अंग्रेज़ खुद भी बाहरी थे और सबको बाहरी बना दिए
तथाकथित मूल निवासी के रूप में स्वयं का प्रचार करने वालों पर ध्यान दें, इनमे से ज्यादातर वामपंथियों के गढ़ में ट्रेनिंग पाए जीव होते हैं | अपनी प्रोफाइल में "गौतम", "वसिष्ठ" इत्यादि नाम जोड़े हुए ये जीव तरीके भी लगभग वही इस्तेमाल करते पाए जाते हैं |
कभी भी गौर कीजिये, कैसे सवालों के जवाब मिलते ही ये महानुभाव भागते नजर आएंगे जितना ज्यादा आप इनके झूठ का पर्दाफाश करते जायेंगे उतने ही काम इन्हें याद आयेंगे | बाकि सबसे अभद्र भाषा का प्रयोग करके ये अपनी पोस्ट को जिन्दा रखने का कुत्सित प्रयास जारी रखेंगे | लेकिन किन्तु परन्तु जैसे ही जवाब मिलने लगेंगे ये फ़ौरन भागेंगे |
दरअसल इनका उद्देश्य भावनाओं को भड़का कर निंदा करना होता है | इनसे निपटने का सबसे आसान तरीका इनके तर्कों का तर्क से विरोध करना होता है | गाली गलौच में इन्हें बच निकलने का मौका मिल जाता है | ऐसे अवसर ना दें | तर्क का जवाब मांगिये | अपने जवाबी कमेंट को दोबारा पेस्ट कर के पूछिए की आप जवाब क्यों नहीं दे रहे | मक्कारी क्यों दिखा रहे हैं ? राम के जन्म पर उठाए विवाद के जवाब में गाली देकर आप अपना तर्क कमज़ोर करते हैं | भागने का मौका मत दीजिये |
पूछिए की अम्बेदकर की दूसरी शादी के इतने दिन बाद धर्म परिवर्तन क्यों किया ? क्या बीवी इजाजत नहीं दे रही थी ? अगर वो कह बैठे की बीवी की इजाजत से धर्म परिवर्तन करने की जरुरत नहीं थी तो याद दिलाईये की कानून मंत्री थे अम्बेदकर | बिना पत्नी की इजाजत के धर्म परिवर्तन पर हिन्दू मैरिज एक्ट में तलाक लिया जा सकता है | 1956 में मरने से कुछ ही समय पूर्व अम्बेदकर ने धर्म परिवर्तन किया था |
गाली गलौच करके आप उन्हें भागने का मौका देते हैं और अपने तर्क को कमज़ोर सिद्ध करते हैं |
#मुझेरावणयादआताहै (फिर से)
मुझे ताड़का याद आती है। उसे यज्ञों का विध्वंस करना है, इसके लिए वो सभी मन्त्र जानने वालों की हत्या नहीं करती, वो सारी सामग्री चुरा नहीं भागती। वो बस हवन-कुण्ड में एक हड्डी फेंक जाती है। विदेशी आक्रमणों में हुए जौहर का इतिहास बिगाड़ना था तो बहुत मेहनत नहीं करनी, “पद्मिनी” नाम था या “पद्मावती” इसमें संशय पैदा कर देना भी बहुत है। एक हड्डी ही तो फेंकनी थी, इसलिये ताड़का और राक्षसी तरीका याद आता है।
मुझे सिंहिका राक्षसी याद आती है। ये जीव को नहीं उसकी परछाई को दबोच लेती थी, परछाई को त्यागने में असमर्थ जीव खुद उसके चंगुल में चला आता था। कोई बंधन ना हो, स्वतंत्रता युवाओं को प्रिय होती है, इसलिए वो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर युवाओं को ही बहकाती हैं। संतान तो अपनी ही परछाई सी है, उसे छोड़कर लोग कहाँ जायेंगे ? बच्चों के पीछे वो खुद ही फंसा, चला आता है।
मुझे कालनेमि याद आता है। उसे हनुमान को ठगकर, उन्हें समय से संजीवनी ले आने से रोकना है इसलिए वो साधू का वेष बनाता है। बिलकुल वैसे ही जैसे बड़े से तिलक, भगवा वस्त्रों और मोटी-मोटी मालाओं में खुले बालों वाली स्त्रियाँ टीवी बहसों में “पद्मावती” फिल्म के समर्थन में उतरी हैं। उन्हें भी बस फिल्म के विरोधियों का विरोध थोड़ा कम करना है। वो जीतेंगी नहीं, कालनेमि जैसा ही उन्हें भी पता है, इसलिए मुझे कालनेमि याद आता है।
