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ईश्वर और मनुष्य

ईश्वर और मनुष्य

जय प्रकाश कुँवर
हे प्रभु, मैं तो अभी तक यही जानता हूँ कि आप ही इस दुनिया के रचयिता, पालनकर्ता और संघारकर्ता हैं! आपने इस पृथ्वी पर मनुष्य की संरचना सबसे उत्तम प्राणी के रूप में की है! आपने बिना किसी भेदभाव के इस पृथ्वी पर मनुष्य की संरचना की थी! लेकिन मनुष्य ने तो अपने को विभिन्न धर्मों यथा, हिन्दू धर्म, मुस्लिम धर्म और ईसाई धर्म आदि में विभाजित कर लिया और अपने मतानुसार आपका भी बंटवारा यथा, राम, कृष्ण, विष्णु, प्रोफेट महमद और ईसा मसीह आदि रुपों में कर लिया!
इस सब के बावजूद मुझे तो अब भी यही विश्वास है कि आप सर्वशक्तिमान एक ही रूप में हैं! और सारे जगत का पालन पोषण कर रहे हैं! इस युग के एक संत श्री साईं बाबा ने ठीक ही कहा है:-
" सबका मालिक एक है "
श्रीरामचरितमानस में भी एक दृष्टान्त है कि मनु और सतरुपा ने आपसे वरदान मांगते समय चाहा था कि उन्हें आपके जैसे पुत्र की प्राप्ति हो! तब आपने उनसे कहा था कि मैं तो एक ही हूँ और मेरे जैसा दुसरा मैं कहाँ से लाऊँ! अत: आपने उन्हें आशीर्वाद दिया कि आप स्वयं मनुष्य रूप में उनके पुत्र के रूप में त्रेतायुग में औतार लेगें! आप का यह कथन कि " अहम् ऐको अस्ति, ना द्वितीयो " पूर्णरूपेण सत्य है!
आज मनुष्य अपने अहम में पड़ कर यह भुलता जा रहा है कि भगवान के अलावे और सभी धर्मों के बहुत सारे ज्ञानी और विद्वान धर्माचार्य भी अपने को ईश्वर के समान मानने लगे हैं! लेकिन हे प्रभु यह भी आपका ही कथन है कि:-
मुझमें तुममें है भेद यही, तुम नर हो मैं नारायण हूँ!
संसार के हाथों में तुम हो, संसार हमारे हाथों में!!
अब जहाँ तक हमारी यानि मनुष्य प्राणी की बात है, तो ईश्वर ने पृथ्वी की सबसे बुद्धिजीवी रचना मनुष्य को बनाया! उसे बुद्धि और विवेक प्रदान किया! लेकिन अपने को विभिन्न धर्मों में बांट कर मनुष्य अपने उत्कृष्ट बुद्धि का परिचय देना शुरू कर दिया और अपने धर्म के ईश्वर को अलग और सबसे बड़ा मानकर दुसरे धर्म के ईश्वर की आलोचना करना शुरू कर दिया! अब तो मनुष्य की बुद्धि इतनी प्रखर हो गयी है कि इन्होंने आपके अलग अलग रूपों में अवतार लेकर लीला करने के विभिन्न मुद्राओं का विश्लेषण एवं आलोचना सामाजिक एवं सामुहिक रूप से करना शुरू कर दिया है!
हमारे धर्म शास्त्र यह कहते हैं कि:-
विनाश काले विपरीत बुद्धि"
लगता है कि यह कथन सत्य होने जा रहा है! क्योंकि विभिन्न धर्म ग्रन्थों में लिखित आप के कुछ गुढ़ तथ्यों को आज का विद्वान मनुष्य आपकी लीलाओं को अच्छे संदर्भ में न लेकर उसकी आलोचना समालोचना करना शुरू कर दिया है और आपको आपकी लीलाओं के अनुसार आपको कहीं हवशी, तो कहीं व्यभिचारी, तो कहीं बलात्कारी और पता नहीं क्या क्या कहना शूरू किया जा रहा है! और इस सबके प्रतिक्रिया स्वरूप एक धर्म के लोग दुसरे को आरोपित कर आगजनी, लुटमार, हत्या आदि का आरंभ पृथ्वी पर शुरू कर दिए हैं!
हे प्रभु अब आपकी लीला आपही समझ सकते हैं! क्योंकि लगता है कि वास्तव में अब इसी बहाने आप कुत्सित विचारों के तरफ बढते पृथ्वी के मनुष्य प्राणी का शीघ्र विनाश करना चाहते हैं आप! हे प्रभु आप संघारकर्ता के साथ पालनकर्ता भी हैं! अतः अपने द्वारा रचित इस पृथ्वी के मनुष्य प्राणी को समय रहते आप सद्बुद्धि प्रदान करें और एक सौ गालियों तथा अपशब्द बोलने की गिनती का इन्तजार न करें, जैसा कि आपने द्वापर युग में शिशुपाल के वध के समय किया था!
हे प्रभु, आप सर्व शक्तिमान हैं और आप ही सबों को इस धार्मिक उन्माद और उलझन से निकल सकते हैं!
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