आयुर्वेद : इतिहास, उपादेयता एवं प्रासंगिकता
संकलन अश्विनीकुमार तिवारी
आयुर्वेद लिखनेवाले पुरुष को आप्त कहा जाता है, जिनको त्रिकाल (भूत, वर्तमान, भविष्य) का ज्ञान था। यद्यपि आयुर्वेद बहुत पुराने काल में लिखा गया है, तथापि वर्तमान में नये रूप में उभरनेवाली हर बीमारियों का समाधान इसमें समाहित है। आयुर्वेद मतलब जीवनविज्ञान है। अतः यह सिर्फ एक चिकित्सा-पद्धति नहीं है, जीवन से सम्बधित हर समस्या का समाधान इसमें समाहित है।
आयुर्वेद की उपयोगिता
आयुर्वेद के दो मुख्य प्रयोजन हैं :
1. स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की करना।
2. रोगी व्यक्ति के रोग की चिकित्सा ।
स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना।
स्वस्थ का मतलब सिर्फ रोगमुक्ति ही नहीं, बल्कि आयुर्वेद के अनुसार एक व्यक्ति को स्वस्थ तब कहेंगे जब उसके दोषशारीरिक (वात, पित्त, कफ) तथा मानसिक (रज व तम) समान हों, अग्नि पाचनशक्ति) सामान्य हो, धातु (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र) हो, मल-मूत्रादि क्रिया उचित प्रमाण तथा समय पर हो तथा आत्मा, इन्द्रियाँ व प्रसन्न हो। आयुर्वेद के अनुसार सुख मतलब आरोग्य है एवं दुःख का मतलब रोग।
रोगी व्यक्ति के रोग की चिकित्सा
आयुर्वेद के अनुसार सम्पूर्ण चिकित्सा को त्रिविध रूप में विभाजित किया गया है ।
1. देव व्यापाश्रय चिकित्सा ।
2. युक्ति व्यापाश्रय चिकित्सा
3. सत्त्वावजय-चिकित्सा
रोग मुख्यतः दो प्रकार का होता है ।
शारीरिक व मानसिक। शारीरिक रोग ठीक करने हेतु देव व्यापाश्रय व युक्ति व्यापाश्रय चिकित्सा की जाती है। जबकि मानसिक विकार को चिकित्सा हेतु सत्त्वावजयचिकित्सा की जाती है।
देव व्यापाश्रय चिकित्सा
मंत्रप्रयोग, औषधि-धारण, मणिधारण, मंगलकर्म, बलि (दान), उपहार, होम, नियम, प्रायश्चित्त, उपवास, प्रणिपात, गमन तीर्थयात्रा) आदि कर्म इस चिकित्सा के अन्तर्गत आते हैं।
युक्ति व्यापाश्रय चिकित्सा
यह आवश्यक आहार-विहार तथा औषधि द्रव्य द्वारा किया जाता है। आधुनिक चिकित्साशास्त्र में यह मुख्य चिकित्सा है। आयुर्वेद में भी आजकल ज्यादातर इसी के ऊपर ध्यान दिया जाता है जो कि अपूर्ण चिकित्सा है। औषधि-चिकित्सा के अन्तर्गत समस्त शस्त्र कर्म भी आ जाते हैं। जो मुख्यतः सुश्रुतसंहिता में वर्णित है।
सत्त्वावजय-चिकित्सा
इसका मतलब है अहित अर्थ से मन को दूर रखना। यह ज्ञान, विज्ञान (वेद, पुराण, धर्मग्रन्थ आदि), धैर्य, स्मृति (स्मरणशक्ति अर्थात् बीते हुए कर्म तथा उसके फल को याद रखना तथा पढ़े हुई या सुनी हुई अच्छी बातें याद रखना), समाधि आदि द्वारा मानसिक बीमारी ठीक की जा सकती । इस आरोग्यावस्था को बनाए रखने केलिये आयुर्वेद में विशद वर्णन है जिसको स्वस्थवृत्र कहा जाता है। स्वस्थवृत्त के अन्र्तगत निम्नलिखित उपदेश हैं :
दिनचर्या- प्रतिदिन की जानेवाली क्रियाएँ।
ऋतुचर्या- प्रत्येक ऋतु में आहार विहार में क्या विशेषता है यानि किस ऋतु में क्या-क्या आहार-विहार का सेवन करना चाहिये तथा क्या-क्या नहीं करना चाहिये का विशद वर्णन इसके अन्तर्गत किया गया है।
