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असाढ़ी पूजा

असाढ़ी पूजा

डॉ रामकृष्ण मिश्र 
पूजा के महातम एतना गामे गिरामे करमी के लर निअन पसरल हे कि केतनो धरती के देह झुलसल काहे न होए, जइसहीं रोहनियाँ बीहन छिटाएल ,साग पात फुनके फुदके लगलन।
असाढ़ के चरचा तो खेती बारी के अलाबे साहित में खूबे हे काहे कि कालिदास होवथ कि मोहन राकेस अपन कलम कूची से एकरा अमर बनावे में तनिको कोताही न कयलन।
असाढ खेती बारी ला खास महीना हे ,एही मे बीहन बिरवा के बुनाई रोपाई के बढ़िया समय होबऽ हे। खेतन में धान के बीहन बुनाए,छिटाए आउ घर के खंँढ़ी में सीम खोहड़ा करैला,भतुआ के बीया रोपाए के समय हे। अदरा नछत्तर चढते बीहन बुनाय के खुदबुदी उठे लगऽ हे। अइसे तो अदरिआ बीहन बून के किसान तनी सुस्ता हथ बाकि बरखा पर सौसे धेयान परान टऽगल रहऽ हे ईसे देवाय धरमाय दने लोग बाग के धेयान जमे लगऽ हे।
लोग कहऽ हथी,बरखा के सामी इंन्नर भगवान ,ओही करऽ हथ सगरो कलयान। तो इन्नर मगवान के मनावे दनावे ला पूजा पाठ जरूरी हे। असाढ़ में इंदर पूजा गामे आम होवे के रिवाज बन गेल। ई पूजा के बड़ी पुरान परंपरा हे,साइत हर जुग मे होवित आएल हे। दुआपर तो एकर परमाने बता रहल हे कि जब भगवान सिरी कृष्ण गोवरधन पूजा के वास्ते उरेहलन त केतना बबाल होएल कि दहाबही से बचावेला.भगवान गोवरधन पहाडवे उखाड़ के उठा लेलथी जेकर नीचे गोकुलवासी जान बचैलथी ई लड़ाई चार महीना बाद संतायल।
गाँव के लोग इंदरपूजा के उ परंपरा ढौबित आ रहलथी हे , ई पूजा के आयोजन से गाँवके लोगन के धारमिक,समाजिक एकता केसाथे आपुसी सदभाव जरूर से देखे ला मिल जा हे।
अइसन सलोगे करमठ में उछाह अउ जोस के उमगित तरंग बाल बुतरू से बूढ़ मधस तक देखल जा सकऽ हे। हलाकि एकर कोई दिन पहिले से तय न रहे कि कउन दिन पूजा होए के चही ,जइसे राम नौमी इया देवाली गैयाडाढ़ निअन न। महीना के कोइओ दिन ,लेकिन असाढ़ के अंदरे होय तब हे असाढ़ी पूजा। ई बात हे कि जउन साल गाँव में धनमंडल मनेकि फसल खूब बढ़िया उपजल उ साल खूब उचाबे मड़ाबे जेवारो के नेओत के बरहम जेओनारो के सरंजाम होबे बाकि जउन बरस फसल कमजोर इया अकाल पड़ल त ओतना उछाह भले न रहे असाढ़ी पूजा में कमी न होबे। ई पूजा खेती गिरस्थी के सुभ ला एगो सुरुआती मंगलाचरन हे। एकरा सहजोगी पूजा भी कहल जाहे काहेकि एकरा में सौंसे गाँव के सहजोग रहऽ हे –देह से,मन से आउ धनो से , जेकरा जे बनल अनाज से पइसा से जेकरा कुछ न उ देह से मेहनत करेला एक गोड़ पर खाड़ रहतन।
रतनबीघा के बिसुन महतो गाँव के जेठरैयत के अलावे सरपंचो हथ,,इन्हकर हरेक समाजिक काम में बढ़ चढ़ के सहजोग रहऽ हे,ई जने गोड़ बढ़ौलन कि तनही सहजोगी सोझ हो गेलन, अइसन इन्हकर सोहाव के चलते सभे गाँव के लोग सरधा,आदर से इनखा गाँव के मालिक के दरजो दे देलन हे।
