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मेहसूस करे

मेहसूस करे

गमों को पढ़ने की अब
मेरी आदत सी हो गई। 
न चाहने की अब इच्छा
न खोने अब मुझे डर है। 
मैं इतना सह चुका हूँ
इस मायावी जमाने में। 
की जिंदा होते हुये भी 
मैं मृत्य जैसा ही हूँ।। 

न कमी थी प्यार में उनके
न कमी थी मेरी चाहत में। 
बस फर्क था निगाहों में
जो रोज मिले जा रही थी। 
देखकर जमाने वालों की
इससे बहुत जल रही थी। 
और मोहब्बत में अनेक
उलझने पैदा कर रहे थे।। 

कब किससे और कहाँ
आँखे मिल जाये। 
देखकर किसी को भी
दिल पिघल जाये। 
और दिलकी धड़कनों में
कोई बस जाये। 
और प्यार मोहब्बत की 
शुरूआत यही से हो जाये।। 

दुनियां की इस भीड़ में
कौन कब कहाँ मिल जाए। 
और बातों ही बातों में
उनसे अपनापन मिल जाए। 
और स्नेह प्यार की ज्योत
दिलों में जल जाए। 
और जिंदगी का सफर
उनके साथ आसान हो जाए।। 

जय जिनेंद्र 
संजय जैन "बीना" मुंबई
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