स्वागतम देवी
संकलन अश्विनी कुमार तिवारी
दुनिया में जब भारत के अलावा कहीं सभ्यता और ज्ञान नहीं था तो ऋषियों ने हमारे पूर्वजों को आदेश देते हुये कहा था- 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' यानि जाओ और जाकर दुनिया को भद्र बनाओ, श्रेष्ठ बनाओ, उन्हें सुसंकृत करो और जाकर उनका हृदय जीतो।
उस ज़माने की कल्पना कीजिये जब हवाई जहाज, पानी के यांत्रिक जहाज, ट्रेन, बस और कार तो दूर यातायात के सामान्य सुलभ साधन नहीं थे, सड़कें नहीं थी, गूगल मैप तो दूर कोई नक्शा भी नहीं था, तब भी हमारे पूर्वज उस आदेश का अनुपालन करने निकल गये। वो जहाँ जा रहे थे वहां और भी कई तरह की कठिनाइयाँ थीं। कहीं की भाषा भिन्न थी, कहीं का समाज बर्बर और हिंसक था, कहीं के समाज में आसुरी शक्तियों का प्राबल्य था और कहीं-कहीं का समाज तो बाहरी लोगों को देखना तक पसंद नहीं करता था। किसने प्रेरित किया उन्हें अगम्य और दुर्गम यात्राएं करने के लिए सिवाय मानव जाति के प्रति करुणा और उन्हें श्रेष्ठ और सुसंस्कृत बनाने के भाव के?
और जब लोग मानव जाति के लिए अपनी करुणा लिए निकले तो अपने साथ क्या लेकर गये? क्या वो अपने साथ हथियार लेकर गये? नहीं ! बल्कि वो साथ लेकर गये स्थापत्य, सभ्यता, दर्शन, नीतिशास्त्र, तुलसी रामायण, चिकित्सा शास्त्र, ज्ञान-विज्ञान, खगोल विज्ञान, ज्योतिष, नाट्य शास्त्र और मानव-जाति के त्राण के लिए असीमित करुणा।
भारत के दक्षिण-पूर्व में एक देश है कम्बोडिया, वहां की एक राजकन्या थी सोमा। उसको खबर मिली कि भारत देश की तरफ से जलपोतों पर सवार एक दल उसकी भूमि उतरा है तो अपनी भूमि की रक्षा करने के लिए वो अपने सेना के साथ निकल पड़ी। जब उस दल के अगुआ युवक के सामने पहुँची तो उस समय वो और उसकी पूरी सेना नग्न अवस्था में थे। उन सबको पता ही नहीं था कि वस्त्र क्या होते हैं। भारत से आने वाले जलपोत के नायक ‘शैलराज कौन्डिल्य’ के लिए ये दृश्य बड़ा विस्मयकारी था कि एक स्त्री बिलकुल नग्न भी किसी के सामने आ सकती है। प्रखर मेघा के स्वामी कौन्डिल्य समझ गए कि मामला क्या है और उन्होंने एक कपड़े को तीर में लपेटा और सोमा की तरफ छोड़ दिया। सोमा समझ नहीं पाई कि इसका क्या करना है तो कौन्डिल्य ने इशारे से उसे समझाया कि इस वस्त्र को अपने शरीर पर लपेट लो और उनके समझाने के बाद सोमा ने वही किया। उसने बाद सोमा को समझ में आया कि जिनको वो आक्रांता समझ रहे हैं वो तो दरअसल सभ्यता सिखाने वाले लोग हैं।
एक ‘हिन्दू’ जब कौन्डिल्य बनकर कंबोडिया पहुँचा तो तो उसने नग्न रहने वाले कम्बुज लोगों की हँसी नहीं उड़ाई बल्कि उसने उनको वस्त्र पहनना सिखाया। सु-संस्कृत करने का ये प्रयास और भी आगे जाए इसके लिए कौन्डिल्य ने उस कन्या सोमा से विवाह कर लिया और उसके बाद कंबोडिया उत्कृष्ट सभ्यता की गवाह बन गई। वहां संस्कृत भाषा पहुँची, उन्होंने रोज स्नान करना, साफ तथा स्वच्छ रहना सीखा, वहां धान की खेती पहुँची, नहरों का जाल बिछाया गया, कौन्डिल्य ने बर्बर और जंगली लोगों को कुशल व्यापारी बना दिया। जंगलों और गुफाओं में रहने वाले कम्बोज लोगों को हमारे पूर्वजों ने स्थापत्य सिखाई और इसमें वो लोग इतने आगे पहुँचे कि 12वीं सदी में वहां बने अंकोरवाट के मंदिर आज भी आधुनिक दुनिया के लिए कौतूहल का विषय है।
