खुली किताब
--:भारतका एक ब्राह्मण.
संजय कुमार मिश्र 'अणु'
जब कोई भी,
नहीं मिलता है-
इस दुनियां में,
हमें राह बताने वाला।
अपना भविष्य-
दिखने लगता है,
बेहद नैराश्य पूर्ण-
निरांधकार काला-काला।
तब देता है साथ-
पड़कर हाथ,
अंतर्मन को समझाती है-
अंधेरे में वह,
सुखद सही राह बताती है।
हो एकदम चुपचाप-
मिटाती है परिताप,
अफसोस-पश्चाताप-
जगाती हैं आशा,
आवद्ध लिपि भाषा-
मिटाती रहती है भय भ्रम,
बताती है क्रिया,व्यवहार,नियम।
करती रहती है सचेत-
मन जब जब होता है,
अस्थिर और अचेत-
जगाति है जिजिविषा,
तप, त्याग और तितिक्षा,
देती है दीक्षा-शिक्षा-
और जीवन की कठीन परीक्षा।
जगाकर नव उत्साह-
आनंदपूर्ण जीवन निर्वाह,
जीवन के निमित्त-
क्या है अच्छा,क्या है खराब,
बताती है हमें-
खुली किताब!खुली किताब!!
वलिदाद,अरवल(बिहार)
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