सच्चा कवि
लोग तो कहते हैं कवि सनकी होता है,
हँसता है हँसाता है रोता है रुलाता है ।
लेकर कलम और डायरी बैठा रहता है,
पता नहीं कब सोता है, कब जागता है ।
लेखनी तो बेचारी बरवस चलती जाती है,
लिखती वही जो अंतर्मन की भाव आती है।
कवि के भाव में फूल हो या हो अंगार,
राष्ट्रप्रेम की बहती धार हो,या हो शृंगार।
भाषा की चेतनामयी भक्ति का रसधार हो,
या हो विरह वेदना की तड़पन की पुकार ।
फक्कड़ जिंदगी,धन दौलत की भूख नहीं,
सदा पाते हैं जन जन का असीमित प्यार।
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डॉ रवि शंकर मिश्र "राकेश"
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