धारणीय व अधारणीय वेग- शरीर में स्वाभाविक रूप से कुछ शारीरिक एवं मानसिक क्रिया की इच्छा उत्पन्न होती हैं, जिनको वेग कहा जाता है। उनमें से कुछ वेग को रोकना चाहिये जिनको धारणीय वेग कहा जाता है। एवं कुछ वेग का बलपूर्वक नहीं रोकना चाहिये जिनको अधारणीय वेग कहा जाता है। धारणीय वेग को तीन भागों में बाँट सकते हैं- शारीरिक, वाचिक (बोलना) एवं मानसिक। शारीरिक यानि दूसरे को पीड़ा देनेवाले कर्म, परस्त्री संभोग, चोरी, हिंसा आदि; वाचिक में अत्यन्त कठोर वचन, चुगलखोरी, झूठ बोलना, अनुचित समय पर बोलना तथा अनावश्यक बातें करना आदि; मानसिक वेग के अंतर्गत लोभ, शोक, भय, क्रोध, अहंकार, निर्लज्जता, ईष्र्या, अतिराग, दूसरे का धन लेने की इच्छा आदि। इन वेगों को प्रयत्नपूर्वक धारण अर्थात् शरीर के अन्दर दबाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।अधारणीय वेग के अंतर्गत मल, मूत्र तथा अपानवायु का त्याग, वीर्यत्यागभूख, प्यास, डकार-जंभाई, छींक उल्टी, आँसू, निद्रा व श्रमजनित श्वास आदि वेग को नहीं रोकना चाहियेक्योंकि इनके वेग को धारण करने से नाना प्रकार के रोग उत्पन्न हो सकते ।
पञ्चकर्म द्वारा शरीरशुद्धि
चिकित्सा की दृष्टि से आयुर्वेद में पञ्चकर्म का बहुत महत्त्व है। उसके साथ-साथ शरीर को स्वस्थ बनाए रखने भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। ऋतु के हिसाब से शरीर में स्वाभाविक रूप में दोषवृद्धि होती है, उन दोनों को उपयुक्त ऋतु में पञ्चकर्म द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिया जाए, तो आगे ऋतुजनित बीमारी नहीं होती है।
रसायन का सेवन- शरीरशुद्धि के बाद औषधि रसायन का सेवन करने से मनुष्य दीर्घायु, स्मरणशक्तिसम्पन्न, मेधा, आरोग्य, तरुणावस्था, प्रभा, वर्ण, वाणी की मधुरता, उत्तम बल प्राप्ति, वासिद्धि, नम्रता, कान्ति आदि सभी गुणों को प्राप्त करता है। इससे शिथिल मांसपेशियाँ दृढ़ होती हैं, जठराग्नि प्रद्दीप्त होती है, वात, पित्त, कफ सम रहते हैं, शरीर में स्थिरता उत्पन्न होती है। उदाहरणार्थ च्यवनप्राश, ब्रह्मरसायन, आमलकी रसायन, अगस्त्य रसायन तथा हरड़, आमला आदि। औषधि रसायन के अलावा एक आचार रसायन का भी वर्णन है जिसमें कुछ सदाचार बताया गया है जिनको पालन करने से औषधि रसायन सेवन किए बिना रसायन का फल प्राप्त कर सकते हैं, यथा- सत्य बोलना, अक्रोध, मद्य-मैथुन से दूर रहना, अहिंसा न करना, दान देना, देवता-गौ-ब्राह्मण, आचार्य, गुरुजनों व वृद्धजनों की पूजा व सेवा, उचित समय पर निद्रा त्यागना एवं सोना, अहंकार न करना, ज्यादा श्रम न करना, शान्त रहना, प्रियवादी बनना, पवित्रता में तत्पर, सदा दुग्ध व घृत सेवन, अपनी इन्द्रियों को आध्यात्मिक विषयों की ओर उन्मुख करना, आदि।
वाजीकरण का सेवन- शरीरशुद्धि के बाद गृहस्थ जीवन बितानेवाले को उत्तम सन्तान प्राप्ति हेतु तथा मैथुन में आसक्त पुरुष को वाजीकरण औषधिओं को सेवन करना चाहिये। इसके सेवन से यश, श्री, बल तथा पुष्टि की वृद्धि होती है, जैसेशतावरी, मुलेठी, अश्वगन्धा, घृत व दुग्ध, आदि।
