हिंसाग्रस्त असहमति
(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सभी को अपनी-अपनी बात कहने का अधिकार होता है। कोई किसी बात से सहमत है तो दूसरा उससे असहमत भी हो सकता है। यह वैचारिक द्वन्द्व हमारे देश में लम्बे समय से चला आ रहा है। कुछ लोग थे जो ईश्वर में विश्वास रखते थे और उसको प्रसन्न करने के लिए व्रत-पूजा भी करते थे। उनको आस्तिक कहा जाता था। इसके विपरीत कुछ लोग ईश्वर में विश्वास नहीं रखते थे, उनको नास्तिक कहा जाता था। आस्तिकों में भी जो विष्णु के उपासक थे, वे वैष्णव कहलाए और जिन्होंने भगवान शंकर को अपना आराध्य माना, उन्हंे शैव कहा गया। शैव ओर वैष्णव एक-दूसरे से मतभेद तो रखते थे लेकिन मूलरूप से दोनों आस्तिक थे। आज जब हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, तब असहमति हिंसाग्रस्त हो गयी है। असहमति और विरोध संविधान के दायरे में ही होना चाहिए। देश में 2014 में जब से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी है, तब से असहमति लगातार बढ़ती जा रही है। पिछले एक साल के दौरान तो असहमति ने पत्थरों और आगजनी का ही रास्ता नहीं अपनाया बल्कि दिल्ली की जहां गीरपुरी और यूपी के कानपुर में गोली और खंजर भी चलाए गये। इस हिंसाग्रस्त असहमति को समाप्त करना जरूरी है। केन्द्र सरकार ने भी इसके लिए सख्त कदम उठाए हैं और राज्य सरकारें, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार का बुलडोजर अपने फुल फार्म में आ गया है।
हमने माना कि भाजपा की विचारधारा से कुछ लोग असहमत हैं लेकिन उनका विरोध संविधान के दायरे में होना चाहिए। हिन्दू धर्म को अपना आदर्श मानने वाली भाजपा ने अपने धर्म के तीज-त्योहार को प्रोत्साहन दिया है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। उत्तर प्रदेश में ही भगवान राम और भगवान कृष्ण ने जन्म लिया। उनके जन्म स्थल पर कुछ खुशियां क्रमशः त्रेतायुग और द्वापर युग से चली आ रही हैं। त्रेतायुग में भगवान राम ने अयोध्या में राजा दशरथ के घर जन्म लिया। पौराणिक आख्यानों के अनुसार राजा दशरथ को चैथेपन अर्थात् लगभग 75 वर्ष के बाद चार बेटे मिले थे। बेटे के जन्म पर खुशी मनाना आज भी सामान्य बात है। कल्पना कीजिए कि राजा दशरथ को लगभग बुढ़ापे में चार बेटे मिले तो कितनी खुशी बनायी गयी होगी। समय की धुंध में बहुत कुछ धंुधला भी पड़ गया। राजा दशरथ के बेटे राम ने लंका के राजा रावण का विजय दशमी को वध किया था और कार्तिक कृष्ण पक्ष अमावस्या को 14 वर्ष का वनवास बिताकर अयोध्या लौटे थे। इस दिन अयोध्या के लोगों ने घर-घर दीप जलाकर दीपोत्सव मनाया। इस प्रकार भगवान राम के जन्म का दिन चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी और रावण वध का दिन अर्थात विजय दशमी और अयोध्या वापसी पर दीपावली का त्योहार विदेशी आक्रांताओं के अत्याचार के बावजूद जीवित रहे हैं। अब उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार में अयोध्या में ये सभी त्योहार भव्य स्तर पर मनाए जाते हैं। इसी तरह मथुरा में भगवान कृष्ण का जन्मदिन भाद्र कृष्ण पक्ष अष्टमी को मनाया जाता है। इसको भी योगी आदित्यनाथ की सरकार ने भव्य रूप दिया है। इससे असहमत होने का कोई कारण नहीं दिखता है क्योंकि योगी आदित्यनाथ की सरकार ने दूसरे धर्म-सम्प्रदाय के त्योहारों पर किसी प्रकार की बंदिश नहीं लगायी। पिछले दो साल में अन्तरराष्ट्रीय महामारी कोरोना के चलते सोशल डिस्टेन्स बनाने की जरूरत महसूस की गयी थी। इसलिए तीज-त्योहारों पर भी इसका प्रभाव पड़ा था। एक धर्म के नहीं बल्कि सभी धर्मों के त्योहार कोरोना गाइड लाइन के तहत ही मनाए गये।
