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‘भारतीय कानून व्यवस्था : परिवर्तन की आवश्यकता’ विषय पर विशेष संवाद !

‘भारतीय कानून व्यवस्था : परिवर्तन की आवश्यकता’ विषय पर विशेष संवाद !

ब्रिटिशों द्वारा भारतीयों को गुलाम बनाने के लिए बनाए कानून आज भी बनाए रखना, राष्ट्र के लिए घातक !
 - अधिवक्ता अंकुर शर्मा, अध्यक्ष, इक्कजूट जम्मू 

    वर्तमान 'भारतीय कानून व्यवस्थाब्रिटिशों के कालोनाइजेशन की परंपरा है । 1857 के विद्रोह के उपरांत ब्रिटिशों ने भारतीयों पर अत्याचार करने एवं उन्हें गुलाम बनाने के लिए जो कानून निर्माण किएउन्हें देश स्वतंत्र होने पर भी भारत में बनाए रखना  राष्ट्रविरोधी कृत्य ही हैऐसा स्पष्ट प्रतिपादन 'जम्मू इक्कजूटसंगठन के अध्यक्ष तथा जम्मू उच्च न्यायालय के अधिवक्ता अंकुर शर्मा ने किया । अगस्त से दिल्ली के जंतर-मंतर सहित पूर्ण देश में ब्रिटिशकालीन 222 कानून जलाने का राष्ट्रव्यापी आंदोलन हुआ है । उस पृष्ठभूमिवर हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से आयोजित 'भारतीय कानून व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता' इस विषय पर आयोजित 'ऑनलाइनविशेष संवाद में वे बोल रहे थे ।

     संवाद में बोलते हुए अधिवक्ता अंकुर शर्मा ने आगे कहा कि आज भी देश में समान नागरिक संहिता नहीं हैगोहत्या करनेवालों को मृत्युदंड अथवा आजीवन कारावास का दंड नहींजनसंख्या नियंत्रण एवं आतंकवाद विरोधी कठोर कानूनों का तीव्र विरोध किया जाता है । अनेक कानून ऐसे है कि जिनमें देशहित नहींतथापि हम उनमें परिवर्तन नहीं कर सकते । यह हमारे भारत का नियंत्रण अन्यों के नियंत्रण में जाने का सूचक है ।
   राजस्थान उच्च न्यायालय के अधिवक्ता मोतिसिंह राजपुरोहित ने कहा कि प्रत्येक देश के कानून उस देश के प्रमुख धर्म का प्रतिनिधित्व करते हैं । ब्रिटिशों द्वारा बनाए कानूनों का मूल उद्देश्य ईसाई पंथ का प्रसार करना था । उन कानूनों में भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों को नष्ट करने की संकल्पना हैइसलिए उन्हें  निरस्त करना चाहिए । भारतीयों की आस्था और संस्कृति पर आधारित कानून देश में लागू करने चाहिए ।

      संवाद में 'लष्कर--हिंदके राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीईश्‍वरप्रसाद खंडेलवाल ने कहा कि कानून देश की आत्मा होती है । अंग्रेजों ने भारतीयों को गुलाम बनाकर उन्हें लूटने के लिएअन्याय करने हेतु बनाए कानून हम आज भी स्वीकार रहे हैंतो वास्तव में हम आज भी स्वतंत्र नहीं है । हमारे देश में आतंकवादियों के लिए रात में भी सर्वोच्च न्यायालय खोला जाता हैपरंतु संतों के लिए नहीं खोला जातायह विचित्र है । आज भी न्यायव्यवस्था में बैठे लोग न धर्म से परिचित हैन भारतीय परंपरा सेइसलिए उनके द्वारा दिए जानेवाले अधिकांश निर्णय भारतीय संस्कृति के विरोध में होते हैंजो भारतीय कभी नहीं स्वीकारेंगे ।
   हिन्दू विधिज्ञ परिषद के संगठक अधिवक्ता नीलेश सांगोलकर ने कहा कि ब्रिटिशों द्वारा क्रांतिकारियों और भारतीयों को प्रताड़ित करने हेतु बनाए गए 222 कानून आज भी लागू हैं । साथ ही हिन्दुओं पर धार्मिक अन्याय करनेवाला 'प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्टजैसे अनेक धर्मविरोधी कानून हैं । उनके विरोध में भी हमें संघर्ष करना होगा ।

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