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हीरक जयंती के हीरे

हीरक जयंती के हीरे

(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)

  • लाला हर दयाल ने आईसीएस छोड़कर लंदन में स्थापित किया था देशभक्त समाज
  • युवा क्रांतिकारी बसंत बिश्वास ने वायसराय होर्डिंग पर फेंका था बम

देश को आजादी मिलने के समय कहा गया था- शहीदों की चिंताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यहीं बाकी निशां होगा। निश्चित रूप से निशान तो हैं लेकिन वे ओझल होने की कगार पर पहुंच गये हैं। पूर्व की सरकारें इस आरोप से बच नहीं सकतीं कि उन्होंने गिने-चुने स्वाधीनता सेनानियों और शहीदों तक ही जनता तक जानकारी पहुंचाई जबकि हकदार कितने ही लोग हैं। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पहले से कह रखा था कि स्वतंत्रता की हीरक जयंती पर देश को कई उपहार दिये जाएंगे और हीरक जयंती वर्ष को धूमधाम से मनाया जाएगा। गत 6 अप्रैल को भाजपा के 42वें स्थापना दिवस पर भी प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात का उल्लेख किया। सरकार अमृत महोत्सव मना रही है। इसी कड़ी में राज्यों ने भी अच्छा योगदान किया है। दिल्ली में पार्कों के नाम उन स्वाधीनता सेनानियों के नाम पर रखने का प्रस्ताव आया है जिनको मौजूदा पीढ़ी लगभग भूल चुकी है। इनमें लाला हरदयाल और युवा क्रांतिकारी बसंत कुमार विश्वास जैसे महानायक भी शामल हैं। इन स्वाधीनता सेनानियों के बारे में हमें बच्चों को बताना चाहिए। पार्कों के नामकरण के साथ इन पर चर्चा भी होनी चाहिए।
सरकार ने दिल्ली के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों की शहादत को सलाम करने का एक नया तरीका अपनाया है। राष्ट्रीय राजधानी में पार्कों के नाम जल्द ही दिल्ली के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर रखे जाएंगे। ऐसा उनके प्रति सम्मान दर्शाने और उनके बालिदान को स्वीकार करने के लिए किया जा रहा है। दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने दिल्ली सरकार को 16 पार्कों की सूची भेजी है और इनके नाम लाला हरदयाल, कर्नल गुरबक्श सिंह ढिल्लों, जनरल शाहनवाज खान, गोबिंद बेहरी लाल, कर्नल प्रेम सहगल व बसंत कुमार बिस्वास जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर रखने की सिफारिश की गई है। अधिकारियों ने बताया कि भारत की आजादी के 75 साल पूरे होने के मौके पर ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के तहत पिछले साल दिसंबर में ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर पार्कों का नाम रखने का फैसला लिया गया था, जिनके योगदान के बारे में लोग आम तौर पर नहीं जानते हैं।