इसके बावजूद रामनवमी के अवसर पर देश के अलग-अलग हिस्सों में हिंसा क्यों भड़की? हाल ही में हनुमान जयंती के अवसर पर दिल्ली के जहांगीर पुरी में एक सम्प्रदाय विशेष के लोग नंगी तलवारें लेकर निकल आए। उन्होंने हिन्दू धर्म के लोगों की दुकानों को चुन-चुन कर जलाया। अभी 3 जून को जब देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कानपुर के एक गांव में डा. भीमराव आम्बेडकर की प्रतिमा का लोकार्पण कर रहे थे, तब कानपुर शहर की नयी सड़क पर फिर उसी समुदाय के लोग हाथों में नंगी तलवार लेकर निकल आए और स्थानीय लोगों के अनुसार धमकी दी कि तुम लोग यहां से भाग जाओ, वरना काट डालेंगे।
संवाद और सहमति के मार्ग में हिंसा का स्थान ही नहीं है। इसलिए आज जो लोग अपनी असहमति जताने के लिए हिंसा का सहारा ले रहे हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होना ही चाहिए। इसके साथ ही उनके कुछ समझदार लोगों के साथ संवाद का सिलसिला भी कायम रखना होगा। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में गत 10 जून को हिंसा भड़की थी। खेद की बात यह है कि जुमे का दिन मुसलमानों के लिए बहुत पवित्र होता है और उस दिन सभी लोग नमाज जरूर अदा करते हैं। ऐसे पवित्र दिन मुसलमानों का पत्थर फेंककर हिंसा करना बहुत ही निंदनीय है। ईश निंदा का मामला भी शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन से सुलझाया जा सकता था क्योंकि भाजपा के जिन दो नेताओं पर इसका आरोप लगा था, उन्हांेने माफी मांग ली थी। इस्लाम में कुर्बानी और जकात जैसी परम्पराएं सिर्फ दिखावे के लिए नहीं है, उनको अपनाना भी पड़ता है।
जमात-उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना सुहैब कासमी ने बिल्कुल सही कहा है कि गत 10 जून को देश भर में जुमे की नमाज के बाद जिस तरह मुसलमान उत्तेजित होकर सड़कों पर निकले थे, उसके लिए एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदउद्दीन ओवैसी और जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी जैसे नेता भी जिम्मेदार हैं। कासमी कहते हैं कि इन नेताओं ने इस तरह के भड़काऊ भाषण दिये जिससे युवा गुमराह होकर सड़कों पर पत्थरबाजी करने लगे। जमात उलमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना सुहैब कासिम कहते हैं कि भाजपा की प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने तो 15 दिन पहले टिप्पणी की थी, उस समय तो कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई थी। इसके बाद जब ओवैसी और मदनी जैसे कथित रहनुमाओं ने तकरीरें दीं और कहा ‘मुसलमान अब चुप रहने वाला नहीं है, वो इसका जवाब देगा...। इसी के बाद पूरे देश में एक जैसे पोस्टर लगने लगे। इससे साफ है कि एक सुनियोजित साजिश के तहत प्रदर्शन और पत्थरबाजी हुई है। इसलिए योगी आदित्यनाथ ने प्रदर्शन में पत्थरबाजी कर रहे लोगों को चिह्नित कर उनके खिलाफ कार्रवाई की है। असहमति की इस हिंसा में जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन कासमी जैसे लोग अब भी पलीता लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं। हकीमुद्दीन कासमी कहते हैं कि अन्याय का विरोध करना मुसलमानों का लोकतांत्रिक अधिकार है। वे यह भी कहते हैं कि एकतरफा गिरफ्तारी, गोलाबारी और बुलडोजरों के इस्तेमाल के जरिए मुसलमानों को एक अधिकार से वंचित किया जाना लोकतांत्रिक सरकार के लिए शर्म की बात है। हकीमुद्दीन कासमी जी इसका जवाब भी दें कि विरोध प्रदर्शन में पुलिस और आम नागरिकों पर पत्थर फेंकना, सिर फोड़ना, आग लगाना, वाहन जलाना भी क्या किसी का लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है? आरएसएस से सम्बद्ध मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने तो यहां तक कह दिया कि हिंसा में शामिल सभी लोगों को इस्लाम से ही खारिज किया जाना चाहिए। इस्लाम हिंसा नहीं बल्कि मोहब्बत सिखता है।
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