प्रज्ञापराध का त्याग- धी, धृति, स्मृति के विभ्रंश होने से जो अशुभ कर्म किया जाता है, उसे प्रज्ञापराध कहते हैं। कर्म तीन प्रकार के होते हैंशारीरिक, वाचिक व मानसिक। इन तीनों कर्म के अतियोग (स्वाभाविक ज्यादा करना), हिनयोग स्वाभाविक से कम करना) तथा मिथ्यायोग (गलत कर्म, अस्वाभाविक कर्म) ही प्रज्ञापराध है। उपर्युक्त वर्णित धारणीय वेग शरीर, वाणी एवं मन के मिथ्यायोग में आते हैं। इसके इलावा मल-मूत्रादि वेग को रोकना या बलपूर्वक निकालना, विकृत मनुष्यों की नकल करना, प्राणवायु को ज्यादा समय रोकना, क्लेशजनक व्रतोपवास करना, आदि प्रज्ञापराध हैं जिनका त्याग करना चाहिये। प्रज्ञापराध मानसिक एवं आगन्तुक (अभिघात, दुर्घटना, आदि) रोग का मुख्य कारण है।
यहाँ पर विशाल आयुर्वेद का एक संक्षिप्त रूप में विवेचन किया गया है। एक वाक्य में कहा जाए तो आयुर्वेद एक सम्पूर्ण चिकित्साशास्त्र है न कि एक वैकल्पिक चिकित्सा जो जीर्ण व्याधियों के लिए है। भारत के पराधीनता के दौरान यह भी पराधीन हो गया था जो कि अभी भी पूर्णरूप से मुक्त नहीं हो पाया है।
इसके फलस्वरूप बीमारियाँ दिनप्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं, जिनको नियन्त्रण करने में आधुनिक चिकित्साशास्त्र भी विफल है। अतः आयुर्वेद को पुनः सम्पूर्ण स्वतंत्र करने का समय आ गया है। केवल आयुर्वेद के जरिए ही समाज को सम्पूर्ण स्वस्थ बनाना सम्भव है। इसके लिए आयुर्वेद में वर्णित स्वास्थवृत्त को अपनी जीवनशैली में अपनाना पड़ेगा तथा स्कूलों के पाठ्यक्रम में इसका समावेश करना पड़ेगा।
✍🏻सुबोध कुमार
अनिल कौशिश जी की पोस्ट्स:
● आयुर्वेद पर मेरे रोचक अनुभव -1
1973
तब हम सतियाँ चौक, माडल टाऊन, करनाल में एक किराये के मकान में रहा करते थे।
उस समय मेरे बाबा जी (दादा जी) भी हमारे पास आये हुए थे। एक दिन रविवार को हम दादा पोता सुबह 5 बजे घूमने निकले तो हम श्रीकृष्ण प्रणामी मंदिर के सामने सरकारी खेतों में घुस गये।
वह क्षेत्र शायद कृषि अनुसंधान केन्द्र विभाग के का था।
वहाँ घूमते हुए मेरे बाबा जी की नज़र एक विशेष प्रकार के घास पर पड़ गयी जो कि इधर उधर और छिटपुट जगहों पर randomly उगी हुई थी।
उसे देख कर बाबा जी बोले कि हम कल एक खुरपा और एक बोरी लेकर आयेंगे और इस घास को उखाड़ कर घर ले जायेंगे।
अब मैं सोच में पड़ गया कि हमारे घर में बकरी तक तो है नहीं फिर हम इस घास का क्या करेंगे।
खै़र, अगले दिन हम वहाँ वह सामान लेकर गये और आधा कट्टा भर कर उस घास को लाये।
यह क्रम तीन दिनों तक चलता रहा।
फिर हम ने उस घास को सुखाया।
और, उसे एक कट्टे में भर लिया।
फिर बाबा जी मुझ से बोले कि इस घास को लेकर कर्ण गेट पर फलाने पंसारी के यहाँ बेच कर आ।
और हाँ, इसे तुमने डेढ़ रू किलो से कम नहीं बेचना है। अब चूँकि उस समय बाबा जी की टाँग में चोट लगी हुई थी तो वे पैदल अधिक नहीं चल सकते थे तो मैं उस कट्टे को सिर पर लाद कर चल पड़ा।
