प्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आचार्य आर्यभट्ट:- डॉ सच्चीदानंद प्रेमी
प्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आचार्य आर्यभट्ट का जन्म उनके ही सुप्रसिद्ध ग्रंथ आर्यभटीय के अनुसार बिहार के कुसुमपुर सम्प्रति पटना में संवत् 398 (476 ईस्वी ) में हुआ था। उनकी शिक्षा नालंदा विश्वविद्यालय में ही हुई थी । यद्यपि कि खगोल शास्त्र के सूत्र ॠग्वेद में मिलते हैं और हमारे वैदिक कालीन ॠषिओं ने ही इसके प्रारूप दिए हैं ,उसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने, गणित, ज्योतिष शास्त्र तथा खगोल शास्त्र से संबंधित कई महत्वपूर्ण सूत्र और सिद्धांत दिए ।उनके सम्मान में भारत ने अपने पहले उपग्रह का नाम आर्यभट्ट दिया था ।आधुनिक शोधकर्ताओं ने इस कुसुमपुर को दक्षिण के महाराष्ट्र में होने का दाबा किया है ,परन्तु पाटलिपुत्र के पास ही खगौल की वेध शाला एवं तारेगना की वेधशाला यह प्रमाणित करता है कि आचार्य आर्यभट्ट पातलिपुत्र के ही थे ।
खगोल विज्ञानं के क्षेत्र में, सर्वप्रथम आचार्य आर्यभट्ट ने ही पृथ्वी के संदर्भ में अनुमान लगाया था कि अग्नि, मिट्टी, वायु और पानी से बनी यह पृथ्वी, चारों ओर से गोल है और इसकी परिधि 24835 मील है ।। आर्यभट्टीय अंक पद्धती द्वारा उन्होंने पृथ्वी का व्यास भी बता दिया था। साथ ही यह सिद्धांत भी दिया था कि पृथ्वी स्थिर नहीं है, बल्कि वह निरंतर अपने अक्ष पर घुमती रहती है, साथ ही सूर्य के चारों ओर परिक्रमा भी करती है । इसलिए अन्य खगोलीय घटनाओं के साथ ही दिन और रात भी घटित होते हैं ।उन्होंने सौर प्रणाली के भूकेंद्रीय प्रारूप प्रस्तुत किया था जिसमे उन्होंने बताया था कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केंद्र में है । उन्होंने गुरुत्वाकर्षण की अवधारणा की नींव भी रखी थी। उन्होंने अपने "आर्यभटीय
सिघ्रोका " में आज के 1500 वर्ष पूर्व ही खगोलीय गणनाओ के तरीको को प्रतिपादित कर दिया था जो सिद्धान्त कोपर्निकस और गैलीलियो ने बहुत बाद में प्रतिपादित किया ।
आर्यभट्ट के अनुसार पृथ्वी के इर्द-गिर्द ग्रहों की कक्षाएं है । सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण से संबंधित भ्रमों का निराकरण करते हुए यह सिद्ध किया था कि, सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण खगोलीय घटनाएं है । इन ग्रहणों की घटनाओं से राहु और केतु का कोई लेना-देना नहीं है ।, पृथ्वी और चंद्रमा की छाया के कारण ही ग्रहण की घटनाएँ होती हैं साथ ही अमावस्या को सूर्य ग्रहण तथा पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण होने तथा उसके शास्त्रीय कारणों की व्याख्या भी की है । इनके अनुसार, एक युग में 4320000 बार पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है, इसलिए युग में वर्ष भी इतने ही होते हैं।
