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दर्पण

दर्पण

जब मैने
दर्पण में
स्वयं को देखा
तो पाया
अपने चेहरे में
अपने पिता का
प्रतिबिम्ब
जिसमें छुपा था
जिम्मेदारियों का अहसास
सुख दुखः के
अनुभवों का
अनकहा इतिहास।
बस
मैं भूल गया
खुद को
और बन गया
अपने पिता जैसा
जीने लगा
जिम्मेदारियों को
और 
लिखने लगा
फिर
नया इतिहास।

जब मैं
देख रहा था
प्रेयसी की
मदमस्त आँखों में
मैने देखा
सपनों का लहराता
समुद्र
जिसमें प्यार की
उफनती लहरें थी
चाँद पाने की
चाह थी
और
छुपा था
सागर के सारे मोती
दामन में
समेटने का
अनकहा सपना।

अब मैनें
एक नन्हें बचपन की
आँखों में
झाँककर देखा
तो पाया
जिज्ञासाओं का
विस्तृत आकाश
सूरज की गर्मी में भी
शीतलता की चाह
मरूस्थल में
हरियाली की राह
निश्छल प्यार
सौम्य व्यवहार
सपनों को
पूरा करने का
स्वपनिल संसार।

और 
तब मैं
सब भूलकर
बस 
एक बच्चा बन गया।

अ कीर्तिवर्धन
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