बुद्धं शरणम् गच्छामि।
मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"
आज हर खासोआम इस सूक्ति को महात्मा बुद्ध की सूक्ति मान रहा है।जबकि यह सत्य से परे है।वह ऐसे कि यदि यह बुद्ध की सूक्ति होती तो फिर स्वयम् महात्मा बुद्ध भी "बुद्धं शरणम् गच्छामि "नहीं कहते।वे स्वयम् नित्य इन तीन सूक्तियों का पाठ अपनी दैनंदिन क्रियाओं में किया करते थे।
"बुद्धं शरणम् गच्छामि
धम्मम् शरणम् गच्छामि
संघं शरणम् गच्छामि"।
अर्थात् बुद्ध की शरण जाता हूँ।धर्म की शरण जाता हूँ।संघ की शरण जाता हूँ।
अब ध्यातव्य यह है कि जो स्वयम् बुद्ध है वह किस बुद्ध की शरणागत होगा?या तो इस बुद्व से परे भी कोई इतर बुद्ध होगा जिसकी शरणागति वे करना चाहते हैं या फिर हम अर्थ का अनर्थ कर रहे हों!
आईये देखते हैं महात्मा बुद्ध के इन त्रिसूक्तों का मूल भाव क्या है और उन्होंने किस हद तक इसका पालन किया।वस्तुतः बुद्वं शरणम् गच्छामि का वह भाव नहीं है जो हम समझ रहे हैं।बुद्ध से तात्पर्य यहाँ ज्ञान से है।जब हम अपने जीवन समर में उलझ जाते हैं तो उससे उबरने का एकमात्र मार्ग होता है धर्म।किंतु उस तक पहुँचने का मार्ग होता है ज्ञान।इसीलिये बुद्व ने यहाँ ज्ञान के शरणागति का संदेश दिया है।बिना ज्ञान तत्व के जाने हम धर्म तत्व को नहीं जान पायेंगे।ज्ञान और धर्म को अपनाये बिना हम संगठित भी नहीं हो सकते।शायद इसीलिये महात्मा बुद्ध ने ज्ञान तत्व को सर्वोपरि रखा।"बुद्धं शरणम् गच्छामि "कहकर।सबसे अंत में कहा "संघं शरणम् गच्छामि"।बुद्ध के जीवन चरित का यदि गहन अध्ययन किया जाये तो स्पष्टतः उनकी जीवन शैली आजीवन इन्हीं त्रिसूक्तों पर आधारित रही।दुनियावी झंझावातों से अपने आपको अलग रखकर विश्व कल्याण के निमित्त इन त्रिसूक्तों प्रसार करते हुये एक आडंबर विहीन समाज की स्थापना का प्रयास उन्होंने बराबर किया।आज के बदलते परिवेश में बुद्ध के ये त्रिसूक्त एकबार फिर से प्रासंगिक हो गये हैं।बिखरते परिवार और टूटते समाज को यदि इन त्रिसूक्तों का पाठ पढ़ाया जाये इसके वास्तविक अर्थ को बताया जाय तो शायद एक सुंदर सुगठित समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो।बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के उपरांत धर्म आधारित संगठन की बात की है।इसीलिये "धम्मम् शरणम् गच्छामि के बाद "संघं शरणम् गच्छामि"की बात करते दिखते हैं।
अतिवादिता हेतु सक्षमा आप सबको बुद्व पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं।....मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।
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