आर्यभट्ट के अनुसार, सूर्य के सम्मुख यानी सूर्य के सामने जो भी ग्रह या नक्षत्र होते हैं वे सूर्य के प्रकाश से प्रतिविम्बित होकर ही प्रकाशवान दिखते हैं और इसके विपरित जो भी ग्रह या नक्षत्र सूर्य के पीछे यानी सूर्य के प्रकाशक्षेत्र से बाहर चले जाते हैं वे अस्त कहलाते हैं ,क्योंकि वहां अंधकार रहता है । इसका निष्कर्ष यह है कि चंद्रमा, पृथ्वी तथा अन्य ग्रह, सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित होते हैं।
गणित के क्षेत्र में आर्यभट्ट के योगदान अद्वितीय है । उन्होने गणित के आदार पर पृथ्वी से सूर्य की दूरी निकाली जो अनुमानतः93750000 मील यानी लगभग 150000000 किलोमीटर है । इसे Astrological Unit (A U ) कहा जाता है । इसके आधार पर पृथ्बी से बुध की दूरी का मान 0.375 A U, शुक्र की दूरी का मान 0.725 A U,मंगल की दूरी का मान 1.538 A U,गुरु की दूरी का मान 4.16 A U तथा शनि की दूरी का मान 9.41 A U है । यह उस समय की गणना है जब माप का कोई आधुनिक यंत्र नहीं था ,फिर भी आज के आधुनिक ञंतंत्र की माप से लगभग मिलता जुलता है ।उन्होंने त्रिकोण और वृत्त के क्षेत्रफलों को निकालने के लिए सूत्र का प्रारूप दिया था । उन्होंने पाई का मान 62832/20000 = 3.1416 के बराबर दिया था ।यह पाई का सुक्ष्मतम मूल्य है।
उन्होंने ज्या ( sine ) तालिका दी, जो तुकांत वाले एक छंद के रूप में थी जहाँ प्रत्येक इकाई वृत्तचाप के 225 मिनट्स या 3 डिग्री 45 मिनट्स के अंतराल पर बढ़ती थी । वृद्धि संग्रह को परिभाषित करने के लिए वर्णमाला कोड का प्रयोग किया ।एक के बाद ग्यारह शून्य वाली संख्या को बोलने के लिए उन्होने नई पद्धति दी । ज्या 30 (Sine 30 ) के मान की गणना करने पर 1719/3438 = 0.5 उन्होने निकाला था । उनके वर्णमाला कोड को सामान्यतः आर्यभट्ट सिफर के रूप में जाना जाता है।किसी भी वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात को पाई कहते हैं। इसे π चिन्ह द्वारा दर्शाया जाता है।लोगों का यह भ्रम है कि पाई का सिध्यांत आर्कमिडीज ने दिया है । सच्चाई तो यह है कि उनके बहुत पहले आर्यभट्ट ने ही पाई का सही और सटीक मूल्यांकन किया है।
आर्यभट्ट की दशमान पद्धति
आर्यभट्ट ने अक्षरांक पद्धति की तरह ही दशमान पद्धति (दशमलव) का भी अविष्कार किया है। इस पद्धति के अनुसार, किसी भी संख्या में स्थान के अनुसार अंकों का मूल्य बदलता है। किसी भी संख्या में दाईं ओर से बाईं ओर जाने पर अंको का मूल्य दस गुना हो जाता है। दशमान पद्धति के उपयोग से, जोड़,घटाव, गुणा,भाग करना आसान होता है।
शून्य का आविष्कार पांचवीं शताब्दी में भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट ने ही किया था। हालांकि आर्यभट्ट ने शून्य को दर्शाने के लिए किसी भी चिन्ह का उपयोग नहीं किया था।
