्रारंभ एक विशेष धर्म तथा जाति की उपज है। इसका ठोस प्रमाण नहीं है लेकिन मंदिर निर्माण से पहले कोई भी प्रेक्षागृह सा ऐसा कोई भी स्थान नहीं होता था जहाँ पर समाज के लोग एकत्रित होकर सांस्कृतिक कार्य का आयोजन कर सके। चौथी शताब्दी में मंदिर के निर्माण के बाद लोगों को एक स्थान या यह कहें कि ऐसा वातावरण मिला जहाँ जाकर मन को शांति मिलने लगी उस समय अधिकतर विष्णु अवतार के देवताओं की मूर्ति होती थी जिनके राम या कृष्ण ईष्टदेव हुआ करते थे।

मध्यकाल में सभी नृत्य एक ही हुआ करते थे और मंदिर से जुड़े हुए थे। कथक नृत्य के बारे में यही धारणा है कि कथक जाति के लोग हुआ करते थे, वह मंदिरों में ईश्वर के सामने अपनी कथा को वाचते थे तथा बीच-बीच में नृत्य तथा संगीत का सहारा लेते थे जिससे मंदिरों में बैठे दर्शकगण को और भी आंनद दे सकें ।

मंदिरों में कथक के संदर्भ में 1979 ई0 में दिल्ली के कथक केन्द्र ने एक सेमिनार का आयोजन किया जिसमें सभी गुणीजनों को आमंत्रित किया गया। इस आयोजन के अंतर्गत अयोध्या के कथा वाचकों को भी बुलाया गया जो कि उस समय भी मंदिरों में कथा वाचते थे जिनमें प्रमुख नाम पं 0 ओंकार मिश्र जी का आता है। इस सेमिनार के आयोजन समय तक वह मंदिरों में कथा वाचते थे। उन्हीं के अनुसार उनके पूर्वज कुंजी महाराज जी राम भक्त थे और खूब नाचते थे , डमरू के लगभग चौदह सूत्र उन्हें याद थे।

इन्होंने बताया कि कथा वाचने से पहले प्रणाम होता था, फिर लहरा नाच, तराना या पद शुरू होता था, जगमोहन भी होता था। उस समय नृत्य के संदर्भ में बताया कि सीधे-सीधे ठेके पर नृत्य हुआ करता था। मंदिरों में भगवान का अधिक गुणगान होता था, और नृत्य कम। नृत्य में 'थई तत थो क्रांत कत धा' जैसे बोलों का प्रयोग होता था तथा साथ ही अराधना के समय ध्रुपद-धमार, सूल, चर्चरी ताल का प्रयोग होता था।

इसके पश्चात् इस्लामी काल में चारों तरफ अराजकता फैली होगी तो उसका असर मंदिरों के और मंदिरों के बाहर कथा वाचकों पर पड़ा होगा। क्योंकि इस समय हिन्दुत्व खत्म सा दिखाई पड़ता था और सिर्फ मुसलमानी संस्कृति का प्रभाव ही भारत पर पड़ा होगा। इस काल में संगीत तथा वादन में सस्तापन आ गया। नृत्य के रूप में राधा का रूप बदल कर साकी बन गये कलाकारों की होड़ ने नृत्य के अंग संचालन तथा कसक मसक से सस्तापन और गिरावट की और कत्थक का ह्रास होता गया। इसी सस्तापन ने इसे वेश्याओं के समीप ला दिया। इस कालखण्ड में नर्तकों की संख्या कम और नर्तकियों की संख्या अधिक होने लगी। बड़े-बड़े राजा तथा सामंत अपने घरों में नाचने वालियों को रखते थे।

इस काल में कृष्ण-राधा के संयोग श्रृंगार के गीतों से दरबारियों की काम-वासना को तृप्त किया क्योंकि अब कला विलास का साधन बन गयी थी। बड़े-बड़े नृत्याचार्यों को वेश्याओं के कोठे पर नियुक्त किया गया ताकि वह कथक नृत्य में पारंगत हो जायें। कथक नृत्य ने अपना अलग शास्त्र बना लिया किसी ने उस समय लिखने की कोशिश नहीं की कि सभी नृत्याचार्य को कथक कंठस्थ था। साथ ही कथक की भाषा में भी बदलाव आ गया। अब सारे पारिभाषिक शब्द उर्दू में ढल गये जिससे मुसलमान शिष्या तथा शिष्य जल्दी में सीख लें ।

