महाशिवरात्रि पर करें ये
कार्य, आप पर
होगी भगवान शिव की कृपा जाने क्या है महाशिवरात्रि का शुभ मुहूर्त
1.
भस्म धारण करना
भगवान शिव की
प्राप्ति के लिए भक्तों को भस्म धारण करना अत्यंत आवश्यक बताया गया है। इसे
शिरोव्रत कहा जाता है। भस्म धारण करने का महत्व आप इस बात से समझ सकते हैं कि
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि सभी देवता
भी भस्म धारण करते हैं। देवीभागवत पुराण के अनुसार, जो
व्यक्ति तीनों संध्याओं के समय भस्म से त्रिपुंड धारण करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और वह शिवलोक में स्थान प्राप्त करता
है। पूरे शरीर में भस्म लगाने को भस्मस्नान की संज्ञा दी गई है।
2.
रुद्राक्ष धारण करना
रुद्राक्ष धारण करने
से व्यक्ति के सभी पाप कर्म मिट जाते हैं और वह शिव-सायुज्य की प्राप्ति करता है।
इसके महत्व के बारे में एक कथा है। विन्ध्य पर्वत पर एक गर्दभ रुद्राक्ष ढोया करता
था। एक दिन रुद्राक्ष ढोते समय ही गिरने से उसकी मौत हो गई। रुद्राक्ष के स्पर्श
प्रभाव से वह गर्दभ शिवरुवरूप धारण करके शिवलोक चला गया। कहा गया है कि जो व्यक्ति
रुद्राक्ष धारण करता है वो स्वयं शिवस्वरूप हो जाता है। रुद्राक्ष को
श्रद्धापूर्वक पवित्रावस्था में ही धारण करना चाहिए। शिव मंत्रों की सिद्धि के लिए
रुद्राक्ष की माला से जप करना चाहिए।
रुद्राक्ष की उत्पत्ति
पौराणिक कथा के
अनुसार, भगवान शिव त्रिपुरासुर के वध के लिए एक हजार
वर्षों तक अघोरास्त्र नामक महान अस्त का चिंतन करत रहे। उस समय अत्यंत व्याकुल
होकर उनके नेत्रों से अश्रुपात होने लगा। उनकी दाहिनी आंख से कपिलवर्ण, बाईं आंख से श्वेतवर्ण तथा तीसरी आंख से कृष्णवर्ण के रुद्राक्ष उत्पन्न
हुए। ये रुद्राक्ष एक से लेकर 14 मुख वाले होते हैं। इनको
शिव जी का विभिन्न स्वरूप माना जाता है।
पर बना रहा ये विशेष
योग, जानें चारों
प्रहर का सही मुहूर्त, रात्रि पूजा विधि, सामग्री की सूची व मंत्र जाप
महाशिवरात्रि 2021 का व्रत इस बार 11 मार्च
को पड़ रहा है. यह पर्व विशेष मुहूर्त में पड़ने वाला है. हिंदू पंचांग की मानें
तो फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की त्रियोदशी तिथि को चंद्रमा मकर राशि में जबकि
सूर्य कुंभ राशि में रहेंगे. ऐसे में महाशिवरात्रि पर्व शिव योग में मनाया जाएगा.
इस दिन रात 12 बजकर 06 मिनट से 12
बजकर 55 मिनट तक अभिजित मुहूर्त पड़ रहा है.
अत: इस शुभ मुहूर्त में पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होगी. आइए जानते हैं इस
दिन का महत्व, पूजा का सही समय, विधि,
पारण मुहूर्त व अन्य डिटेल...
महाशिवरात्रि पर्व से जुड़ी पौराणिक
मान्यताएं
ऐसी मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा दिन में चार
बार करनी चाहिए. वेदों में इस दिन हर प्रहर में पूजा करने को बेहद शुभ माना गया
है.