आर्यभट्ट ने 21 वर्ष में ही आर्यभट्टीय नामक ग्रंथ लिखा था जो विज्ञान एवं गणित विषयों के 108 श्लोकों का शोध संग्रह है जिसमें गणित, खगोल विज्ञान तथा ज्योतिष शास्त्र विशेषकर बीजगणित, त्रिकोणमिति तथा बृतीय त्रिकोणमिति के कई सिद्धांत और समीकरण दिए हैं। साथ ही क्षेत्रफल, वर्ग, वर्गमूल, इत्यादि के नियम और सूत्र भी प्रतिपादित किए हैं जो श्लोकबद्ध हैं ।
यथा-
उदयो यो लंकायां सोस्तमयः सवितुरेव सिद्धपुरे ।
मध्यान्हो यवकोट्यां रोमकविषयेऽर्धरात्रःस्यात ॥
आर्यभट्टीय गोलपाद -13
यानी जब लंका में सूर्योदय होता है तब सिद्धपुर में सूर्यास्त हो जाता है, यबकोटी में मध्याह्न तथा रोमक प्रदेश में अर्धरात्री होती है ।
आर्यभट्ट आर्यभट्टीय के अतिरिक्त दासगीतिका,तंत्र,आर्य सिद्धांत और सूर्य सिद्धांत पर आधारित ग्रंथ “सूर्य सिद्धांत प्रकाश ऐसे प्रमुख ग्रंथओं का प्रणयण किया है ।
आर्य सिद्धांत ग्रंथ
गणित शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र के विषय पर आधारित आर्यभट्ट द्वारा रचित ग्रंथ “आर्य सिद्धांत” के चार विभाग है, जिनके नाम क्रमशः गितीकापाद,गणितपाद,कालक्रियापाद तथा गोलपाद है। कूल मिला कर इस ग्रंथ में 121 श्लोक है जिनमें गणित तथा ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांतों को सूत्रों के रुप में दर्शाया गया है।यथा-
संस्कृत के 33 × 9 = 297 वर्णांक
9 स्वर -a -i -u -ṛ -ḷ -e -ai -o -au
अ इ उ ऋ ऌ ए ऐ ओ औ
× 10 0 10 2 10 4 10 6 10 8 1010 1012 1014 1016
गितीकापादम्
गितीकापाद में 13 श्लोक है, जिनमें आर्यभट्ट ने बड़ी बड़ी संख्याओं को छोटे रुप में लिखने का वर्णन किया है। इसमें व्यंजन का उपयोग अंको को दर्शाता है तथा स्वरों का प्रयोग शून्य के लिए किया गया हैं।
इसके अलावा पृथ्वी, सूर्य चंद्र तथा अन्य ग्रहों के बीच अंतर तथा उनकी गति को नापने के विषय में जानकारी दी गई है।यथा-
ख्युघृ = 43,20,000 में 2 के लिए ख् लिखा गया है और 30 के लिए य्। दोनों अक्षर मिलाकर लिखे गए हैं और उनमें उ की मात्रा लगी है, जो 10,000 के समान है; इसलिए ख्यु का अर्थ हुआ 3,20,000; घृ के घ् का अर्थ है 4 और ऋ (मात्रा) का 10,00,000, इसलिए घृ का अर्थ हुआ 40,00,000. इस तरह ख्युघृ का उपर्युक्त मान (43,20,000) हुआ
गणितपाद
गणितपाद में अंक गणित,बीज गणित, त्रिकोणमिति गोलाकार त्रिकोणमिति, क्षेत्रफल, वर्ग, वर्गमूल, घन तथा घन मूल आदि से संबंधित 33 श्लोक है। इसी भाग मं पाई का मूल्य भी दर्शाया गया है।
कालक्रियापाद
कालक्रियापाद में 25 श्लोक है जिनमें वर्ष, महिने तथा युग के विषय में जानकारी है। आर्यभट्ट ने अपने सूत्रों से सिद्ध किया है कि वर्ष के दिन 365 न होकर 365.2951 होते हैं । आर्यभट की खोज के अनुसार, एक युग में 4320000 बार पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है, इसलिए एक युग में 4320000 वर्ष भी होने का प्रमाण मिलता हैं।
गोलपाद