हमारे पूर्वजों को दुनिया में जहाँ-जहाँ का मानव समाज कुरीतियों से ग्रस्त होकर अज्ञान और अशिक्षा के दलदल में दिखा वो वहां-वहां उनको भद्र बनाने गए, उनका दिल जीतने गए। दिल जीतने के इसी निश्चय को पूरा करने महर्षि कण्व मिश्र देश गये थे और वहां जाकर वहां के लोगों को देवभाषा संस्कृत पढ़ाकर सुसंस्कृत किया था। इसी निश्चय को लेकर उद्दालक मुनि पाताल देश अमेरिका और कश्यप तथा मातंग मुनि चीन गये थे, इसी निश्चय को लेकर अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा था और न जाने कितने ही बौद्ध भिक्षुओं ने श्रमसाध्य यात्रायें करते हुए पूरी धरती को अपने क़दमों से नाप दिया था ताकि इस निश्चय की पूर्ति हो सके। इसी निश्चय को पूरा करते हुए गुरु नानक देव जी की उदासियाँ हुई थी जिसमें उन्होंने मक्का, मदीना, बग़दाद, सीलोन, बुखारा, बल्ख तक की यात्राएँ करते हुए वहां के लोगों को धर्म का सच्चा स्वरूप सिखाया था। इसी निश्चय को लेकर स्वामी रामतीर्थ और स्वामी विवेकानंद मज़हब के नाम पर हो रहे झगड़े और पांथिक मतभेदों के कोढ़ से शापित दुनिया को सहिष्णुता और समादर का ज्ञान देने निकले थे; जबकि उनकी जेब में एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी। इसी निश्चय को लिए भक्ति-वेदांत प्रभुपाद निकले जिन्होंने ईश्वर से विमुख हो रहे पश्चिमी जगत को ईश्वर से प्रेम करना सिखाया और इसी निश्चय के साथ परमहंस योगानंद और बाबा रामदेव पूरी दुनिया में अध्यात्म और योग का ज्ञान लेकर गये।
न तो महर्षि कण्व के समय और न ही आज, हम कहीं गये तो हमने कभी वहां की मूल संस्कृति का उच्छेद नहीं किया। अमेरिकी महाद्वीप का मय, इंका और अजोक संस्कृतियों में सबसे पहले हमारे कदम पड़े थे पर उनकी संस्कृति को नष्ट करने का कोई प्रयास हमने नहीं किया बल्कि हमने उनसे केवल ये कहा कि तुम बस सभ्यता के सूत्र हमसे लो और अपनी संस्कृति के आधार पर अपना उन्नयन करो।
मगर बीच के कालखंड में किन्हीं कारणों से हम अपनी सांस्कृतिक दिग्विजय की अभिलाषा को भूल गए जिसके नतीजे में ‘शैलराज कौन्डिल्य’ और उनके जैसे अनगिनत पूर्वजों की संताने दूसरे-दूसरे मत-पंथों और मजहबों में चले गए।
हमारे पूर्वजों ने जो ऐसे सद्प्रयास किये थे, उसपर हम कुपुत्रों ने भले ही पानी फेर दिया हो पर उनके सु-कर्म आज लौटकर आ रहे हैं जिसका परिणाम है 'सुकुमावती सुकर्णोपुत्री' का अपनी माँ, अपने धर्म की गोद में आना।
आपका स्वागत है देवी........उम्मीद है आप हिंदुत्व के अमृत घट को हमसे भी अच्छे से सहेज कर मानवता के लिए इसे आने वाली संततियों को सौंपेंगी 🙏
