बेवजह ऑख अपनी भिगोता है वो
और की राह में कांटे बोता है वो
बोलकर झूठ नश्तर चुभोता है वो
साथ देता नहीं जो किसी का कभी
एक दिन बैठकर शख्स रोता है वो
बोलकर झूठ जिसने भरोसा दिया
नित्य विश्वास अपना ही खोता है वो
जो कीमत समय की समझता नहीं
आदमी नाम का सिर्फ होता है वो
जब भी मौसम चुनावी चला है यहॉ
जाति की धर्म की फस्ल बोता है वो
लाभ कैसे मिलेगा समय देखकर
बेवजह ऑख अपनी भिगोता है वो
राम को भी नहीं जिसने बख्शा कभी
पाप में नित स्वयं को डुबोता है वो
*
~जयराम जय
'पर्णिका',बी -11/1,कृष्ण विहार,आ.वि.
कल्याणपुर,कानपुर-208017 (उ०प्र०)हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें|
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