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खुदगर्ज जमाना

खुदगर्ज जमाना

स्वार्थ में डूबी दुनिया हो गया खुदगर्ज जमाना। 
भूल गए सब रिश्ते नाते अब भूल गए मुस्काना। 

हंसी-खुशी माहौल नहीं कड़वाहट रिश्तो में। 
मतलब के सब बोल मीठे वो भी है किस्तों में। 

निज स्वार्थ में सारे उलझे अपनी-अपनी जाने। 
अपना अपना राग अलापे अपनी धुन और ताने। 

कौन किसको याद करे कितनी गरज पड़ी है। 
अपना उल्लू सीधा करने दुनिया सारी खड़ी है। 

लाज शर्म मर्यादा ढह गई संस्कारों का दिखावा‌ 
धन के पीछे दौड़ रहे सब बोल रहे हैं धावा। 

लोभ लालच का डेरा है घट में भरा है विष।
बुजुर्गों का मान सम्मान कर कौन ले आशीष। 

स्वार्थ के वशीभूत हो गए भूल गए लिहाज। 
अंतर्मन के तार भी अब छेड़े ना कोई साज।

प्रेम के सब तराने भूले नफरतों का बोलबाला है। 
जहर उगलती आंखों में झलके गड़बड़ झाला है।

रमाकांत सोनी सुदर्शन 
नवलगढ़ जिला झुंझुनू राजस्थान
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