मुगल काल में दरबार के अंदर कथक नृत्य का चलन था । अगर उस समय कथक के अंग संचालन पर विशेष ध्यान दिया जाता तो शायद यह वेश्याओं के निकट नहीं पहुँच पाता, लेकिन इससे एक लाभ यह भी हुआ कि कथक में ताल और लय पक्की हो गयी , क्योंकि मुगल शासक इन विषयों की पूरी जानकारी रखते थे । सम्राट अकबर संगीतज्ञों के संगीत से इतना प्रभावित हुआ कि उसे अटल विश्वास हुआ कि संगीत केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं अपितु आत्मोत्थान है , आत्मानंद है , आत्म - संतुष्टि है । संगीत तथा नृत्य ईश्वरीय शक्ति है , जो सहज ही मनुष्य को भेद से एकत्व की ओर , सांसारिकता से मोक्ष के तरफ ले जाती है ।

वैसे कथक का ऐतिहासिक संदर्भ दर्शाता है कि यह कला प्राचीन है , इसका वर्तमान शास्त्रीय मुगलकाल से सामने आया । ' कथक ' की प्राचीनता के कई प्रमाण है , पंडित तीरथ राम के अनुसार " आज का कथक नृत्य उसका शिल्प तथा विषय वस्तु रासलीला ' से प्रेरित प्रतीत होता है । उनके अनुसार रास में प्रयुक्त शास्त्रीय अंगों को मिलाकर एक नयी विधा का जन्म हुआ होगा तथा अपने नृत्यों में राधा - कृष्ण के कथा प्रसंगों को प्रतिबिम्बित करने के कारण ग्रंभिक ही कथिक कहलाने लगे हों । " कथक का परिवर्तित स्वरूप मुगलकाल में दिखाई देता है । आज भी कुछ लोग कहते हैं कि मुगल दरबार में कथक की आत्मा ही मर गई थी लेकिन यह कहना गलत है क्योंकि मुगलकाल में कथक की आत्मा तो खत्म हुई लेकिन पूर्ण रूप से नहीं क्योंकि उसे नया रूप भी मिला।

यहाँ तक कि अवध के कुछ राजाओं ने इसे सीखकर कुछ रचनाओं का निर्माण किया । 8 वीं शताब्दी के अंतिम चरण में कथक नृत्य में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ' लखनऊ घराना ' का उदय नबाब आसुफुद्दौला के जमाने में हुआ तथा उसके चर्मोत्कर्ष नबाब वाजिद अली शाह के प्रश्रय में हुआ । कथक शैली में नाट्य तत्व की सर्वोत्कृष्ट प्रस्तुति वाजिद अली शाह के भव्य रंग प्रयोग ' रहस ' में हुई भी जो विशुद्ध रूप से रासलीला से प्रभावित था । उन्होंने कथक दरबारी नाच में परिवर्तन करने के लिए एक प्रशिक्षण केन्द्र खोला जिसमें प्रतिभा संपन्न तथा सुंदर नर्तकियों को शिक्षा दी गयी , शिक्षा पूर्ण होने पर उन्हें ' रहस ' उपयुक्त भूमिका प्रदान की जाती थी । नवाब शाह की निगाहें इतनी पैनी थी कि कहीं भी कोई कलाकार गलती नहीं कर पाता । कृष्ण कथा को लेकर रचे गये ' रहस ' की सफलता के बाद उन्होंने अनेक कथानकों को लेकर भी नृत्य नाट्यों की रचना की । वाजिद अली शाह के समय नृत्य में भी विकास हुआ। इस समय कथक नृत्य के जिन अंगों का सर्वाधिक विकास हुआ उनमें सर्वप्रथम 'गत'। उन गतों का उस युग में इतना प्रचार हुआ कि सभी नृत्य प्रकार को ही 'गत' कहा जाने लगा था । वाजिद अली शाह द्वारा लिखित 'बन्नी' नाम पुस्तक में श 'गतों' का वर्णन मिलता है । इस समय ठुमरी का भी अधिक प्रयोग हुआ, मुद्राओं के माध्यम से संपूर्ण नायिका भेदों तथा रसों को ही प्रदर्शित नहीं करता वरन् हर प्रतीक एक पक्ष कथा कहता चलता है ।

