प्यार किया है खेल नहीं
~ डॉ रवि शंकर मिश्र "राकेश"
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मैं एक नीरा देहाती मुंडा,
तु बड़े शहर की चिड़ियाँ,
हम दोनों की मिलन से,
बता क्यों चिढ़ती दुनियाँ।
इस जोड़ी का मेल कहाँ,
बिना पटरी का रेल कहाँ,
दो जातियों में प्रेम कहाँ,
शादी रश्म है खेल कहाँ।
गाँव - घर से निकली बोली,
जैसे छूटे बंदूक से गोली,
इतना क्यों लोग खार खाए,
किसमें दम जो रोक पाए।
क्या हमको बुझा है बच्चा,
देता मैं बड़े बड़े को गच्चा,
हमको कोई पकड़ न पाए,
बंधनों में जकड़ न पाए।
है समुंदर जैसा गहरा प्यार,
प्यार में डुबा बीच मझधार,
मुकद्दर में है वही सो होए,
कायर सर पकड़ कर रोए।
सहनुभूत की बात नहीं,
प्रेमी देखता जात नहीं,
कैद रखे ऐसा जेल नहीं,
प्यार किया है खेल नहीं।
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