जीवन का संसर्ग
--:भारतका एक ब्राह्मण.
संजय कुमार मिश्र'अणु'
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मैं निमग्न था
एकदम गहन
तमिस्रा में
तब ये ठंडी हवा
आकर करने लगी
मधुर स्पर्श
कि उठो जागो
और प्राप्त कर लो
जीवन का नव उत्कर्ष
ये पक्षियों का समूह
करने लगा गान
तुम आलस को त्यागो
और बनों कर्मवीर महान
जिससे इस दुनियां में
व्याप्त हो नव हर्ष
झुम झुमके द्रुमदल
अभिव्यक्त कर रहे हैं भाव
देखो हम जाग जये
तुम अपनी मोह निशा भगाव
ये अनुपम प्रकृति
कर रही है
तेरे हित अपना सबकुछ
उत्सर्ग पर उत्सर्ग
ये नदियों की धारा
अपनी कलकल निनाद से
कर रही है दिगदिगन्त को मुखरित
उठो,जागो और उसे प्राप्त करो
जिसकी कामना हुई हैं अंकुरित
ये उषा-प्रत्युषा
दे रही हैं आज सबको
आदर्शमय जीवन का संसर्ग
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