राम नवमी के अवसर पर राम की महत्ता
रवीन्द्र नाथ चौबे
राम अपनी आचरण श्रेष्ठता और सब समय सभी रूपों में मार्यादा पालन करने के करिश्माई चरित्र के कारण धर्म के मूर्तिमान स्वरूप हैं।
इसलिए ऋषि वाल्मीकि ने इन्हें धर्म का विग्रह कहा है। यानी धर्म के जीवंत मूर्ति । धर्म वह है जो हम सबको धारण किए हुए हैं यानी जो हमारा होना है यानी जो हमारा पूर्ण प्रकटीकरण है और इसलिए भारत में धर्म बंधन नहीं बल्कि मुक्ति है ।क्योंकि जैसे ही कोई व्यक्ति अपनी पूर्णता को प्राप्त होता है वह मुक्त हो जाता है। राम चारित्रिक श्रेष्ठता में जैसे सत्यनिष्ठ, न्याय निष्ठ , दृढ़व्रती, विद्वान, सुंदर, जितेंद्रिय ,वीर्यवान्,कृतज्ञ, हिमालय की भांति धैर्यवान और समुद्र की भांति गांभीर्य आदि में पूर्ण रुपेण प्रकट हुए हैं। इसलिए जब वाल्मीकि राम चरित्र गान के लिए लोक और ज्ञानियों से सामग्री इकठ्ठा कर रहे थे तो उन्होंने नारद मुनि से मुख्य प्रश्न यही किया कि कौन इस लोक में चारित्रिक गुणों से युक्त है। "चारित्रेण च को युक्त: । उतर में नारद जी राम के गुणों की पूरी फेहरिस्त बताते हैं । और यही वाल्मीकि रामायण का पहला सर्ग है।
वाल्मीकि जी राम को मनुष्य रूप में विभिन्न गुणों से युक्त मार्यादा पुरूषोत्तम और धर्म के जीवंत मूर्ति मानते हैं । जबकि तुलसी दास राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के साथ साथ ईश्वरीय रूप भी मानते हैं। तुलसी दास रचित रामचरितमानस के
बालकाण्ड में ऋषि याज्ञवल्क्य जी ऋषि भारद्वाज जी से पूछते हैं
एक राम अवधेश कुमारा ।तिन्हकर चरित विदित संसारा।।
नारि विरह दुःख लहेउ अपारा ।भयवु रोष रन रावण मारा ।।
प्रभु सोई राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारी।
सत्य धाम सर्वज्ञ तुम कहिअयु विवेक विचार ।।
तब उमा और शिवजी का संवाद ऋषि कहते हैं जिसमें सती ने फिर शंकर जी से संदेह बस यही प्रश्न किया
ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद ।।
शंकर जी कहते हैं
जासु कथा कुंभज ऋषि गाई । भगति जासु मैं मुनहि सुनाई।।
सोई मम देव इष्टदेव रघुबीरा ।सेवत जाहि सदा मुनि धीरा।।
मुनि धीर योगी सिद्ध संतत विमल मन जेहि ध्यायवहिं
कहि नेति निगम पुरान अगम जासु कीर्ती गावहिं ।।
सोई राम व्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनि ।
अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनी ।।
इस प्रकार तुलसी के राम परब्रह्म परमात्मा के अवतार हैं।
अब कबीर के राम के बारे में
एक राम दशरथ का बेटा , एक राम घट घट में लेटा ।
एक राम का सकल उजियारा , एक राम जगत से न्यारा ।।
इस प्रकार राम सबमें रमण करने वाले चैतन्य, प्रेम चरित्र और ज्ञान हैं । और राम अपने चरित्र को धर्म से एकाकार कर पाने में सफल हुए हैं और इसलिए ऋषियों ने कहा है
महाजनों गतो येन पंथ: स: धर्म: यानी राम जैसे महापुरुष जो आचरण करते हैं वह धर्म है।
और एक राम दशरथ के पुत्र में जन्म लेकर मार्यादा पुरूषोत्तम के रूप में लोकसमाज में चरित्र के द्वारा कीर्तिमान स्थापित कर ,सत्य, न्याय , धर्म ,कर्तव्य के द्वारा मनुष्य के रूप में सारे संसार में श्रेष्ठ आचरण के द्वारा मनुष्य जाति को हमेशा के लिए मार्गदर्शन करते हैं और रहेंगे। और राजा के रूप में भी राम ने जो राम राज्य स्थापित किया वह पूरे मानव जाति का ध्येय और लक्ष्य बना रहेगा ।
रवीन्द्र नाथ चौबे आदित्यपुर जमशेदपुरसत्यम शिवम सुंदरम का साधक
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