✍🏻अभिजीत सिंह
अब गंगा महतो जी की ये पुरानी पोस्ट -
कुछ महीने पुर्व अंडमान के ‘जारवा’ जनजाति के कुछ विडियोज देख रहा था यूट्यूब में.. बहुत ही आदिम जनजाति हैं ये.. अभी करीब 400 के ही आस-पास बचे हुए हैं.. बाहरी दुनिया से इनका कोई भी संपर्क नहीं.. लेकिन हाल-फिलहाल कुछ ने संपर्क करना ज़रूर शुरू किया था.. प्रकृति इन्हें जितना देती हैं उन्हीं में ये सुखी-सम्पन्न हैं। .. सबसे जरुरी बात कि ये कुछ पहनते नहीं हैं केवल माला वगेरह छोड़ के.. और मेरा यही कारण रहा था वो विडियोज देखने का.. फिर इसी क्रम में पता चला कि ये जनजाति तब बहुत चर्चा में आई जब एक अंग्रेज पत्रकार महोदय ने उनके कुछ विडियोज बनाये.. और विडियोज इस तरह के कि जारवा जनजाति की नग्न महिलाओं को नचवाया जा रहा हैं केवल कुछ स्वादिष्ट और लजीज भोजन के बदले.. फोटोज भी खिचवा रहे हैं.. और इस बहाने छेड़खानी भी। .. अब वो नग्न महिलाएं क्या जाने कि ये कपड़े पहने लोग क्या कर रहे हैं? और क्यों कर रहे हैं?
खैर ये छोड़िये.. मैं अपने गाँव की बात बताता हूँ.. अगल-बगल का भी पकड़ लीजिये.. आज से ज्यादा नहीं केवल 25-30 साल पहले और अब में कितना परिवर्तन आया हैं!?
तब टीवी केवल अपवाद ही हुआ करती थी.. रेडियो थे कुछ.. एक तरह से बोला जाय तो ज्यादा कुछ संपर्क नहीं था हमारा बाहरी दुनिया से.. हाँ कमाने-खाने के लिए कुछ जन शहर की ओर पलायन ज़रूर करने लगे थे .. लेकिन हम गाँव के थे तो गाँव के थे.. महिलाएं जंगल जाती थी और जलावन के लिए लकड़ी-काठी काट के लाती थी.. खेतों में काम करती थी.. खैर अब भी कर रही हैं, लेकिन मुख्य बात पे आते हैं.. गाँव में चापानल,कुंआ की सुविधा नहीं थी.. सभी जन गाँव के तालाब में ही नहाने जाते थे.. स्त्री घाट अलग तो थे लेकिन साथ में भी नहा ले तो कोई परेशानी नहीं थी.. महिलाएं/लड़कियां पेटीकोट में नहाये, साड़ी में नहाये.. पुरुष अंडरवियर या गमछे में नहाये.. और सब आमने सामने ही नहा रहे हैं.. अब नहा रहे है तो ये मतलब नहीं कि सब आँख मूँद के नहा रहे हैं.. एक दूसरे की ओर देखना तो आम बात.. लेकिन वो भावना कभी नहीं.. कोई कह भी सकता है कि आप कैसे कह सकते हो कि भावना न उठती हो? .. तो उत्तर यह है कि अगर भावना उठती तो परिणाम भी देखने को ज़रूर मिलते.. लेकिन नहीं। .. महिलाएं कभी-कभी भीगी साड़ी ही शरीर में लपेट के तालाब से घर आती।.. महिलाएं/लड़कियां जंगल जब तब जाती.. समूह में जाती, अकेले भी जाती, कभी भी जाती, बेख़ौफ़ जाती.. और जब जंगल से आती तो घुटने से ऊपर तक साड़ी को बाँध के सिर में बोझा लिए घर आती.. घर में आँगन में सबके सामने स्तन खुला करके बच्चे को स्तनपान कराती.. लेकिन कभी किसी के मन में कोई दुर्भावना नहीं.. क्यों ? .. क्योंकि इन्हें नैसर्गिक तौर पे देखा जाता था न कि सेक्स पार्ट की कसौटी पे।
लेकिन अब ? .. इन 25-30 सालों में कितना परिवर्तन आया ?
सबसे पहले तो अब स्त्री-पुरुष साथ में नहीं नहा सकते … क्यों ?
