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भरी दोपहरी

मज़दूर दिवस पर एक रचना सभी मजदूर नेताओं, रहनुमाओं को समर्पित

भरी दोपहरी, सुखी रोटी, छाया खोज रहा है,
टूटे फूटे पत्थरों में भी, सपना खोज रहा है।
दिखलाकर तुम उसको, राम राज्य का सपना,
खुद बन बैठे हो राजा, वह तो रोटी खोज रहा है।
राजा बन तुम भ्रष्ट हो गए, भाग्य कोस रहा है,
रोजी रोटी मिलेगी कैसे, बैठा सोच रहा है।
धन संपत्ति खूब बनाये, अब महल बना रहे हो,
वह तो अब भी घास फूंस का, छप्पर खोज रहा है।
जिसके कान्धे चढ़कर, तुम सत्ता तक आये हो,
वह आज भी सड़क किनारे, पत्थर तोड़ रहा है।

डॉ अ कीर्तिवर्धन
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