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अधूरा प्यार

अधूरा प्यार

बड़ी ही सौंदर्यवान हो, 
रखती अद्भुत ज्ञान हो।  
प्रेम की तुम पूर्ति हो,
करुणा की मूर्ति हो।
तीर चलाते दो नयन है,
खो जाता इनमे मन है।
कितने कोमल अधर है, 
लगते गुलाब से सुंदर है।
दूध सा उजला रूप है, 
मुखड़े पर छाई धूप है।
तुम्हें देख झूमे मेरा तन,
छू लेने को करता है मन।
देखा तुम्हें जो पहली बार,
आँखें तुमसे हो गई चार।
करने लगा था तुमसे प्यार,
करता चाहता था इज़हार ।
रब को नहीं मंजूर था यार
नहीं बन पाई तुम मेरा प्यार।
तुम्हें अपनाने के लिए सनम,
लेना पड़ेगा मुझे पुनर्जन्म।
बनाऊंगा तुम्हें अपनी दुल्हन,
तुम्हारे संग बीतेगा जीवन।
✍सुमित मानधना 'गौरव', सूरत 😎
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