अभी स्वाद पानी का बचा हुआ है अपना
अभी स्वाद पानी का बचा हुआ है अपना
रामकृष्ण
कूआँ है आज भी वहींं
अच्छी भीड़ भी
बरगद,पीपल पर भी
मस्ती में नीड़ भी
पहले के सब रिवाज
ज्यो के त्यो पसरे है
आवश्यकताएँ करवा लेती
हैं रचना।
तुम तो गये थे जो
पार समुंदर कब के
मुट्ठी भर धूप लिए
आए हो सज धज के
अपनी तो मिट्टी ही
पुण्य-धाम सा पावन
ंयहीं तो समस्त
इन्द्र लोक बना है वसना।
चाहो तो थोड़ी सी हवा
भेज दो उनको
शंख नाद, गंगा जल
ंतुलसी दल भी जिनको
नींद नहीं आती हो
बारूदी शोर मेंं
वैचारिक शीतलता
जिनके घर है सपना।
बासी रोटी में भी
ऊर्जा का तत्व है
साग के हरेपन में
भौमिक सब सत्व है
तृप्ति के बहाने ही
लौटो तो एकबार
अपनों के आगे क्या
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