मुझे मारीच याद आता है। उसे पता है वो गलत कर रहा है, लेकिन जिनके राजाश्रय में पल रहा है उनकी आज्ञा से बाध्य भी तो है ! वो भेष बदलता है, सोने का मृग बनकर सीता को लुभाने पहुँच जाता है। अंतिम समय तक भी छल नहीं छोड़ता, “हे राम” कहते ही मुक्ति मिलेगी ये जानकार भी “हा लक्ष्मण, हा सीते” चिल्लाता है। फिर वो कलाकार दिखते हैं जो कल निर्माताओं के पैसे पर पले और कल फिर उनके ही पास काम मांगने जाना है। उधार के तीस किलो का लहंगा और कई किलो के जेवर पहनकर वो लुभाने आ जाते हैं, अंत तक “मेरी बरसों की मेहनत डूबी” का रोना रोते हैं। भेष बदलकर वो स्त्रियों को लुभाने आये, इसलिए मारीच भी याद आता है।
मुझे रावण याद आता है। वो ज्ञानी है, लक्ष्मण रेखा क्यों लांघनी चाहिए इसके लिए नीति-धर्म की ही दुहाई देता है। अपने तरीकों, शालीनता, सभ्यता-संस्कृति की सीमाओं के अन्दर मौजूद सीता का वो अपहरण नहीं कर सकता। विमान, सेनाएं, बल-ज्ञान सब उसपर बेकार होगा ये जानता है। इसलिए वो बहकाकर सीता को लक्ष्मण-रेखा के बाहर लाना चाहता है। उसे पता है कि आग से जल सकते हो दूर रहो बच्चे को समझाया जा सकता है, गालियाँ क्यों नहीं सीखनी, इसमें गलत क्या है ? ये समझाना मुश्किल है। बस “माय चॉइस”, “फासीवाद के विरोध”, “आखिर ऐसा होगा क्या देख भर लेने से”, “चल देखें कुछ गलत दिखाया भी या नहीं”, जैसे किसी बहाने से दिखा देना है।
इसलिए मुझे रावण याद आता है।
✍🏻आनन्द कुमार
विक्रम बेताल की कहानी में एक साधू वेश धारी राजा विक्रम का सहकार्य मांगता है एक भीषण साधना के लिए। एक विशिष्ट पेड़ से लटकता हुआ एक शव उतार कर उसे अपने कंधों पर लादकर एक स्मशान में आना है जहां वो 'साधू' उसकी प्रतीक्षा कर रहा होगा।
आगे, प्रेत में बैठा बेताल राजा से संवाद करता है और पच्चीस कहानियाँ सुनाता है यह आप ने पढ़ा ही होगा। लेकिन अंत में बेताल उसे कहता है कि जिसे तू साधू समझता है वो एक दुष्ट तांत्रिक है और तू जो समझता है कि साधना का जो फल होगा उससे तेरे राज्य का लाभ होगा तो तू गलत समझ रहा है, वो तेरी ही बलि चढ़ाना चाहता है ताकि उसको वो सिद्धियाँ और वे लाभ प्राप्त हो।
बेताल उसे सुझाव देता है कि विक्रम को ही उस दुष्ट की बलि चढ़ानी चाहिए, और ये कैसे होगा वह भी बेताल समझा देता है। विक्रम वैसे ही करता है।
ऐसी ही कथा कालनेमी की है। रावण भी साधू वेश में ही आया था जिसने सीता का अपहरण धर्म के नियमों का वास्ता देकर ही किया था कि दान देने के लिए लक्ष्मण रेखा लांघनी पड़ी।
इन प्रसंगों की सीख कालजयी है क्योंकि आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं। जैसे विक्रम से शव लेकर आने की मांग की गई जो अपने आप में एक दुष्कर कर्म था लेकिन उसके सामने राज्य के लिए उपलब्धियों की लालच भी दिखाई गई तो असल में यह राजधर्म को ही आवाहन था। लेकिन क्या उस साधू की मंशा सही थी ? राजा विक्रम की बलि चढ़ाना चाहता था। कालनेमी, रावण ?
