Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

चक्रवर्ती सम्राट महाराणा प्रताप के समय और उसके बाद का भारत

चक्रवर्ती सम्राट महाराणा प्रताप के समय और उसके बाद का भारत

-प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
सम्पूर्ण यूरोप में इतिहास लेखन वस्तुतः 20वीं शताब्दी ईस्वी में ही शुरू हुआ है। उसके पहले कहानियाँ, गप्पे और प्रोपेगंडा ही था। यह यूरोप में आज सभी जानते हैं। परन्तु उनकी समस्या यह है कि जिन देशों में अपना उपनिवेश लगभग 100 साल बना कर उन्होंने अपने अनुगतों को सत्ता का ट्रांसफर किया, वे लोग अपने-अपने समाजों से डरकर और यूरोपीय अमेरिकी शक्तियों के दबाव में भी अपने यहाँ अपेक्षाकृत मंदबुद्धि लोगों को इतिहास के नाम पर कूड़ा कबाड़ा लिखने और अपने अतिशय प्रशंसा प्रचारित करने के काम पर राज्य के द्वारा नियोजित करते हैं, इसे अधिकांश प्रबुद्ध यूरोपीय विद्वान ध्यान नहीं रख पाते और इसलिये वे कथित स्वतंत्र इन राष्ट्रों में इन दिनों लिखे जा रहे मैटर को उस राष्ट्र का तथ्य मान लेते हैं। यद्यपि अनेक प्रबुद्ध यूरोपीय विद्वान स्वतंत्र विवेक से सत्य को जानने में लगे हैं। विशेषकर वैज्ञानिक लोग वहाँ पूर्णतः सत्यनिष्ठ हैं। परन्तु भारत में तो 75 वर्षों से यूरोपीय पादरियों की गप्पों और प्रोपेगंडा को ही इतिहास कहकर पढ़ाया जा रहा है।
यदि हम 20वीं शताब्दी ईस्वी में प्रबुद्ध यूरोप द्वारा लिखे जा रहे इतिहासकारों का अनुसरण करेंगे तो स्पष्ट हो जायेगा कि अपना इतिहास कैसे लिखा जाता है। उस दृष्टि से यह भी स्पष्ट हो जायेगा कि 16वी ंशताब्दी ईस्वी के मध्य में महाराणा प्रताप ही भारत के सर्वसमादृत सम्राट थे। सभी राजागण उनका सम्मान करते थे और अपने-अपने राज्य के लिये आवश्यक संधि, विग्रह, यान, छल आदि का भी रणनैतिक उपयोग राजधर्म के अनुरूप करते थे। अतः अकबर को महाराणा प्रताप के समय में भारत में उभरे एक होशियार और कपटी चगताई तुर्क की ही तरह देखा जाना भारतीय दृष्टि है। इस विषय में तथ्यों को संक्षेप में देख लेना उचित होगा।
राजपूतों के यहाँ पला अकबर
हुमायूं का बेटा अकबर अमरकोट में वहां के राजपूतों के द्वारा ही पाला गया और बड़े होकर महाराज हेमचंद्र विक्रमादित्य से लड़ने दिल्ली पहुंच गया। जहां 7 अक्टूबर 1556 को हेमचन्द्र विक्रमादित्य महाराज ने अकबर की सेना को हराकर भगा दिया। एक महीने बाद अनेक राजाओं की संयुक्त सेना ने पानीपत में हेमचन्द्र विक्रमादित्य को युद्ध के लिए चुनौती दी। दोनों तरफ हिन्दू सैनिक भी थे, मुस्लिम भी। महाराज युद्ध में जीत ही रहे थे। तभी उनकी आंख में एक तीर चुभा जिससे उनका हाथी उन्हें लेकर भागा और झूठी अफवाह फैलाकर मुगलों ने भगदड़ मचा दी तथा बन्दी बनाकर महाराज का सिर काट डाला। इसमें बैरम खां की मुख्य भूमिका रही।
1561 ईसवी तक अकबर के पास केवल दिल्ली आगरा की रियासत ही थी। उसका मूल नाम अबुलफतह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर था। वह पारसीक संस्कृति में ढला हुआ था और बचपन में अमरकोट के राजा के यहंा पलने के कारण हिंदू धर्म से भी परिचित और आकर्षित था। वह बचपन में हिन्दू राजा के यहां रहकर सूर्य को अर्ध्य देना, गोमाता की पूजा करना आदि सीख गया था जो वह अंत तक करता रहा। उधर क्रूरता, छलघात आदि भी करता रहा।