औरतें फिर भी जंगल चली जाय लेकिन लड़कियां? .. अकेले तो कभी भी नहीं और समूह में भी हिम्मत नहीं करती.. क्यों ?
खुले में स्तनपान कराना मुश्किल हो रहा हैं.. क्यों ?
परिवर्तन तो हुआ है और बड़ा हुआ है.. लड़कियां अब बोल्ड हुए जा रही हैं.. जीन्स-पेंट और टीशर्ट्स में खूब दिखने लगी हैं.. पढ़ने-लिखने लगी हैं.. लेकिन अकेले घर से बाहर ? .. कभी नहीं! .. क्यों ?
मेरे घर में टीवी साल 2000 में आई.. श्री कृष्ण,ॐ नमः शिवाय,जय हनुमान आदि सीरियल सभी जन मने बच्चे,बूढ़े,औरतें,लड़कियां सब एक साथ देखते थे.. लेकिन सिनेमा ज्यादातर लड़के ही देखते थे.. मैं उस टाइम पाँचवीं कक्षा में था.. हमें बच्चा कह के सिनेमा से दूर रखा जाता था अमूमन और अगर कभी देखने भी दिया गया तो गाने के टाइम भगा दिया जाता था.. खैर हमें क्या हमसे बस मार-पीट वाला सीन नहीं छूटना चाहिए बाकी छूटे तो छूटे।
एक दिन मेरी माँ,अगल-बगल की औरतें और कुछ बहुएँ जो शहर में पली बढ़ी थी, सब मिल के सन्डे का चार बजवा सनीमा देख रही थी.. हम भी थे.. गाँव की औरतें तो कुछ न जाने सिनेमा के बारे में.. लेकिन बहुएँ खूब जानती थी.. सनीमा शुरू हुआ तो हरेक चीज से बहुएँ परिचय करवा रही थी.. कौन क्या है नहीं है.. हीरो कौन है हीरोइन कौन है.. डॉट.. डॉट.. और इसी क्रम में पता चला कि अमिता बच्चन का सनीमा चल रहा है.. अब चल रहा है तो चल रहा है.. सब बड़े चाव से सनीमा देख रहे है.. तभी एगो गाना आता है.. गाना रोमांटिक वाला था.. तो रोमांस तो होना ही था.. तो अमिता बच्चन गले लगा-लगा कर हीरोइन के साथ डांस कर रहे थे और गाना गा रहे थे.. अब इतना देखना ही था कि गाँव की औरतें एकदम से चीख पड़ी.. “हाय गे मइया.. ईटा की करो हथीन एखनी गे मइया.. एकदम से अइसन.. हांय!!”
एक बहु “हाँ गो कइसन करा हा.. ई टा फिलिम लागे फिलिम.. तो अइसन करो हथीन.. एकर में अइसन चीखे के की बात!”
“हाँ गे बपढोहनी.. फिलिम लगे तो मने कि अइसन करबथीन.. एखनी की जैनी-मरद लगथीन?”
“जैनी-मरद तो नाय लगथीन.. लेकिन एखनी के ईटा करे के खातिर लाखों में पैसा मिलो है!”
“हाय गे मइया.. पैसा मिलते तो की अइसन केर भुलबथिन एकदम से छेगरी-पठरु लखे!”
“ऐ गो तोहनी के नाय देखना हो तो नाय देखा.. लेकिन अइसन नाय करा.. आईझ फिलिम कर जुग लागे.. समझली.. तोहनी के नाय सहाय रहल तो बाहर जा.. हमनी के आराम से देखल दा!”
“जो जूनढोहनी सब.. देख ला तोहनी ई सब.. हमनी के नाय देखना ई!”
………………………….
अब मैं तीनों चीजों को मिलाना चाहूँगा..
