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सौंदर्य और सुगंध

सौंदर्य और सुगंध

       --:भारतका एक ब्राह्मण.
        संजय कुमार मिश्र "अणु"
सौंदर्य और सुगंध
पहचान है हमारी।
तभी तो हर समय-
खोजती दुनिया सारी।।
       अवसर चाहे जो हो-
       जन्म या फिर मरण।
       खोजते हैं सब मुझे-
       हो नयन,नाक,श्रवण।।
बात श्रद्धा की हो-
या फिर विश्वास की।
एक हमें लोगों ने-
हमेशा तलाश की।।
        आगत के स्वागत में-
        फूल और माला।
        लेते-देते है परस्पर-
        हो अंधेरा या उजाला।।
कोई भेद नहीं है-
मेरे चाहने वालोंं में।
ऊंच-नीच,बड़ा-छोटा-
या गोरे कालों में।।
        उठे अर्थी या डोली-
        सब जगह मे मैं हूं।
        देश की सीमा से परे-
        आशीर्वाद और जै हूं।।
कौन है मेरे समान?
जिसे सब चाहते हैं।
सब हर परिस्थिति में-
साथ रिश्ता निभाते हैं।।
         कभी नीचे पड़ा चरणों में-
          कभी बनता कंठहार हूं।
          कहते हैं सब लोग मुझे-
          सृष्टि का दिव्य उपहार हूं।।
कहीं आन,बान,शान-
कहीं चरणों का धूल हूं।
कहता हैं हर मन सुमन-
सृष्टि का अवदान फूल हूं।।
           हो जनता या नेता-
           क्रेता या फिर विक्रेता।
           मुझे देख खिलता चेहरा-
           हो पराजित या विजेता।।
मैं देता हूं सम्मान-
सबको एक समान।
किसी से भेद नहीं-
हो धरती या आसमान।।
             कोई मुझे त्यागता नहीं- 
             सब करता कबूल हैं।
             सृष्टि का अनुपम आधार
             मन-सुमन है फूल है।।
वलिदाद अरवल (बिहार)804402..
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