उस दुकान पर पहुँचा तो पंसारी उस घास को देख कर कुछ हैरान हो गया और बोला कि तुम इतने छोटे बच्चे (15 वर्ष) हो तो तुम्हें इस घास के विषय बारे मैं किसने बताया। तो मैंने उसे बताया कि मैं पं. जीवा राम पंसारी का पोता हूँ और उन्होंने मुझे यहाँ भेजा है। इस पर वह पंसारी संतुष्ट हुआ, फिर उस घास को कट्टे में से निकाल कर तोला गया और उसका मोल भाव किया गया। आख़िर वह पंसारी उस 3 किलो घास को 1 रु 60 पैसे किलो के हिसाब से खरीदने को राज़ी हुआ और उसने मुझे 4 रु 80 पैसे पकड़ा दिये और मैं घर की ओर चल पड़ा।
अब आप यह तो सोच ही रहे होंगे कि वह ऐसी कौनसी रामबाण टाइप घास थी जो कि 1973 में अर्थात् आज से 48 वर्ष पहले 1 रु 60 पैसे किलो बिक गयी थी। उन दिनों तो गेहूँ का आटा ही 60-70 पैसे किलो मिल जाता था तो वह घास ऐसी क्या अफलातून थी जो कि इतनी महँगी बिकी थी?
■ उस घास का नाम है शंखपुष्पी।
अब शंखपुष्पी क्या है और इसका सेवन करने से हमें क्या लाभ हो सकता है यह आप गूगल पर खोज सकते हैं।
✍️ अनिल कौशिश
● आयुर्वेद पर मेरे रोचक अनुभव -2
मेरे बाबा जी (दादा जी) आर्थिक अभावों के चलते दूसरी तीसरी कक्षा से आगे पढ़ नहीं पाये...
तो वे एक देसी वैद्य को गुरु मान कर उन के पास 2-3 रु मासिक वेतन पर काम करने लगे थे।
उन्होंने 20-25 वर्षों तक हाड़ तोड़ परिश्रम करके आयुर्वेद का काम सीखा और बाद में उन्होंने वैद्य और पंसारी की स्वयं की दुकान खोल ली। उनके हाथों में इतना यश था कि उनकी प्रसिद्धि आसपास के गाँवों तक हो गयी थी। 1972 आते-आते वे वृद्ध हो चले थे और वे स्वयं के सभी पारिवारिक दायित्वों से मुक्त हो चुके थे। तो वे वह दुकान छोड़ कर दूसरे नगरों में सरकारी नौकरी कर रहे अपने पुत्रों के पास रहने लगे थे।
1975
तब मेरे बाऊ जी का स्थानांतरण चरखी दादरी, जिला भिवानी का हो गया था तो तब हम वहाँ किराये के एक मकान में रहने लगे थे। उन दिनों बाबा जी हमारे पास आये हुए थे।
एक दिन उन्होंने देखा कि पड़ौस में एक युवती को उसके दो परिजन रिक्शा से उतार कर घर में ले जा रहे थे।
वह युवती दोनों हाथों से पेट पकड़े हुए कराह रही थी।
तो बाबा जी भी उनके घर पहुँच गये।
वहाँ उन्हें बताया गया कि उस युवती को 2 दिनों से पेट में तीखा दर्द था।
उसे दो डॉक्टरों को दिखाया गया था परंतु उसे कोई आराम नहीं हुआ था।
तब वे उसे मैडिकल कॉलेज, रोहतक ले जाने की सोच रहे थे।
इस पर मेरे बाबा जी बोले कि वे भी कुछ प्रयास करके देखते हैं।
उन्होंने उस युवती के पेट को टटोल कर देखा और वे लाठी टेकते हुए बाजार की ओर चल दिये।
वे आधे घंटे में एक पंसारी से 20-25 पैसों में एक देसी दवा खरीद लाये।
घर पहुँचते ही उन्होंने आधा लीटर दूध मँगवाया और वह दवा उस में डाल दी और कहा कि इस दूध के आधा रह जाने तक तेज आँच पर उबाला जाये फिर युवती को गर्मागर्म पिलाया जाये।
उन्होंने ऐसा ही किया तो उस युवती का पेट दर्द दूध पीने के आधे घंटे मे ही ठीक हो गया था।
युवती को पेट दर्द क्यों था?