हिन्दू मुस्लिम साझा शासन
अकबर ने अनेक हिंदू राजाओं से संधि कर अपना षासन चलाया। विषेषकर आमेर के राजा भारमल से संधि कर उसने वैवाहिक संबंध बनाये। उसने राजपूतों के कहने पर कई मुगल अमीरों को हटाकर वहां राजपूतों को षासन सौंपा। स्वयं दुष्ट बैरमखां को राजपूतों के कहने पर ही हटाया गया और उसे हज के लिये मक्का भेज दिया जहां रास्ते में ही उसे मार डाला गया। अकबर ने मालवा पर आक्रमण कर बाजबहादुर को हराया। इस प्रकार अकबर के माध्यम से राजपूतों ने अपने शत्रुओं का संहार भी निरंतर किया।
गोंडवाना गोड़ राजाओं के पास ही रहा
गोंडवाना पर अकबर की सेना ने आक्रमण किया जिसमें चन्देल राजपूतों की बेटी और गोंड राजा की महारानी महारानी दुर्गावती ने वीरतापूर्वक युद्ध किया परंतु हारने की स्थिति आने पर उन्होंने स्वयं को मार डाला। तब, अकबर के संकेत पर दुर्गावती के देवर को ही गोंडवाना का दीवान बना दिया गया क्योंकि गोडों के षौर्य से मुगल थर्रा उठे थे और साथ ही, अकबर स्वयं को हिन्दू राजाओं की परम्परा को मानने वाला दिखाना चाहता था। आसफ खान ने गोंडवाने में लूटी गई दौलत लेकर भागने की योजना बनाई और उजबेकिस्तान तक चला गया परंतु अंत में घेर कर लौटा लिया गया और सारी दौलत जब्त कर ली गई।
इसके बाद अकबर ने मेवाड़, अजमेर और नागौर राजपूतों से लड़ाईयां छेड़ी और उन्हें केवल अपनी अधीनता स्वीकार करने की षर्त रखी और षेष षासन उन्हें अपनी मर्जी से चलाते रहने की छूट दी। राणा उदयसिंह ने अधीनता भी मानने से इनकार कर दिया और उसके कारण अकबर से उनका युद्ध चलता रहा। शेष लोग शर्त मान गए।
क्रूरता और उदारता की कूटनीति
1567 ईसवी में अकबर स्वयं चित्तौड़ दुर्ग को ढहाने के लिये गया क्योंकि आगरा से गुजरात के मार्ग पर चित्तौड़ मध्य में पड़ता था। जयमल और फत्ता ने बड़ी वीरता से लड़ाई लड़ी परंतु मुगल सेना जीत गई। अकबर ने तीन लाख नागरिकों को मार डाला और उनका सिर पूरे इलाके में जगह-जगह भाले की नोक पर घुमा कर टंगवा दिया ताकि सब जगह अकबर का भय फैल जाये। इसके साथ ही उसने लूटे गये धन को भी इलाके में बंटवा दिया जिससे इलाके में कई जगह साधारण लोग उसका यष गाने लगे। इस प्रकार कूटनीति और भेदनीति से क्रमषः अकबर ने सफलता प्राप्त की और अपनी अधीनता स्वीकार करने वाले राजाओं को अपने राज्य में अपने ही ढंग से षासन चलाते रहने की पूरी छूट दी। जिससे अधिकांष राजपूत विवषता में संतुष्ट रहे। बाद में मुगल सेना ने रणथम्भौर किले पर भी आक्रमण किया। फिर हाड़ा राजपूतों से संधि कर ली।
गंगा, गीता, गाय, गायत्री का उपासक अकबर
अकबर कभी भी नमाज नहीं पढ़ता था। वह गंगा, गीता, गाय और गायत्री को मानता था। स्वयं को सदा हिन्दू राजाओं जैसा दिखाता था और राजपूतों की सभी चीजों की नकल करता था। वह कभी हज नहीं गया और सभी हदूद गुनाह करता रहा। वह मुशरिक और मुनाफिकीन तथा जालिम और काफिर था। उसने शराब पी, अपने चित्र बनवाए और हिन्दू देवी देवतआओं की पूजा की अनुमति अपने महल में दी। इस प्रकार वह बनावटी मुसलमान था।