कुछ स्वादिष्ट भोजन के लिए नग्न नाचती जारवा महिलाओं को क्या मालूम कि ये हमें शूट क्यों कर रहे हैं? .. इन भोले-भाले मासूम नग्न जारवा महिलाओं को क्या मालुम कि कथित रूप से सभ्य और आधुनिक मानी जाने वाले दुनिया में नग्नता बिकती है। किंतु इसके ठीक विपरीत जो लोग धन का लालच देकर इनकी नग्नता के दृश्य कैमरे में कैद कर रहे थे, वे जरूर अच्छी तरह जानते थे कि यह नग्नता उनके व्यापारिक प्रतिष्ठान की टीआरपी बढ़ाने की सस्ती और जुगुप्सा जगाने वाली अचरज भरी वीडियो क्लीपिंग है।
हमारे देश की पुरातन और सनातन संस्कृति के परिवेश में नैसर्गिक और प्राकृतिक नग्नता कभी भी अश्लीलता और फूहड़ता का पर्याय नहीं रही हैं। पाश्चात्य मूल्यों और भौतिकवादी आधुनिकता ने ही प्राकृतिक व स्वाभाविक नग्नता को दमित काम-वासना की पृष्ठभूमि में रेखांकित किया है। वरना हमारे यहां तो खजुराहो, कोणार्क और कामसूत्र जैसे नितांत व मौलिक रचनाधर्मिता से स्पष्ट होता है कि एक राष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में हम कितनी व्यापक मानसिक दृष्टि से परिपक्व लोग थे। लेकिन कालांतर में विदेशी आक्रांताओं के शासन और उनकी संकीर्ण कार्य-प्रणाली ने हमारी सोच को बदला और नैसर्गिक नग्नता फूहड़ सेक्स का उत्तेजक हिस्सा बन गर्इ। इसीलिए कहना पड़ता है कि कथित रूप से हम आधुनिक भले ही हो गए हों, लेकिन सभ्यता की परिधि में आना अभी बाकी है।
जहाँ स्त्री को केवल मात्र उपभोग की वस्तु मान उसकी नग्नता को आधुनिकता की फूहड़ता में पुरुषों के मध्य बेचा/परोसा जा रहा है और पुरुष जहाँ अपनी पौरुष को भूलकर काम-वासना से वशीभूत हुए जा रहा है वहीँ स्त्रियों को इसके लिए नारी स्वतंत्रता, नारी उन्मुक्तता, नारी अधिकार बता-बता कर प्रेरित और प्रोत्साहित किया जा रहा हैं।
हमारी सनातन संस्कृति में स्त्री कभी भी बंधक नहीं रही हैं.. हमेशा ही उन्मुक्त और स्वतन्त्र रही हैं.. तुम आधुनिक भौतिकवादियों ने हमारी नैसर्गिक नग्नता को अश्लील और फूहड़ नग्नता के साँचे में ढालकर प्रस्तुत करना शुरू किया और पुरुषों को विकृत करना।… बंगलौर,दिल्ली और तमाम जगहें बस इसी का प्रतिफल हैं। .. सोचने वाली बात है कि जहाँ सबसे ज्यादा मोडर्न और आधुनिक होकर अपने को सभ्य होने का दम्भ भरने वाले लोग हैं वहीँ इस तरह की घटनाएं आम होती हैं? .. क्यों भला? .. उत्तर ऊपर ही है।
अभी भी सनातन पुरातन संस्कृति को रु-ब-रु देखना चाहते हैं तो आप सुदूर गांवों में चले जाइए जहाँ कथित आधुनिकता की फूहड़ता न पहुँची हो.. वहाँ आपको सही मायनों में सभ्य स्त्री और पुरुष मिलेंगे।
.✍🏻गंगवा, खोपोली से
अब आप अपना निष्कर्ष निकाल सकते हैं। अन्त में मेरा वही निवेदन जो गत कई दिनों के पोस्ट पर लगातार है वही एक बार फिर से -
अभी त्यौहार शुरू हैं।
पूरे वर्ष का एक तिहाई व्यय इन उत्सवों में होने वाला है। शोरूम और कॉरपोरेट को छोड़कर, जहाँ तक सम्भव हो अपनी जड़ों को खोजिए।
एक परिवार पर आश्रित सात शिल्प हुआ करते थे, ढूंढिए कि आज वे किस स्थिति में है?
और वर्षपर्यन्त तक, किसी को कोई रियायत नहीं। इन लफंगों को तो बाद में भी नहीं।
विचार कीजिए! हमारा स्वयं का इकोसिस्टम विकसित करने में योगदान दीजिये।
बस इतना करने का प्रयास कीजिए, शेष का मार्ग स्वयं स्पष्ट हो जाएगा -
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥
अर्थ: तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो.
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