-मनोज मिश्र
माँ हमने तो कभीमदर्स डे नहीं मनाया
जरूरत ही नहीं पड़ी
माँ के बिना हम
नहीं कर पाते कल्पना
अपने अस्तित्व की
वह प्रभु सी हमारी
हर चीज में रही समाई
तनिक भी न सोचा कभी
उड़ जाएंगे ये पंछी
बनाने अपना अपना घरौंदा
रह जाऊंगी मैं
एक सूने घोसले को
संवारने के लिए तब
जब मुझे होगी उनकी
सबसे ज्यादा जरूरत
माँ, हमने तो कभी
मदर्स डे नहीं मनाया
वैसे भी हम तुम्हे कभी
समझ ही न सके, वजह
तुम थी हर जगह
जब भी रही हमें जरूरत
प्रज्जवलित करती रही
यज्ञाग्नि, आहूति देकर सदा
अपनी हड्डियों की
दधीचि बने बिना
कहते हुए कि है
यह मेरा परिवार
भले ही परिवार ने
कभी उसकी तरफ न देखा
तुम्हे क्या अच्छा लगता है
जानने की कोशिश की
नहीं ना क्यूँकि
वो तुम थी जिसकी
वजह से सब था
फिर भी जिसके
रहने की कोई
वजह न परिवार ढूंढ सका
माँ, हमने तो कभी
मदर्स डे नहीं मनाया
मुझे याद है जब
सभी दौड़ रहे थे
अपने सपनों के पीछे
बिना सोचे समझे कि
उन सपनों को सींचा जिसने
उंसके भी थे कुछ सपने
जो दब गए
वक्त की धूल तले
पन्ना की परंपरा
छूटती ही नहीं
माँ, हमने तो कभी
मदर्स डे नहीं मनाया
जब भी हम चले
छुट्टियां मनाने, घूमने को
आनंद मगन हो
कहते गए कि
रखना ध्यान घर का
न होना परेशान
कभी सोचा ही न जरा
कि हमें था रखना
तुम्हारा ध्यान
पर तुम पर ही डाल चले
अपना सब बोझा
आज मदर्स डे है
दुनिया इसे मनाती है
या शायद बाजार
इसे मनवाता है
वही बाजार जिसके
उत्पादों पर आती है
एक माता अर्ध अनावृत
वक्ष लिए कहने के लिए
जरूरी है स्तनपान
बच्चे के लिए
जानता बाजार भी
विज्ञापन है
लोलुप आंखों के लिए
पर कहता है कि हम
लाये यह माँ का मान
बढ़ाने के लिए
माँ, आज मदर्स डे है
उम्मीद है तुम
एक बार फिर
माफ करोगी हमें
हमारी सारी कमियों के लिए
समेत लोगी अपने आँचल तले
भुला के अपने गम सारे
क्यूँकि तुम माँ हो
तुम माँ हो
तुम माँ होहमारे खबरों को शेयर करना न भूलें|
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