कथक के शैलीगत प्रादुर्भाव से मुगलकाल का विशिष्ट योगदान स्मरणीय रहेगा । दरबार में दो प्रकार के नर्तकों का समूह रहे , एक समूह का संबंध हिन्दू रहसधारियों से रहा तो दूसरे का कश्मीर के भाँगों से । इन्हीं से घराने का प्रारूप बना । मुगल राजाओं के दरबारी नर्तकों से लखनऊ घराने एवं हिन्दू राजाओं के आश्रित नर्तकों से जयपुर घराने की नींव पड़ी । तीसरे बनारस घराने की चर्चा भी अध्याय के अंतर्गत की गयी है । वर्तमान शताब्दी में रायगढ़ शैली का भी उद्भव हुआ । जयपुर घराना लखनऊ घराने से सौ वर्ष पुराना है । सभी घरानों की खास अदायगी से शैलीगत विशेषता सामने आयी । घरानों की यह शैली गत विशेषता राज दरबार के परिवेश , राजाओं की रूचि अभिरूचि , उनकी कलाप्रियता , कलाकारों की रूचि तथा प्रतिभा उन्हें मिलने वाली प्रेरणा , सुविधा , अभिव्यक्ति समानता के आधार पर पनपती रही ।

कथक में जो विभिन्न शैलियाँ पनपी उनको शैली विभेद के रूप में अवश्य देखना चाहिए , किन्तु कभी भी यह दृष्टि कोण कहना गलत है कि इसने कथक का भी विभेद किया है । पंडित बिन्दादीन महाराज तथा उनके भाई पंडित कालका प्रसाद जी दोनों ने ठुमरी के माध्यम से लखनऊ शैली को गीतात्मक तथा सुव्यवस्थित किया । केवल भाव ही नहीं काल का प्रसाद जी का ' लय ' की प्रतिभा ने भी इस ठुमरीनुमा कथक शैली में बौद्धिक सृजन की भी संभावनाएँ पैदा की । चक्रधर महाराज द्वारा रचित ठुमरियाँ भी भावों के विविध सूक्ष्म स्तर से खोलने तथा नायिका भेद के अनेक रहस्यों को उजागर करते हैं । चक्रधर महाराज की ठुमरियों में भी राधा-कृष्ण के श्रृंगार प्रधान चित्रण भी प्रमुख है । जयपुर की भाँति यहाँ भी बोलों चक्कर, तैयारी कर जोर दिया जाता है । बैठकी भाव की परंपरागत विशेषता रही है । ठुमरी के संगीतात्मक तत्व एवं टेकनीक एवं गायन शैली का पूर्ण रूपेण प्रयोग ठुमरी नुमा कथक में पाया जाता है तथा ठुमरी के स्वतंत्र गुण , लक्षण या स्वरूप पर भी किसी प्रकार का कुठाराधात नहीं किया जाता है । ठुमरी की विशिष्टता एवं इसके अश्रुण्ण महत्वों पर कथक में विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है । ठुमरी कथक में रसाभिव्यक्ति का विशेष माध्यम है । यहाँ नृत्य के रस , भाव तथा व्यंजना से युक्त , संपूर्ण आंगिक एवं मानसिक भाव सौन्दर्य की कलात्मक अभिव्यक्ति होती है । यहाँ शब्दों के विभिन्न भाव बोधों को अधिक से अधिक रचनात्मक सौंदर्यपूर्ण अभिव्यक्ति दी जाती है ।

भावों के अनुरूप आंगिक अभिनय की मुद्राओं, दृष्टि , देह गतियों , दृष्टि भेद के सूक्ष्म परिवर्तनों, भृकुति भेद , होठों का बंकिम हास्य, सात्विक भावना, कलात्मक रचना की जाती है। यहाँ आंगिक अभिनय का सौष्ठव तो रहता ही है, साथ ही दृष्टि के अनुसार इनका हलन-चलन निर्धारित रहता है। चूंकि नृत्य में दृश्य सौंदर्य एवं भाव सौंदर्य का एकाधिपत्य रहता है, अतः दृष्टि ही रसभाव का मुख्य, सुंदर, भावप्रवण, अभिजात्य एवं सुसंस्कृत माध्यम होता है। आँखों की पुतलियों में समाकर एवं हृदय की अंतरात्मा में भीगकर ही कथक की ठुमरियों का श्रृंगार भाव आध्यात्मिक भाव को साकार कर पाता है, शब्दों के अर्थ से भी आगे निकल जाता है। आँखों की यह भाषा, जहाँ हृदय की भाषा को पढ़ सुन तथा महसूस कर पाते हैं। भरत के रस सूत्रों को कथक कलाकार अपनी ठुमरी के भाव प्रदर्शन द्वारा पूर्ण साकार कर देता है।
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