आखिर क्यों ?
किसी की थमती सांसों को
हवा चाहिए
किसी तपते बदन को
दवा चाहिए
अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठकर
कोई रो रहा है दहाड़े मारकर
कोई सीट के अभाव में गिन रहा है
अंतिम सांसें रुग्ण वाहन में
किसी का शव दाह संस्कार के लिए
प्रतिक्षारत है शमशान में
आज डरा हुआ है संपूर्ण मानव
चाहे वो घर में हो या मैदान में
मानसिक और शरीरिक संताप से
आज पीड़ित है समाज
तिल- तिल कर मरने को
हो गया है मजबूर
प्रकृति का ऐसा रौद्र रूप
आखिर क्यों ?
कहीं ऐसा तो नहीं
जो पाशविक मानव
कर रहे है
पशु, पक्षियों का भक्षण
बड़ी निर्ममता से कर रहे हैं
दोहन प्रकृति का
ये उनके भय और चित्कार का हो
प्रतिफल ?
- वेद प्रकाश तिवारी
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