आज भी ऐसे दिखते हैं जो धर्म के नाम पर दुष्कर मांगें उठाते हैं। सब में समान धागा एक ही होता है कि ये मांगें हिन्दू और हिन्दुत्व इन शब्दों का प्रयोग कर के उठाई जाती हैं। नोट करें कि मैंने "हिन्दू और हिन्दुत्व इन शब्दों का प्रयोग कर के" लिखा है, "हिन्दू और हिन्दुत्व के लिए" नहीं लिखा क्योंकि उन मांगों के उद्देश्य राजा विक्रम की बलि चढ़ाने से बहुत अलग नहीं होते। मांगें व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं होती ताकि वे कह सकें कि इसका मुझे कोई फायदा थोड़े ही है ? सब को इसका फायदा होगा। लोग इसी से झांसे में आते हैं और नुकसान की सोचते ही नहीं।
✍🏻आनन्द राजाध्यक्ष
गुजरात में गिरनार की पहाड़ियों के पास जूनागढ़ है | जहाँ से गिर वन शुरू होते हैं वहां से थोड़ा ही दूर है | यहाँ अशोक का एक शिलालेख है | इसमें बताया गया है की चन्द्रगुप्त मौर्य के एक सामंत पुष्यगुप्त ने यहाँ एक झील बनवाई थी, अशोक के समय तुशास्पा (जो की शायद ग्रीक था) उसने इस झील का काम पूरा करवाया |
इसके नीचे शक (Scythian) राजा रूद्रदमन का लेख जोड़ा गया है | रूद्रदमन ने अपने शिलालेख में लिखवाया है की 72 वें साल ( शायद 150 AD) में एक बाढ़ और तूफ़ान से झील के नष्ट हो जाने के बाद उन्होंने इसका पुनः निर्माण करवाया | रुद्रदमन बड़े गर्व से बताते हैं की इसके लिए उन्होंने अतिरिक्त कर या जबरन किसी से मजदूरी नहीं करवाई | कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती | इसके नीचे तीन सौ साल बाद गुप्त वंश के स्कंदगुप्त लिखवाते हैं कि 455-56 AD के दौरान इस झील को फिर से ठीक करवाने का काम उन्होंने करवाया |
दरअसल जूनागढ़ का शाब्दिक अर्थ ही पुराना किला होता है | माना जाता है की कृष्ण की सेना ने यहाँ किला बनवाया था | बाद में शक, राजपूत, मुस्लिम कई राजाओं ने यहाँ राज किया | 1947 में भारत की आजादी के समय भी जूनागढ़ के अनोखे किस्से हैं | उन्हें कभी बाद में देखेंगे |
यहाँ सबसे मजेदार होता है अशोक का शिलालेख | अपने किसी भी शिलालेख में अशोक अपना नाम अशोक नहीं लिखवाते थे | उनका नाम प्रियदर्शी लिखा होता है | लगभग सारे ही उस काल के शिलालेख पाली में लिखे होते हैं | अब इतिहासकारों के लिए बड़ी समस्या हुई | प्रियदर्शी नाम समझ आये, पाली लिपि से मौर्य वंश का काल भी समझ आता था | मगर ये राजा कौन सा था ये पता नहीं चल पाता था |
रोमिला थापर ने कई शिलालेखों का अनुवाद तो किया मगर अब भी अशोक को स्थापित करने में दिक्कत थी | नाम और वंशावली तो कहीं लिखी ही नहीं थी | ऐसे में पुराण काम आये | जी हाँ वही हिन्दुओं वाले धर्मग्रन्थ पुराण | मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण और वायु पुराण में मौर्य वंश की पूरी वंशावली ही लिखी थी | तो उनके जरिये ये पक्का किया जा सका की ये जो प्रियदर्शी है वही अशोक है |
अच्छा हाँ, रोमिल थापर ने जहाँ से अशोक की वंशावली ली वो पुराण जो हैं वो मिथक हैं, इतिहास नहीं है | ठीक है ?