महाशिवरात्रि का शुभ मुहूर्त
·
निशित काल पूजा
मुहूर्त: 11 मार्च, रात 12 बजकर 6 मिनट से 12 बजकर 55
मिनट तक
·
पहला प्रहर: 11
मार्च की शाम 06 बजकर 27 मिनट से 09 बजकर 29 मिनट तक
·
दूसरा प्रहर: रात 9
बजकर 29 मिनट से 12 बजकर
31 मिनट तक
·
तीसरा प्रहर: रात 12
बजकर 31 मिनट से 03 बजकर
32 मिनट तक
·
चौथा प्रहर: 12
मार्च की सुबह 03 बजकर 32 मिनट से सुबह 06 बजकर 34 मिनट
तक
·
महाशिवरात्री पारणा
मुहूर्त: 12 मार्च, सुबह 06 बजकर 36 मिनट से दोपहर 3 बजकर 04
मिनट तक
महाशिवरात्रि पूजा विधि
·
भगवान भोले नाथ को
प्रसन्न करने के लिए महाशिवरात्रि पर तीन पत्तों वाला 108
बेल पत्र चढ़ाएं.
·
भांग को दूध में मिलाकर
शिवलिंग पर चढ़ाएं. ऐसी मान्यता है कि उन्हें भांग बेहद पसंद है.
·
इसके अलावा धतुरा और
गन्ने का रस शिव शंभू को जरूर अर्पित करें.
·
जल में गंगाजल मिलाएं
और शिवलिंग पर चढ़ाएं
·
ऐसे करें शिव रात्रि पर
भगवान शिव की पूजा
·
रात्रि की पूजा करने से
पहले स्नान जरूर कर लें
·
पूरी रात्रि भगवान शिव
के समक्ष एक दीपक जरूर जलाएं.
·
उन्हें पंचामृत से
स्नान कराएं
·
इसके बाद केसर के 8
लोटे से जल अर्पित करें.
·
फिर चंदन का तिलक लगाएं
·
अब तीन पत्तों वाला 108
बेलपत्र चढ़ाएं,
·
भांग,
धतूरा, गन्ने का रस भी उन्हें काफी पसंद है.
ऐसे में उन्हें जरूरी अर्पित करें
·
इसके अलावा तुलसी,
जायफल, फल, मिष्ठान,
कमल गट्टे, मीठा पान, इत्र
व दक्षिणा भी चढ़ाना न भूलें.
·
इस दौरान ॐ नमो भगवते
रूद्राय, ॐ नमः शिवाय रूद्राय् शम्भवाय् भवानीपतये नमो नमः
मंत्र का जाप करते रहें.
·
अंतिम में केसर से बने
खीर का प्रसाद शिव जी को चढ़ाएं
·
शिव पुराण पढ़े,
चालिसा और आरती करें.
·
संभव हो तो रात्रि
जागरण करें
भगवान शिव को
क्यों नहीं चढ़ाएं जाते तुलसी के पत्ते
माना जाता है कि पूर्व जन्म में तुलसी का नाम वृंदा था और वह जालंधर
नाम के एक राक्षस की पत्नी थी. वह राक्षस वृंदा पर काफी जुल्म करता था. जालंधर को
सबक सिखाने के लिए भगवान शिव ने विष्णु भगवान से आग्रह किया. तब विष्णुजी ने छल से
वृंदा का पतिव्रत धर्म भंग कर दिया. बाद में जब वृंदा को यह पता चला कि भगवान
विष्णु ने उनका पतिव्रत धर्म भंग किया है तो उन्होंने विष्णुजी को श्राप दिया कि
आप पत्थर के बन जाओगे. तब विष्णु जी ने तुलसी को बताया कि मैं तुम्हारा जालंधर से
बचाव कर रहा था, अब मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम लकड़ी
की बन जाओ. इस श्राप के बाद वृंदा कालांतर में तुलसी का पौधा बन गईं
भगवान शिव को
क्यों नहीं चढ़ाएं जाते तुलसी के पत्ते
माना जाता है कि पूर्व जन्म में तुलसी का नाम वृंदा था और वह जालंधर
नाम के एक राक्षस की पत्नी थी. वह राक्षस वृंदा पर काफी जुल्म करता था. जालंधर को
सबक सिखाने के लिए भगवान शिव ने विष्णु भगवान से आग्रह किया. तब विष्णुजी ने छल से
वृंदा का पतिव्रत धर्म भंग कर दिया. बाद में जब वृंदा को यह पता चला कि भगवान
विष्णु ने उनका पतिव्रत धर्म भंग किया है तो उन्होंने विष्णुजी को श्राप दिया कि
आप पत्थर के बन जाओगे. तब विष्णु जी ने तुलसी को बताया कि मैं तुम्हारा जालंधर से
बचाव कर रहा था, अब मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम लकड़ी
की बन जाओ. इस श्राप के बाद वृंदा कालांतर में तुलसी का पौधा बन गईं
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