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मस्तक ऊंचा भारत का


"मस्तक ऊंचा भारत का"

जहरीले भड़काऊ भाषण
सुलग रहा है नंदन कानन,
आखिर क्यों बैठे हैं मौन
यहां वहां बस नकली आनन।
दिखते नहीं भाव कुछ नेक
रहा पड़ोसी रोटी सेंक,
हटेगा कब झूठा विश्वास
ऊपर से हम केवल एक।
देश का अपना नेक इरादा
सबके विकास का सच्चा वादा,
भ्रम पाले कुछ देश के वासी
बने हुए हैं सबके दादा।
संतों का यह देश पुराना
सब मजहब का एक तराना,
शत्रु देश की तिरछी नजरें
कहतीं कुछ झूठा अफसाना।
गंगा यमुना का मिलन बताकर
मानवता को परे हटाकर,
करते हम पत्थर से वार
इंसानियत गई है हार।
खुशरो कबीर रसखान रहीम
देश प्रेम जिनमें असीम,
कान्हा को भजते गाते थे
भक्ति भाव में थे तल्लीन।
युग बदला बदला हिन्दुस्तान
डफली अपनी अपना गान,
कहना पड़ेगा भारत माता
बदल गई सबकी पहचान।
कोमल मति नादान शिशु
पढ़ते हैं पाठ बगावत का,
नहीं झुका है नहीं झुकेगा
मस्तक ऊंचा भारत का।
© रजनीकांत।
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