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महुवे का गंध

महुवे का गंध

(कविता)

महुवे का गंध,
बता रहा है सबको-
अभी छाया है बसंत।१।
बैठ आमों की डाली,
बोल रही है कोयल काली-
अभी मादक है दिगंत।२।
 सेमर और गुलमोहर,
दिख रहे सुंदर-
खिले-खिले जिवंत।३।
प्रकृति इठला रही है,
नव रुप दिखा रही है-
जैसे कामिनी कंत।४।
सुन चैत्र नवरात्री की आहट,
नीम भुला अपनी कडवाहट-
करने व्याधि का अंत।५।
भारतीय नवसंवत्सर,
आ गया सत्वर-
'मिश्रअणु' पा अनंत।६।
        ---:भारतका एक ब्राह्मण.
          संजय कुमार मिश्र 'अणु'
          वलिदाद अरवल (बिहार)
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