सर्वव्यापी राम
संगीता सागर
क्यों ढूंढें पागल मन
मंदिर देवालय में,
प्रभु श्रीराम को,प्रभु श्रीराम को ।
खोल मन का की आंखें,देख
श्री राम तो है, तेरे ही अंदर।
चलते रहे तेरे साथ
बनके तेरा विश्वास
अंधेरे राहों में रहे
बनकर प्रकाश
संघर्षों मे रहे हिम्मत/धैर्य
बनकर तेरे साथ ।
फिर क्यों ढूंढें मन
मंदिर देवालय में
प्रभु श्रीराम को, प्रभु श्री राम को ।
राम ही धर्म, राम ही विश्वास
राम ही शस्त्र , राम ही शास्त्र
राम ही सूत्र ,राम ही सूत्रधार ।
फिर क्यूं ढूंढें मन
मंदिर देवालय में
प्रभु श्रीराम को
प्रभु श्रीराम को ।
राम ही विधी , राम ही विधान
राम ही राजनीति , राम ही इतिहास,
राम ही संस्कृति , राम ही संस्कार ।
फिर क्यूं ढूंढें मन
मंदिर देवालय में
प्रभु श्रीराम को,
प्रभु श्रीराम को ।
जन जन में राम है
धरती के कण कण में राम है,
समय के क्षण क्षण में राम
बिंदू से सिंधु तक राम,
जीवन से मृत्यु तक राम,
बताओ है वो कौन सा स्थान
है वो कौन सा कालखंड ज़हां
राम नही विराजमान ।
स्वरचित
संगीता सागर
मुजफ्फरपुर, बिहार ।
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