रतन बीघा में असाढ़ी पूजा के जगह असालतन तय है। उ जगह हे देवीथान जे गाँव के पुरबारी पोखरा के अरारे पर बनल हे,इहाँ एगो पक्का बाँन्हल दसफीटा कुइयाँ,एगो सिवला आउ ओही ठैंयाँ हनुमान जी अपन धजा के साथे बिरजमान हथी। छोट से बड़ तक जग जोग के सब आजोजन हिएँ होबँ हे।
ई गाँव में गंगा दसहरे से असाढ़ी के सुर सार होबे लग जाहे। असल में सहजोगी सलोगी पूजा का एगो जलसा के संजोग बन जाहे, जेकर आवे के असरा में बाल बुतरू अपन अपन मन फरही पहलहीं से अँगेजाए लगऽ हे। घर अॄगना में जनानी कानाफुसी तो अलगे काने कान पसर के इतिहास भुगोल उकटे लग जा हे
एक दिन बिसुन महतो के दलान पर जूटान भेल,सब टोला से एक एकठो मानिंद के बोलहटा भेल,बरहम टोली रजपुतटोली ,गोवरटोली नउआटोली लोहरटोली आउ हरिजन टोली से लोग जुट गेलन ,बतकही सुरू भेल कि कइसे कइसे का कउची होए के चही , सब से राय बात करल गेल। सब लोग पारा पारी अपन अपन राय रखलन बाकि सभे के मिलजुमला भाव एही हल कि जे सरपंच साहेब कहथिन उहे होए के चही काहे से कि जेतना बढ़िया उनकर इंतजाम होबऽ हे ओतना बढ़िया आउ के कर सके ?सब के राय बात सुन के सरपंच बिसुन महतो कहलन कि भाई तोहनी के बात हम सब सुनली ,खूब तन मन से लग भिड के ई उतसौ मनावल जाओ बाकि हमर एगो अपनन्ही सभे से निहहोरा हौ कि अबकि पूजा के परधान जजमान हरख राम के बनावल जाए आउ उन्हकर पहिरावा धोती गमछा हम सहरसे रंगवा के देब ,ओकर खरचा हमर अप्पन होएत गाँव के हिसाब में न,फिन एगो आउ कि अवबकी पंडीजी बनरस से बोलावल जाथ
ई सुनते कुछ के मुह पर उदासी कुछ के अचरज त कुछ के मुसुक्का झलके लगल।
हरिजन टोला से आएल हरख राम अपन कमजोरी ले हाथ जोड़ले खाढ़ भेलन आउ कहलन कि सरकार हम जइसे तइसे रहऽ ही पूजापाठ ओला काम पवित्र से रहे ओलन करतथी त बेस रहतइ ,हमरा ओतना बुझैवो न करे ,आचारज का कहतथी हम का समझबइ, ई से हमरा माफ कर देल जाए। तुरंत बरहम टोली के बीनु पाँड़े उठ के कहलथी दुर मरदे एतने मे हदिया गेलें,हम रहब उ न सब समझा देवउ बनारस के रहतथी त का उनका ला वैद पुरान अलगे बन जतैन,जे कहल गेल उ चुप चाप मान ले आउ हम कहबउ न ? बाकि आझे से रसुन पेयाज खाना छोड़ दे।
सब परस्तताव पास भेल अउ जग के अनुठान पुनियाँ के बाद फिन मिल बइठ के पूजा के दिन ,ओकर सरंजाम के सब बात पर विचार करेला तय होएल।
ठीक तय समय पर लोग जुटलन,पूजा के दिन असाढ़ी पुनियाँ जेकरा गुरूपूनो भी कहल जाहे निहचित हो गेल। सबके काम बँटा गेल,के बनारस जैतन,के समान जुटैतन के खाय पीए के बनबस करतव,,के गाँव से बाहर तक नेओता ,अँगेया देतन इ सन काम के भार बँटा गेल, फिन सब अपन अपन काम में जुट गेलन।
