सामने से
---:भारतका एक ब्राह्मण.
संजय कुमार मिश्र'अणु'
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सामने से जब कभी वो
गुजरती है
नजर से दिल में उतरती है
जब चकित होकर
देखती है मुझे एक टक
रुक जाती है चेतना
और जाता है मेरा प्राण अटक
तब आहिस्ते से ख्वब संवरती है
मंद-मंद मुस्काती है
बहुत-बहुत लुभाती
देखकर ऐसा लगता है
कि वो लूटकर लूटाती है
जीवन की रिक्तियों को भरती है
उसके सधे हुए कदम
बतलाता है हरदम
बस बढ रही है उद्दाम ऐषणा ले
साधकर दम करने को संगम
जो मन चाहे बस वही करती है
जो मन को भा गया
दिल उसी पर आ गया
फिर होकर उन्मत
पूर्णतः पा गया
एक-एक पल न जीती न मरती है
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