किसी कारण से उसकी आंतड़ियों के एक भाग में मल जम कर इतना सड़ चुका था कि वह कोयले जैसा काला पड़ गया था।
उस जमे और सड़े हुए मल के कारण ही युवती के पेट में तेज दर्द हो रहा था।
अब उन दिनों बीमार के परीक्षण के लिये एक्स रे के इलावा सीटी स्कैन इत्यादि तो होता नहीं था और मल एक्स रे में आता नहीं है तो वे डॉक्टर किसी निष्कर्ष पर पहुँच नहीं पाये थे तो वे युवती का पेट दर्द ठीक नहीं कर पाये थे।
अब आप यह तो सोच ही रहे होंगे कि जिस पेट दर्द को डिग्री धारी डॉक्टर ठीक नहीं कर सके उसे एक अनपढ़ वैद्य ने 20-25 पैसे की देसी दवा से कैसे ठीक कर दिया था और वह दवा कौनसी है।
वह दवा है अमलतास अर्थात् अमलतास वृक्ष पर लगी गहरे भूरे रंग की फलियाँ। अमलतास की फलियों को तोड़ कर उनका गूदा निकाला गया और उसे दूध में खूब उबाल कर युवती को गर्मागर्म पिलाया गया तो उसके आधे घंटे बाद ही उसकी आंतड़ियों में जम कर सड़ा हुआ मल निकल गया तो उस युवती का पेट दर्द ठीक हो गया।
इस पर उस युवती के परिजन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने बाबा जी को कुछ रुपये देने चाहे तो उन्होंने लेने से मना कर दिया।
फिर बाद में उन्होंने मेरे बाबा जी को किसी अवसर पर जिमा कर उन्हें नकद दक्षिणा और एक जोड़ा वस्त्र दिये थे।
■ Disclaimer: इस पोस्ट को पढ़ कर स्वयं या दूसरे बंधु पर किसी कुशल वैद्य के परामर्श पर ही पेट दर्द / कब्ज के इलाज की इस विधि को अपनायें।
✍️ अनिल कौशिश
भारत में आँखों की सर्जरी का इतिहास दो सौ वर्ष पुराना
Written by:- सुरेश चिपलूनकर
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भारत में 200 वर्ष पहले आँखों की सर्जरी होती थी...शीर्षक देखकर आप निश्चित ही चौंके होंगे ना!!! बिलकुल, अक्सर यही होता है जब हम भारत के किसी प्राचीन ज्ञान अथवा इतिहास के किसी विद्वान के बारे में बताते हैं तो सहसा विश्वास ही नहीं होता. क्योंकि भारतीय संस्कृति और इतिहास की तरफ देखने का हमारा दृष्टिकोण ऐसा बना दिया गया है
मानो हम कुछ हैं ही नहीं, जो भी हमें मिला है वह सिर्फ और सिर्फ पश्चिम और अंग्रेज विद्वानों की देन है. जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है. भारत के ही कई ग्रंथों एवं गूढ़ भाषा में मनीषियों द्वारा लिखे गए दस्तावेजों से पश्चिम ने बहुत ज्ञान प्राप्त किया है... परन्तु "गुलाम मानसिकता" के कारण हमने अपने ही ज्ञान और विद्वानों को भुला दिया है.