पुनियाँ के एक दिन पहिले बनारस के वेदुआजी के डेरा आ गेल उनका बरहम टोली के गेयानीजी के दूरा पर ठहरावल गेल ,ओही दिन देवी थान झाड़ू बुहारी कर के गोबर से लीपल गेल ,सांझे से पाँच छौ गो पूजा ला वेदी बनलन। बीचे हमन के बालू से कुंड बनल ,दूसर दिन भोरहीं से गाँव केचहलपहल के का कहना, जेकरा जने देख सब हाई फाई में फिफिहिआ बनल हथ, गाँव के परतिस्ठा के बात ! जेकरा जे भार मिलल उ अपन काम में मुसतैद हे।
आठ बजे से पूजा के टंट घंट सुरू भेल,एने पूजा सुरू ओने बिसुन महतो के दलान में भोजन परसाद के तइआरी होवे लगल,ई काम मे जगेसर साव बड़ी माहिर हथ ,उनका बासते पूड़ी तरकारी मिठाई बना देना गुल्ली डंडा के खेल हे।
एने देवी थान पूजा पाठ होइत दू बज गेल ,अब हमन होएत त ओकरो में समय लगत
हरभजन के ढोल तासा पाटी अलगे अपन हुनर अरप रहल हल ,ओने से बिगनाके माय एगो पठरू लेले हाहिर हो गेल। हमन के काम समापती पर हल आचारजजी बली मंतर पढ़ित हलन, इन्द्राय सांगाय सपरिवाराय एतं सदीपं दधि माष भक्त बलिं समर्पयामि कि
बिगंआ के माय जोर से चिचिआ उठल--पठरुआ न पुजैलइ?
ई सुनते बनारसी आचरजजी के तेवर चढ़ गेल, कोप के लहर एॄड़ी से कपार तक चढ़ गेल त ,लगभग डाँटित कहलन हिंआँ पठरू के का काम?का समझऽ हें हिंआँ ओझै होइत हे कि तोता से जीउ के बलि देवेला कहल गेल ,! कहाँ हथ सरपंच बोलाबीजा उनका तबे पुरनाहुत होएत। ले बलैया ई तो ममले बिगड़ गेल एगो नया बखेड़ा भेल, सब लोग जे हुआँ पड़ी हलन सन्न !
इ बात जान के बिसुन महतोतो हाजिर होबे कयलन ढेर भीढ़ जमा हो गेल ,सब के सुना के अचारज जी कहलन कि भाई हम जो जानती हल कि रतन बिघा राकस के बीघा हे,आवेला कभी न गछती हल तनी देखऽ हमनी इन्दल भगवान के खुस करेला एतना एतना मंतर गंध हुमाद के परजोग करितही आउ ई एगो बलि देवेला पठरु ले के माथा पर चढ़ गेल
सब लोग धेयान से सुनऽ,आझ पुनियाँ हे, ,कल्ह से सावन सुरू होवत लोग वाग सावन मे रसुन पेयाज तक न खाए आउ आझे ई जीउ के बलि देके तोहनी मास खाएला छटपटा रहल हे अखनी पुरनाहुत न भेलो हे,हमरा दछिना के परवाह न हवऽ हम चललिओ,जेकरा से पुरनाहुत करावे ला हौ करवा लिहऽ ई सुनके तो सभे के काठ मार गेल
धरहरिआ,हथजोडी बिनती होए लगल, बड़ी मान मनौअल पर मानलन तो बाकि अपन एगो जबश्रजस सरत रख देलन कि आझ दिन गाँव के सभे लोग संकल्प करऽ कि इहाँ कोई मांस इया ताड़ी चारू चाहे कोईतरह के निसा न सेवतन
ई तो सकरपंच के बात हल ,बड़ी असमंजस , बाकि सब मान गेलन बिगना के माय के सब दूसे लगलन, उ बेचारी अपन पठरू ले ले भागल। फिन का बात हँसी खुसी समापन होएल खूब नीमन से आरती मंगल होएल ,अउ परसादी बँटाएल ,सांझ के सलोगी सहभोज ,आएल गेल के बिदाई भेल
तब से आझ तक रतन बीघा निरामिख बनल हे। आउ हियाँ कहिओ मरकी न भेल। रामकृष्ण/गयाजी
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