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नारी अबला नहीं सबला है

नारी अबला नहीं सबला है

या देवि! सर्वभुतेषू शक्ति रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै  नमः......

एक नहीं दो-दो मात्रायें नर से भारी नारी ...

दुनियां का हम नहीं जानते, यह शास्वत संस्कृति हमारी.....

नारी तुम अबला नहीं सबला हो

धरा की पावन अनुपम ज्वाला हो

तुम ज्ञान चरित्र साध पाओ अगर,हर कपटी हृदय को मथती चली जाओगी

आत्म शक्ति के गीत गाओ अगर , हर नर को पावन बनाती चली जाओगी

स्वयं अपनी शक्ति की आवाज सुनोगी अगर, युग को बदलती चली जाओगी

तुम अपनी ही शक्ति साध पाओ अगर , शौर्य शिशुओं का बढ़ाती जाओगी

तुमने यदि छोड़ दीं रूढ़ियां, तोड़ दीं बेड़ियां, अंधविश्वास, कुप्रथाएं अगर,दंभियो का दंभ
तोड़ जाओगी

नारी तुम देवी हो तुम में छुपी हुई है एक अलौकिक अग्नि की ढेरी

उसे ज्वाला बना बाहर लाओ अगर,कर सकती हो भस्मीभूत वासना की ढेरी

तुम्हारी शौर्य संतानों से कभी हुई कोख खाली नहीं,

तुमने गोद में अपनी , है कौन सी शक्ति पाली नहीं!

धर्म का मर्म,ज्ञान का दीप जला कर , वक्त की आहट समझ पाओ अगर, धरा पर स्वर्ग सी सज्जा उभार जाओगी

शिव भी निरा शव हैं ,जब तक तुम्हारी शक्ति नहीं

बृह्मा में बुद्धि का प्रवाह कहां! जब तक शारदे का ज्ञान नहीं

विष्णु करेंगे पोषण कैसे , जब तक लक्ष्मी का बरदान नहीं

धरा के असुर मरेंगे कैसे , जब तक हो दुर्गा का अवतार नहीं

जो तुम्हारी भक्ति करता और ध्याता है , तब ही नर जग में कुछ कर पाता है

पर जैसे ही नर असुर बन जाता है, तुम बन जाती हो सिंहवाहिनी

तुम बिन कोई मुक्ति मोक्ष नहीं पा  पाता है

नारी तुम अबला नहीं सबला हो......

धरा की पावन अनुपम ज्वाला हो....

       चंद्रप्रकाश गुप्त "चंद्र"
  (ओज कवि एवं राष्ट्रवादी चिंतक)
         अहमदाबाद ,गुजरात
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