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सेवा और पगार

सेवा और पगार

जय प्रकाश कुँवर
प्राचीन काल में हमारे महात्माओं और साधु-संतों आदि के कथनानुसार सेवा को धर्म माना जाता था। तब मनुष्य समाज में औरों के लिए निस्वार्थ सेवा प्रदान करता था। लेकिन जैसे-जैसे उसकी सामाजिक एवं पारिवारिक आर्थिक आवश्यकताएं और आकांक्षाएं बढ़ती गई उसे तरह-तरह के संसाधनों की आवश्यकता जीवन यापन के लिए पड़ने लगी। अब निस्वार्थ सेवा भाव से उसका काम चलना मुश्किल हो गया। अब अपनी सेवा के बदले में उसे कुछ लेने की आवश्यकता पड़ने लगी। यहीं से मनुष्य को काम के बदले कुछ आर्थिक लाभ पाने की जरूरत पढ़नी शुरू हो गई।
फिर मनुष्य ऐसे सेवा अथवा काम करने के लिए निकल पड़ा जिससे उसके और उसके परिवार की भरण पोषण की आवश्यकता पूरी हो सके। अब उसे सेवा नहीं बल्कि नौकरी करने की जरूरत पड़ गई। उस जमाने में एक नौकरी करता था और परिवार के नौ लोग उस पर आधारित खाने वाले होते थे। तब उसे नौकरी कहा जाने लगा।
धीरे धीरे यह समस्या और गंभीर होती गई और समाज में तरह-तरह के बदलाव होने शुरू हुए। परिवार भी टुट कर छोटे होते चले गए । अब परिवार में एक कमाने वाला और चार खाने वाले होते थे । तब उसे नौकरी न कह कर चाकरी कहा जाने लगा।
बात यहां भी नहीं रुकी और समाज में और भी परिवर्तन हुए । और एक समय ऐसा भी आया की अब परिवार संयुक्त न हो कर एकल परिवार बन गया । अब उस एक की कमाई उसकी एकल परिवार की आवश्यकताओं लिए ही पूरी नहीं पढ़ पाती थी । अतः उस सेवा के बदले पाने वाले रकम को तनख्वाह कहा जाने लगा। धीरे धीरे बात अब यहां तक पहुंच गई है कि एकल परिवार तो दुर, अब खुद की कमाई उसके खुद लिए ही काफी नहीं रह गई है अतः अब उसका नाम तनख्वाह भी नहीं रह करके केवल वेतन रह गया है। आज तथाकथित परिवार का हरेक व्यक्ति चाहे वह पुरुष हो अथवा स्त्री खुद कमा रहा है। और अब वह सेवा के बदले पाया जाने वाला रकम खुद कमाने वाले व्यक्ति के तन के लिए पर्याप्त नहीं है। आज के इस आर्थिक युग और असीमित आवश्यकताओं के युग में हम और कहां जाकर रुकने वाले हैं यह केवल मात्र ईश्वर ही बता सकते हैं की और आगे चलकर वेतन का नाम और रूप क्या होने वाला है।
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