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हास्य-व्यंग्य का कवि हूँ मैं

हास्य-व्यंग्य का कवि हूँ मैं 

हास्य व्यंग्य का कवि हूँ मैं,
नाम है अरविन्द अकेला,
हास्य बन गयी जिंदगी मेरी,
लगा व्यंग्य का मेला।
    आरक्षण का शिकार हुआ,
    बेरोजगारी से लाचार हुआ,
    अपनों ने लूटा है मुझको,
     झेल रहा हूँ झमेला।
वीर रस ले गयी पत्नी मेरी,
नेता ले गये श्रींगार,
करूण बन गया मेरा जीवन,
मिठास ले गया चला। 
     गरीबी में छोड़ गये मेरे अपने,
     रह गया मैं "अकेला",
     नहीं मिली जब नौकरी कोई,
     लगा रहा हूँ कहीं ठेला।
      -------000-----
      अरविन्द अकेला
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