गोलपाद में आर्यभट्ट ने प्रमुख ग्रहों सूर्य, चंद्र और पृथ्वी की व्याख्या की है ,साथ ही सूर्य से इन ग्रहों की दूरी की भी जानकारी दी है । गोलपाद में 50 श्लोक है।
अतः आर्य सिद्धांत में गणित, भूगोल तथा ज्योतिष शास्त्र का विस्तारपूर्वक बर्णन किया गया है।
आर्यभट्ट की अक्षरांक पद्धति
आर्यभट्ट के अनुसार, संख्याओं को अंको में लिखने के बजाय यदि अक्षरों में लिखा जाएं तो उसे और अधिक आसानी से पढ़ा जा सकता हैं। अतः आर्यभट्ट ने बड़ी बड़ी संख्याओं को संक्षिप्त रूप से अक्षरों में लिखने की पद्धति का अविष्कार किया है जिसे अक्षरांक पद्धति कहते हैं।यथा-
वर्गाक्षराणि वर्गेऽवर्गेऽवर्गाक्षराणि कात् ङ्गौ यः ।
खद्विनवके स्वरा नव वर्गेऽवर्गे नवान्त्यवर्गे वा ॥
आर्यभटीय गीतिकापाद २
अर्थात् क से प्रारंभ करके वर्ग अक्षरों को वर्ग स्थानों में और अवर्ग अक्षरों को अवर्ग स्थानों में (व्यवहार करना चाहिए), (इस प्रकार) ङ और म का जोड़ य (होता है)। वर्ग और अवर्ग स्थानों के नव के दूने शून्यों को नव स्वर व्यक्त करते हैं। नव वर्ग स्थानों और नव अवर्ग स्थानों के पश्चात् (अर्थात् इनसे अधिक स्थानों के उपयोग की आवश्यकता होने पर) इन्हीं नव स्वरों का उपयोग करना चाहिए।
आर्यभट्ट के द्वारा किए गए प्रयोगों और इनके द्वारा लिखित ग्रंथों को एक ओर जहां दुनियां भर में सराहा गया , वहीं दूसरी ओर उनकी बहुत आलोचना भी हुई हैं । हजारों वर्ष पहले खगोल विज्ञान और ज्योतिष शास्त्र के विषय में आर्यभट्ट ने जो भी सिद्धांत, सूत्र तथा समीकरण दिए थे, उनके विषय में कई विद्वानों की मत भिन्नता रही , परंतु इससेआर्यभट्ट की योग्यता पर संदेह नहीं किया जा सकता । गणित तथा विज्ञान के क्षेत्र में उनका योगदान सदैव ही सराहनीय रहेगा।
उनके द्वारा गणित और खगोलविज्ञान से सम्बन्धित सारे अविष्कारों को जो श्लोको के रूप में प्रणीत थे , का अनुवाद लैटिन में 13वीं शताब्दी में किया गया। आर्यभटीय के लैटिन संस्करण की सहायता से ही यूरोपीय गणितज्ञों ने त्रिभुजो का क्षेत्रफल, गोलीय आयतन की गणना के साथ साथ वर्गमूल और घनमूल की गणना करना सीखा।
काल गणना से ब्रह्मगुप्त के अनन्तर यह ग्रन्थ रचा गया प्रतीत होता है । इससे इस सिद्धान्त को कलियुग के प्रारम्भ ही में बनना बतलाया जाता है ।
इससे इनके ग्रन्थों को पौरुष ग्रन्थ में गवना होती है । ब्रह्मगुप्त के पहिले इन के ग्रन्थोलिखित वर्षमान या अन्यान्य मानों का वस्तुतः कहीं प्रचार होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता।
इनकी विद्वता तथा इनके अनुसंधानिक असाधारण प्रतिभा पूर्ण ग्रंथ आर्यभट्टीय की प्रतिष्ठा के आधार पर ही गुप्त शासक बुद्धगुप्त ने उन्हें नालन्दा विश्वविद्यालय का प्रमुख नियुक्त किया था। हमें,सम्पूर्ण बिहार वासियों को ,सम्पूर्ण भारतियों को आचार्य आर्यभट्ट की कृतियों पर ,बिहार के होने पर ,भारत के होने पर गर्व है ।
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