महाराणा उदय सिंह के महान पुत्र महाराणा प्रताप सिंह से 1576 ईस्वी में हल्दी घाटी का युद्ध हुआ जिसमें अकबर विजयी नहीं हुआ और बिना विजय प्राप्त किये लौटा परंतु यह ढ़िढोरा पिटवाया कि हम जीत गये हैं और अब वापस जा रहे हैं। जबकि सत्य यह है कि हल्दी घाटी में अकबर को कोई विजय प्राप्त नहीं हुई थी। 1569 ईसवी में सीकरी में अकबर ने अपनी राजधानी बनाई और उसे विजय स्थल के अर्थ में फतहपुर नाम भी दिया जिससे उसका फतहपुर सीकरी नाम भी प्रचलित हो गया। इसके 7 वर्ष बाद 1576 ईस्वी में जाकर हल्दीघाटी का युद्ध हुआ था जिसमें कोई भी पक्ष विजयी नहीं हुआ था। महान सम्राट महाराणा प्रताप सिंह से विजय को असम्भव देखकर अकबर ने गुजरात और बंगाल की ओर ध्यान दिया और मालवा तथा गुजरात को जीतने का अभियान चलाया। बाद में, दरबारी लोगों से अपनी विजय का झूठ रचवाया और फैलाया।
अकबर का षासन किसी भी कसौटी पर मुस्लिम षासन नहीं कहा जा सकता। अकबर को दिल्ली जागीर का पहला मंगोल या मुगल सुल्तान कहा जा सकता है। अकबर के सम्पूर्ण जीवन में अरब की संस्कृति का दूर-दूर तक कोई प्रभाव नहीं था। अपितु वह एक पारसीक भारतीय संस्कृति का ही जीवन जीने वाला व्यक्ति था।
इस विषय में कुछ बातें दिल्ली के प्रत्येक मुगल सुल्तान के बारे में उल्लेखनीय हैं और कुछ बाते अकबर के बारे में विषेष हैं। सभी मुगल सुल्तानों के बारे में निम्नांकित बातें सामान्य हैं जो सब की सब इस्लाम के विरूद्ध हैं और ये उनको छद्म मुस्लिम ठहराती हैं।
1 सभी मुगल सुल्तान हदूद अपराध करते थे। हदूद वे अपराध या गुनाह हैं जो अल्लाह के विरूद्ध किये गये अपराध हैं और जिन्हें कभी कोई क्षमा नहीं कर सकता। वे सर्वथा अक्षम्य अपराध हैं।
2 सभी मुगल सुल्तान षराब पीते थे तथा अन्य सभी नषों का सेवन करते थे जो हदूद अपराध हैं।
3 सभी मुगल सुल्तान अपने चित्र बनवाते थे तथा अपने पूर्वजों के चित्र बनवातें थे और अन्य चित्र भी बनवाते थे जो अल्लाह की बनाई चीजों की अनुकृति करते थे और इसलिये इन्हें मोमिन नहीं कहा जा सकता। औरंगजेब को छोड़कर सभी मुसलमान हिंदू रीति-रिवाजों को मानते और उत्सव मनाते थे। हिंदू देवी-देवताओं के उत्सवों में षामिल होते थे। जो षिर्क है और इसलिये कुफ्र है और इस कारण उन्हें मोमिन नहीं कहा जा सकता।
4 सभी मुगल सुल्तानों के मुख्य सेनापति और कोषाध्यक्ष तथा राजस्व का प्रबंध करने वाले मुख्य अधिकारी सनातनधर्मी हिंदू होते थे इसलिये उनके षासन को मुस्लिम षासन नहीं कहा जा सकता।
5 सभी मुगल सुल्तानों ने हिंदू राजाओं की सेना अपने पक्ष में रखते हुए ही अन्य हिंदुओं से युद्ध किया। इसलिये उनके षासन को मुस्लिम षासन नहीं कहा जा सकता।
6 सभी मुगल सुल्तानों के षासन में अनेक महत्वपूर्ण षासकीय पद हिन्दुओं के पास थे अतः उनके षासन को मुस्लिम षासन नहीं कहा जा सकता।
7 सभी मुगल सुल्तानों के द्वारा हिंदू मंदिरों को दान दिये गये इसलिसे उनके षासन को मुस्लिम षासन नहीं कहा जा सकता।
8 धन-साधन होने पर भी कोई मुगल सुल्तान हज नहीं गया जबकि हज जाने की हैसियत होने पर हर मोमिन का हज जाना फर्ज है इसलिय उनके षासन को मुस्लिम षासन नहीं कहा जा सकता।
इसके अतिरिक्त अकबर के षासन की इससे अलग और इससे अतिरिक्त निम्नांकित विषेषताएं भी हैं-
1 अकबर का जन्म किसी मुस्लिम घर में नहीं हुआ अपितु अमरकोट के हिंदू राजा के महल में हुआ। अतः उसे जन्मना मुस्लिम नहीं कहा जा सकता।
