Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

वट वृक्षों के साथ अंग्रेजों की साजिश

वट वृक्षों के साथ अंग्रेजों की साजिश

वट-सावित्री व्रत में ही नहीं, अन्य अवसरों पर भी हम वट (बरगद) वृक्ष की पूजा करते हैं लेकिन अंग्रेज शासकों द्वारा भारतीय क्रांतिकारियों को बरगद, पीपल, नीम आदि वृक्षों पर सरेआम फांसी देने के पीछे प्रत्यक्ष मंशा यही होती थी कि वे लोगों में विद्रोह की भावना खत्म करना चाहते थे। इसके अतिरिक्त वे यह भी जानते थे कि बरगद व पीपल के पेड़ हिंदू ही नहीं अपितु जैन व बौद्ध धर्मों में पूजनीय, जीवनदायी व पवित्र हैं। ऐसे में जीवन का आशीर्वाद देने वाले इन वृक्षों को ही मृत्यु स्थल बना देना, क्रांतिकारियों के शवों को अंतिम संस्कार तक के लिए न सौंपना व वहीं क्षय होने तक लटके रहने देना जैसे क्रूर नियम संस्कृति पर परोक्ष हमले थे।

चैरीचैरा के डुमरी बाबू गांव निवासी बंधु सिंह को अंग्रेजों ने 12 अगस्त, 1858 को अलीनगर स्थित एक पेड़ पर फांसी देने का सात बार प्रयास किया। कहते हैं कि उसी वक्त वहां से 25 किमी दूर देवीपुर के जंगल में बंधु सिंह के द्वारा स्थापित मां की पिंडी के बगल में खड़ा तरकुल (ताड़) के पेड़ का सिरा टूट गया और इससे खून की धारा निकल पड़ी। यहीं से इस देवी का नाम माता तरकुलहा के नाम से प्रसिद्ध है। आठवीं बार मां जगतजननी का ध्यान कर फांसी के फंदे को चूमते हुए उन्होंने देवी मां से मुक्ति मांगी और इसके बाद बंधु सिंह अमर हो गए। स्वाधीनता समर के प्रथम नायक माने जाने वाले मंगल पांडे को आठ अप्रैल, 1857 को बैरकपुर (बंगाल) में बरगद के वृक्ष पर फांसी की सजा दी गई थी। वर्ष 1860 में बरेली में भी 257 लोगों को एक साथ बरगद के वृक्ष पर ही फांसी दे दी गई थी। ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि अंग्रेज उस दौरान सामूहिक अथवा प्रमुख क्रांतिकारियों को सजा देने के लिए बरगद, पीपल, नीम जैसे वृक्षों का उपयोग कर रहे थे। यह महज संयोग नहीं था, बल्कि सोची-समझी साजिश थी। इस तरह सरेआम फांसी देने का स्पष्ट संदेश था कि लोगों में डर और नकारात्मकता का माहौल पनप सके। कई बार शवों को वृक्षों से उतारने व अंतिम संस्कार करने की भी इजाजत नहीं मिलती थी। हालांकि अंग्रेजों की यह कोशिश नाकाम हुई और डर के बजाय विद्रोह की भावना भड़क उठी। वे वृक्ष पूजनीय तो थे ही, इस तरह से प्रेरणा के स्रोत भी बनते चले गए। उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में फूलबाग चैराहा के नजदीक नानाराव पार्क में स्थित बूढ़ा बरगद 133 क्रांतिकारियों की फांसी का गवाह था। बीबीघर व सत्तीचैरा घाट के विद्रोह से गुस्साए कर्नल नील ने यहां इन क्रांतिकारियों को एक साथ फांसी दे दी थी। अचरज है कि उन क्रांतिकारियों का इतिहास में कोई नाम दर्ज नहीं है और लापरवाही के चलते वह बूढ़ा बरगद भी धराशायी हो चुका है। हां, उस स्थान पर बूढ़े बरगद के नए वंशज स्मृतियों को संजोए हुए हैं। इसी क्रम में दर्ज है मध्य प्रदेश के जिला मंडला का नाम, जहां दो नवंबर, 1857 को 22 लोगों को एक साथ बरगद के पेड़ में फांसी दी गई थी। डिप्टी कमिश्नर वाडिंगटन ने रामगढ़ की रानी अवंतीबाई रानी के बलिदान के बाद मंडला के जमींदार व रानी के सैन्य सलाहकार उमराव सिंह को गिरफ्तार कर उनके 21 आदिवासी साथियों के साथ फांसी दे दी थी। इस स्थान को आज बड़ चैराहा के नाम से जाना जाता है।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