लाला हरदयाल

लाला हरदयाल का जन्म 14 अक्टूबर 1884 को दिल्ली के पंजाबी परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम गौरी दयाल माथुर था, जो एक जिला अदालत में पाठक के रूप में कार्यरत थे। उनकी माता का नाम भोली रानी था। वह अपने माता-पिता की छठी संतान थे। कैम्ब्रिज मिशन स्कूल से उन्होंने स्कूली पढाई पूर्ण की। उसके बाद सेंट स्टीफन कॉलेज, दिल्ली से संस्कृत में बैचलर की डिग्री हासिल की और साथ ही पंजाब यूनिवर्सिटी से उन्होंने संस्कृत में मास्टर की डिग्री भी हासिल की थी। 1905 में संस्कृत में उच्च-शिक्षा के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से उन्हें 2 छात्रवृत्ति मिलीं। लंदन में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने देशभक्ति का प्रचार करने के लिये “इण्डिया हाउस” की स्थापना की थी। 1907 में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को पाप समझकर “भाड़ में जाये आई.सी.एस.” कह कर उन्होंने आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय तत्काल छोड़ दिया। इसके बाद लन्दन में देशभक्त समाज स्थापित कर असहयोग आन्दोलन का प्रचार करने लगे। कुछ साल विदेश में रहकर 1908 में वे भारत लौट आये। लाहौर में युवाओं के मनोरंजन के लिए एक क्लब था जिसका नाम ‘ यंग मैन क्रिश्चयन एसोसियेशन’ था। किसी कारण उनकी क्लब के सचिव से बहस हो गयी। लाला हर दयाल जी ने जल्दबाजी में तुरंत ही ‘यंग मैन इण्डिया एसोसियेशन’ की स्थापना की। भारत लौटने के बाद वे सबसे पहले पुणे जाकर लोकमान्य तिलक से मिले। उसके बाद अचानक से उन्होंने पटियाला पहुँच कर गौतम बुद्ध के समान संन्यास ले लिया। वे अपने सभी निजी पत्र हिन्दी में ही लिखते थे किन्तु दक्षिण भारत के भक्तों को सदैव संस्कृत में उत्तर देते थे। लाला जी हमेशा एक बात किया करते थे “अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से राष्ट्रीय चरित्र तो नष्ट होता ही है राष्ट्रीय जीवन का स्रोत भी विषाक्त हो जाता है। अंग्रेज ईसाइयत के प्रसार द्वारा हमारे दासत्व को स्थायी बना रहे हैं।” 1908 में लाला जी के आग्नेय प्रवचनों के परिणामस्वरूप विद्यार्थी कॉलेज और सरकारी कर्मचारी अपनी-अपनी नौकरियाँ छोड़ने लगे थे। ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार करना चाहा लेकिन, वे पेरिस के लिए निकल गए। पेरिस में ‘वन्दे मातरम’ मासिक का सम्पादन करने लगे थे। 4 मार्च 1938 को विदेश में ही लाला जी का देहांत हो गया। लाला जी जीवित रहते हुए भारत नहीं लौट सके। उनके बचपन के मित्र लाला हनुमन्त सहाय जब तक जीवित रहे, तब तक कहते रहे कि, हरदयाल की मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी, उन्हें विष देकर मारा गया।

युवा क्रांतिकारी बसंत विश्वास

युवा क्रांतिकारी व देशप्रेमी श्री बसंत कुमार बिस्वास (6 फरवरी 1895-11 मई 1915) बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारी संगठन युगान्तर के सदस्य थे। उन्होंने अपनी जान पर खेल कर वायसराय होर्डिंग पर बम फेंका था और इस के फलस्वरूप उन्होंने 20 वर्ष की अल्पायु में ही देश पर अपनी जान न्योछावर कर दी।इनका जन्म 6 फरवरी 1895 को बंगाल के नदिया जिले के पोड़ागाछा नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम मतिलाल बिश्वास था। नील विद्रोह का नेतृत्व करने वाले प्रधान नेता दिगम्बर बिश्वास उनके पूर्वज थे। छात्रावस्था में श्रीरोदचन्द्र गांगुली उनके शिक्षक थे। मूलतः उनके ही प्रभाव में बसन्त विप्लवी बने। युगान्तर के अमरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय के साथ बिश्वास का परिचय था। उन्हीं के कारण सन 1911 में रासबिहारी बोस के साथ बिशे दास के छद्मनाम से वे रासबिहारी बोस के बृहद बिप्लव परिकल्पना को सफल करने के लिए उत्तर भारत चले गये। वायसराय लोर्ड होर्डिंग की हत्या की योजना क्रांतिकारी रास बिहारी बोस ने बनायीं थी और बम फेंकने वालों में बसंत बिस्वास और मन्मथ बिस्वास प्रमुख थे। बसंत बिस्वास ने महिला का वेश धारण किया और 23 दिसंबर, 1912 को, जब कलकत्ता से दिल्ली राजधानी परिवर्तन के समय वायसराय लार्ड होर्डिंग समारोहपूर्वक दिल्ली में प्रवेश कर रहा था तब चांदनी चोक में उसके जुलूस पर बम फेंका, पर वह बच गया। इस कांड में 26 फरवरी, 1912 को ही बसंत को पुलिस ने पकड़ लिया। बसंत सहित अन्य क्रांतिकारियों पर 23-मई, 1914 को दिल्ली षड्यंत्र केस या दिल्ली-लाहोर षड्यंत्र केस चलाया गया। बसंत को आजीवन कारावास की सजा हुई किन्तु दुष्ट अंग्रेज सरकार तो उन्हें फांसी देना चाहती थी। इसीलिए उसने लाहोर हाईकोर्ट में अपील की और अंततः बसन्त बिस्वास को भाई बालमुकुन्द, अवध बिहारी व मास्टर अमीर चंद के साथ फांसी की सजा दी गयी।
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