2 चौसा और कन्नौज की लड़ाई में तत्कालीन मुस्लिम राजा षेरषाह सूरी की सेनाओं से हारने के बाद हुमायूं भागा और उसने एक पारसी षिक्षक की 14 साल की बेटी से विवाह किया। उसी बच्ची से अगले साल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर का जन्म हुमायूं की अनुपस्थिति में हिन्दू राजपूत के घर में हुआ।
3 अकबर के मुख्य सेनापति महाराज मानसिंह थे। अतः उसका षासन हिन्दू-मुसलिम साझा षासन ही कहा जायगा।
4 अकबर के राज्य में गौरक्षा को पवित्र माना जाता था और गौ-हत्या प्रतिबंधित थी।
5 अकबर गीता-उपनिषद आदि ग्रंथों का अध्ययन करता था।
6 अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक एक नये मजहब का प्रवर्तन किया इसलिये उसे मुसलमान कदापि नहीं कहा जा सकता।
7 अकबर के राज्य में जजिया हट गया।
8 अकबर ने पुराने मंदिरों के पुनरूद्धार को भरपूर सहायता दी।
9 अकबर ने नये हिन्दू मंदिरों के निर्माण में सहायता दी।
10 अकबर के दरबार में हिंदू पण्डितों और विद्वानों की प्रचुरता थी।
अकबर की मृत्यु के समय हिन्दुओं के सहयोग से चल रहा राज्य काबुल से प्रयाग, पटना होते हुए बंगाल तक तथा काष्मीर से सौराष्ट्र, खानदेष और बरार तक था। इसमें भी राजपूतों, बंगीय हिन्दुओं तथा मध्यप्रदेष के हिन्दू नरेषों की राज्य में हिस्सेदारी थी। सम्पूर्ण गांेडवाना अर्थात् महाकौषल और छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार का बहुत बड़ा हिस्सा, गुजरात का अधिकांष हिस्सा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, आन्ध्र, तमिलनाडु और केरल उस षासन के अधीन एक दिन को भी नहीं था। यह पूरा क्षेत्र मिलाकर आधे से थोड़ा ही कम भारत है। इस प्रकार अकबर को मान्यता आधे से थोड़े ही अधिक भारत में थी और वह षासन किसी भी अर्थ में केवल मुसलमानों का षासन नहीं था। उस समय सम्पूर्ण राजपूताने मंे राजपूतों का राज्य था जो अकबर को भेंट और नजराने देते थे। यही स्थिति बंगाल के हिन्दू षासकों की भी थी और मालवा के हिन्दू षासकों की भी।
यह जितना मुसलमानों का राज्य था, उतना ही हिन्दुओं का भी। यद्यपि षासन मुसलमानों के प्रति पक्षपात से वैसा ही भरा था, जैसा कि विगत 63 वर्षों से भारतीय राज्य है। इस्लाम को पूरा राजकीय संरक्षण, हिन्दुत्व को कोई भी अधिकृत राजकीय संरक्षण नहीं। विधिक रूप से आज भी यही स्थिति है। इस दृष्टि से नेहरू जी आदि अकबर की ही परम्परा के उत्तराधिकारी दिखने लगते हैं। ऐसा षासन सदा ही मजहबी उग्रवाद को अनजाने ही प्रेरित करता है। जहाँ तक जहाँगीर, षाहजहाँ और औरंगजेब के षासन की बात है, लगभग 100 वर्षों तक (1606 ईस्वी से 1707 ईस्वी तक) चले इस षासन में राज्यकर्ता के षरीर में हिन्दू रक्त बह रहा था, फिर भी उनके षासन में उदारता नहीं देखी गयी। इससे बनावटी इस्लाम के पीछे सक्रिय प्रेरणाओं के स्वरूप पर प्रकाष पड़ता है। इनमें से किसी ने भी हिन्दुओं और मुसलमानों को अपनी प्रजा समान रूप से मानने का कोई भी व्यवहार नहीं किया। यह एक गम्भीर चिन्तन का विषय है। रक्त से आधे हिन्दू, पर आचरण में बनावटी मुसलमान ही रहे ये तीनों। हिन्दुओं को यह तो सोचना चाहिए कि वे भी राज्यकर्ताओं पर दबाव बनाये रखने का तंत्र कैसे रचंे। परन्तु बनावटी मुसलमानों द्वारा स्वयं इस्लाम के भी अनुशासन को न मानकर मनमानी, अराजकता, अनाचार और क्रूरता-बर्बरता का कोई भी अधिकार जताना मान्य नहीं होना चाहिए।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