भारत के दक्षिण में स्थित है तंजावूर. छत्रपति शिवाजी महाराज ने यहाँ सन 1675 में मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी तथा उनके भाई वेंकोजी को इसकी कमान सौंपी थी. तंजावूर में मराठा शासन लगभग अठारहवीं शताब्दी के अंत तक रहा. इसी दौरान एक विद्वान राजा हुए जिनका नाम था "राजा सरफोजी". इन्होंने भी इस कालखंड के एक टुकड़े 1798 से 1832 तक यहाँ शासन किया. राजा सरफोजी को "नयन रोग" विशेषज्ञ माना जाता था. चेन्नई के प्रसिद्ध नेत्र चिकित्सालय "शंकरा नेत्रालय" के नयन विशेषज्ञ चिकित्सकों एवं प्रयोगशाला सहायकों की एक टीम ने डॉक्टर आर नागस्वामी (जो तमिलनाडु सरकार के आर्कियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष तथा कांचीपुरम विवि के सेवानिवृत्त कुलपति थे) के साथ मिलकर राजा सरफोजी के वंशज श्री बाबा भोंसले से मिले. भोंसले साहब के पास राजा सरफोजी द्वारा उस जमाने में चिकित्सा किए गए रोगियों के पर्चे मिले जो हाथ से मोड़ी और प्राकृत भाषा में लिखे हुए थे. इन हस्तलिखित पर्चों को इन्डियन जर्नल ऑफ औप्थैल्मिक में प्रकाशित किया गया.
प्राप्त रिकॉर्ड के अनुसार राजा सरफोजी "धनवंतरी महल" के नाम से आँखों का अस्पताल चलाते थे जहाँ उनके सहायक एक अंग्रेज डॉक्टर मैक्बीन थे. शंकर नेत्रालय के निदेशक डॉक्टर ज्योतिर्मय बिस्वास ने बताया कि इस वर्ष दुबई में आयोजित विश्व औपथेल्मोलौजी अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में हमने इसी विषय पर अपना रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया और विशेषज्ञों ने माना कि नेत्र चिकित्सा के क्षेत्र में सारा क्रेडिट अक्सर यूरोपीय चिकित्सकों को दे दिया जाता है जबकि भारत में उस काल में की जाने वाले आई-सर्जरी को कोई स्थान ही नहीं है. डॉक्टर बिस्वास एवं शंकरा नेत्रालय चेन्नई की टीम ने मराठा शासक राजा सरफोजी के कालखंड की हस्तलिखित प्रतिलिपियों में पाँच वर्ष से साठ वर्ष के 44 मरीजों का स्पष्ट रिकॉर्ड प्राप्त किया. प्राप्त अंतिम रिकॉर्ड के अनुसार राजा सर्फोजी ने 9 सितम्बर 1827 को एक ऑपरेशन किया था, जिसमें किसी "विशिष्ट नीले रंग की गोली" का ज़िक्र है. इस विशिष्ट गोली का ज़िक्र इससे पहले भी कई बार आया हुआ है, परन्तु इस दवाई की संरचना एवं इसमें प्रयुक्त रसायनों के बारे में कोई नहीं जानता. राजा सरफोजी द्वारा आँखों के ऑपरेशन के बाद इस नीली गोली के चार डोज़ दिए जाने के सबूत भी मिलते हैं.प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार ऑपरेशन में बेलाडोना पट्टी, मछली का तेल, चौक पावडर तथा पिपरमेंट के उपयोग का उल्लेख मिलता है. साथ ही जो मरीज उन दिनों ऑपरेशन के लिए राजी हो जाते थे, उन्हें ठीक होने के बाद प्रोत्साहन राशि एवं ईनाम के रूप में "पूरे दो रूपए" दिए जाते थे, जो उन दिनों भारी भरकम राशि मानी जाती थी. कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय इतिहास और संस्कृति में ऐसा बहुत कुछ छिपा हुआ है (बल्कि जानबूझकर छिपाया गया है) जिसे जानने-समझने और जनता तक पहुँचाने की जरूरत है... अन्यथा पश्चिमी और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा भारतीयों को खामख्वाह "हीनभावना" से ग्रसित रखे जाने का जो षडयंत्र रचा गया है उसे छिन्न-भिन्न कैसे किया जाएगा... (आजकल के बच्चों को तो यह भी नहीं मालूम कि "मराठा साम्राज्य", और "विजयनगरम साम्राज्य" नाम का एक विशाल शौर्यपूर्ण इतिहास मौजूद है... वे तो सिर्फ मुग़ल साम्राज्य के बारे में जानते हैं...).
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