Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

लाख बुरा चाहो...

लाख बुरा चाहो...

मुझे पढ़ना किसी को 
इतना आसान नहीं। 
जितना लोग मुझे 
सहज समझ रहे है। 
बीते हुये कल को देख
आज को देख रहे है। 
और आने वाले कल को
आज में समेट रहे है।। 

वक्त की रफ्तार से मैं
दौड़ तो जरूर रहा हूँ। 
दिल के गमो को मैं
दिखने नहीं दे रहा हूँ। 
लोग हमदर्दी का लेप
लेकर आ जाते है। 
पर जिंदगी का सुनापन
आज भी कम नहीं हो रहा।। 

बड़ी अजीब है ये जिंदगी 
जो उलझनों में उलझ गई। 
सोचने समझने की मेरी
शक्ति भी छीन हो गई। 
जाना और चाहना कुछ
अलग ही होता है। 
पर ये मन कही और
ही पहुँच जाता है।। 

तकदीर तस्वीर बदल जाती है । 
जब अपनो से घायल होते है। 
लाख चाहकर भी वो 
उसे मार नहीं पाते है। 
क्योंकि उसकी नीयत 
बहुत साफ होती है। 
इसलिए हर मुश्किल को
वो पार कर जाते है।। 

जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