✍🏻आनन्द कुमार
अंग्रेज़ों ने सबको बाहरी बना दिया ।
थोड़ा विश्व इतिहास देखिए और समझिए ।
पूरा इंग्लैंड ( और यह बात दुनिया के सभी इतिहासकार और वैज्ञानिक मानते हैं ) या तो “ वाइकिंग” है या तो “सैक्सन” ।
ध्यान से पढ़िए । इंग्लैंड में केवल 2500 वर्ष पहले तक ( जब भारत ज्ञान के क्षेत्र में आज से हज़ारों वर्ष आगे था और सभ्य था ) जो मूल निवासी थे वह लगभग बिना कपड़े वाले जंगली थे ।
लगभग 2000 वर्ष पहले, रोमन्स ने इंग्लैंड के मूल निवासियों पर और कुछ एरिया में जहाँ पर जर्मनी के गड़ेरिए रहते थे ( जिनको एंग्लो सैक्सन कहा जाता है ) का पिछवाड़ा तोड़ा ।
बाद में वाइकिंग्स ( जो समुद्री दस्यु थे डेनमार्क इत्यादि के ) ने इंग्लैंड पर आक्रमण किया । मूल निवासियों को वेल्स इत्यादि में खदेड़ दिया गया ।
आज के इंग्लैंड पर पूरी तरह से एग्लों सैक्सन या वाइकिंग्स का ही क़ब्ज़ा है । अंग्रेज़ , जिस प्रकार रोमन्स से पिटे थे , उससे एक बात सीख लिए , बाँटो और राज्य करो ।
पहले काटो, यदि नही काट पाए तो , फूट डालकर बाटों और लूटो का फ़ार्मूला पूरी दुनिया में चलाया गया ।
01. कनाडा के लगभग सभी मूल निवासी मार दिए गए । एक आध परसेन्ट बचे हों तो बचे हों ।
02. अमेरिका, आस्ट्रेलिया और न्यू ज़ीलैंड में भी वही किया गया ।
03. स्पेनिश, पुर्तगालियों ने भी अरेंजटिना , ब्राज़ील , मैक्सिको , गोवा, फ़िलीपींस में काट बाट करके कन्वर्ट कर दिया ।
ध्यान दीजिए , आज के पूरा इंग्लैंड, बाहरी है । इंग्लैंड की रानी एलिज़ाबेथ भी ऐग्लो सैक्सन ( जर्मन मूल की है ) । तो जब अंग्रेज़ , भारत पहुँचे तो काटो बाटो , कन्वर्ट करो , लूटो के साथ साथ , आर्यों की थ्योरी लेकर आए ।
अब इस विषय में और अधिक लिखकर आपका समय व्यर्थ नही करना चाहता , मैं बात , आप के उपर लेकर चलता हूँ । आप अपने गाँव जाइए , और आपको बताया जाएगा कि मूलत: आप इस गाँव के नहीं है बल्कि आप फलनवे गाँव से आपके पूर्वज यहाँ आए हैं ।
100 वर्षो में अंग्रेज़ों ने आर्यों वाली थ्योरी के साथ साथ , हर गाँव के हर व्यक्ति को उस गाँव का न बताकर बाहरी बना दिया । ऐसा नही है कि लोग इधर से उधर नहीं जाते है, पर बाहरी बताकर अपराध बोध से भरना कुछ और बात होती है ।
अंग्रेज़ खुद भी बाहरी थे और सबको बाहरी बना दिए , Micro लेवल पर, और आर्यों वाली थ्योरी चला दिए Macro लेवल पर ।
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